Monday, January 22, 2018

नींव के पत्थर हरियाणा के भजनोपदेशक




नींव के पत्थर हरियाणा के भजनोपदेशक

लेखक: सहदेव समर्पित सम्पादक शांतिधर्मी पत्रिका,जींद, हरियाणा

महर्षि दयानन्द ने 1875 ई0 में मुम्बई में और 1877 में लाहौर में आर्यसमाज की स्थापना की। ऋषि दयानन्द और उनके द्वारा स्थापित आर्यसमाज ने प्राचीन आर्य धर्म के प्रचार के साथ-साथ समाज में व्याप्त कुरीतियों व अंधविश्वासों के विरुद्ध ऐतिहासिक आन्दोलन किया, जिसका प्रभाव आज समाज और राष्ट्र के हर क्षेत्र में दिखाई देता है। महर्षि दयानन्द की इच्छा थी कि उन जैसे सहस्रों उपदेशक हों और वे मानव मात्र के कल्याण के लिये अंद्द परम्पराओं को समाप्त करते हुए वेद का प्रचार करें। स्वामीजी की इस प्रेरणा से आर्यसमाज में इस प्रकार के सहस्रों उपदेशक, पत्रकार, लेखक, साहित्यकार, कवि, गीतकार, भजनोपदेशक तैयार हुए जिन्होंने देश-विदेश में वेद-प्रचार की धूम मचा दी। इस क्षेत्र में भजनोपदेशकों का मोर्चा सर्वाधिक चुनौतीपूर्ण था। उत्तर भारत, विशेषकर हरियाणा के संदर्भ में यह एक कठिनाई भरा मार्ग था। इस क्षेत्र में सांग का जबरदस्त प्रभाव था और शिक्षा का प्रचार-प्रसार न के बराबर था। आर्यसमाज के भजनोपदेशकों ने इस चुनौती को स्वीकार किया था और यह मोर्चा जीतकर दिखाया था। उन्हें न मान-सम्मान की चिन्ता थी न अर्थ-लाभ की। स्वयं ही अपरिचित क्षेत्र में, संसाधन न होने पर भी अपना मंच तैयार करना, स्वयं ही श्रोताओं का आह्वान करना, स्वयं ही संचालन और व्याख्यान करना- यह आर्यसमाज के भजनोपदेशकों का ही कार्य था। पोपों व विधर्मियों के आक्रमण व बहिष्कार से अपने स्तर निपटने वाले, आर्यसमाज द्वारा संचालित आंदोलनों में जेलयात्रा करने वाले ‘पीर बावर्ची भिश्ती खर’ की भूमिका निभाने वाले भजनोपदेशकों को अपने नाम और कीर्ति की इच्छा नहीं थी। तभी इनके त्याग और बलिदान का कोई व्यवस्थित इतिहास सुरक्षित न रखा जा सका। पुस्तकों में जिनका इतिहास चाहे न लिखा जा सका हो, पर हरयाणा के गांव गांव में इनका प्रभाव देखा जा सकता है। बड़ी आयु की माताएँ आज भी विवाह आदि के अवसरों पर उन ज्ञात-अज्ञात भजनोपदेशकों के गीत गातीं देखी जा सकती हैं। हम इन पंक्तियों के माध्यम से हरयाणा के कुछ ऐसे ही भजनोपदेशकों का उल्लेेख कर रहे हैं, जिन्होंने निःस्वार्थ भाव से समाज में सात्त्विकता का प्रचार किया और दयानन्द के कार्य को आगे बढ़ाया।

पं0 बस्तीराम

दादा बस्तीराम को हरियाणा का आद्य भजनोपदेशक कहा जा सकता है, जिन्होंने ऋषि दयानन्द के समय में और उनकी सभाओं में भी अपने तराने प्रस्तुत किये। पं0 बस्तीराम का जन्म आश्विन कृष्ण चतुर्थी संवत् 1898 विक्रमी में झज्जर के खेड़ी सुलतान गांव में पं0 रामलाल के गृह में हुआ था। 1924 विक्रमी में कुम्भ मेले के अवसर पर स्वामी दयानन्द के विचारों को सुनकर आप अत्यंत प्रभावित हुए। उसके बाद दिल्ली दरबार में स्वामी दयानन्द जी के उपदेशों को सुनकर आपने स्पष्ट रूप से वैदिक धर्म को स्वीकार करने की घोषणा कर दी। गाते तो पहले भी थे, पर अब वैदिक सिद्धान्तों का प्रचार करने के लिये गाने लगे। स्वामी दयानन्द के रेवाड़ी आगमन पर स्वामी जी के व्याख्यान के पहले और बाद में आपका गायन होता था। अपना शेष जीवन पं0 बस्तीराम ने आर्यसमाज के प्रचार में लगाया। लगभग 35 वर्ष की आयु में शीतला रोग के कारण आप नेत्र ज्योति विहीन हो गए थे, पर नेत्रहीनता उनके संकल्प में बाधा नहीं बनी। उन्होंने कोई बहुत बड़ी औपचारिक शिक्षा नहीं प्राप्त की थी, परन्तु उनकी रचनाओं में उनके स्वाध्याय और प्रखर बुद्धि के दर्शन होते हैं। उनकी गाने की एक विशिष्ट शैली थी। वे इकतारे पर बहुत मीठी लोकधुन में गाते थे जिसे सुनकर जनता मंत्र मुग्द्द हो जाती थी। उनका पाखण्ड-खण्डन का तरीका बहुत प्रखर और उग्र था। वे पोप लीला पर बहुत तीखे प्रहार करते थे। उनके भजनों का प्रभाव आज भी हरयाणा के गांव गांव में देखा जा सकता है। अपने प्रभावशाली प्रचार के कारण वे दादा बस्तीराम के नाम से प्रसिद्ध हुए। जब कुछ विरोधियों ने कहना शुरु कर दिया कि आर्यसमाजियों ने दयानन्द को उनके देहान्त के बाद ऋषि कहना शुरु कर दिया, उनके जीवन काल में किसी ने उनको ऋषि नहीं कहा तब उनका एक गीत तो ऐतिहासिक प्रमाण बन गया जो वे ऋषि के जीवन काल में गाते थे- ‘बस्ती राम ऋषि का चेला इकतारे पै गावै सै।’ लगभग 117 वर्ष की आयु में 26 अगस्त 1958 को आपका देहान्त हुआ। आपने दर्जनों भजन पुस्तकों की रचना की, जिनमें पाखण्ड ख्ण्डनी बहुत प्रसिद्ध है। स्व0 चैधरी मित्रसेन आर्य ने ‘पं0 बस्तीराम सर्वस्व’ के नाम से उनकी सभी रचनाओं का पुनप्र्रकाशन कराया था। खेद है कि पिछले दिनों रोहतक में आरक्षण के नाम पर हुए उपद्रव में वह अनमोल साहित्य अग्नि भेंट हो गया।

स्वामी भीष्म

स्वामी भीष्म जी का जन्म 7 मार्च 1859 ई0 में कुरुक्षेत्र जिले के तेवड़ा ग्राम में श्री बारूराम पांचाल के गृह मेें हुआ था। बचपन में इनका नाम लाल सिंह था। इनकी बचपन से ही अध्ययन में रूचि थी। आपने 11 वर्ष की आयु में गाना शुरु कर दिया था और उस समय उपलब्ध नवीन वेदान्त की बहुत सी पुस्तकों का अध्ययन किया था। प्रबल वैराग्य के कारण 1881 में इन्द्रिय छेदन की कड़ी शर्त का पालन करके एक पौराणिक साधु से संन्यास लिया। उन्होंने इनका नाम ब्र0 आत्मप्रकाश रखा, पर आप को भीष्म के नाम से जाना गया। इनकी आर्यसमाजी बनने की कथा बड़ी रोचक है। आर्यसमाज को आप धर्म विरोधी समझते थे और आर्यसमाज का नाम सुनना भी पसन्द नहीं करते थे। एक बार बली ग्राम के डेरे में कोई नया नया आर्यसमाजी इनको साधु समझकर सत्यार्थ प्रकाश के किसी प्रकरण को समझने के लिये आया। स्वामी जी ने सत्यार्थप्रकाश का नाम सुनकर अपनी घृणा प्रकट की। जिज्ञासु के बार बार आग्रह करने पर स्वामी जी ने सत्यार्थप्रकाश को देखा तो उसके अन्दर डूबते चले गए। जिज्ञासु को समझाते समझाते वे स्वयं ही समझ गए और उनका जीवन पूरी तरह से बदल गया। उस समय स्वामीजी की आयु 37 वर्ष की थी। उसके बाद तो स्वामी जी आर्यसमाज के प्रचारक बन गए। उन्होंने दिल्ली को अपना केन्द्र बनाया और देश भर में आर्यसमाज का प्रचार प्रसार किया। उन्होंने राष्ट्रीय आन्दोलन में भी बढ़-चढ़ कर भाग लिया और अनेक क्रांतिकारियों से उनके आत्मीय संबंध रहे। स्वामी श्रद्धानन्द जी के अछूतोद्धार व शुद्धि के कार्यों में उनका अप्रतिम योगदान रहा। यहाँ तक कि स्वामी जी स्वामी श्रद्धानन्द जी के आदेश से विधर्मियों द्वारा अपहृत हिन्दू कन्याओं को छुड़ाकर लाते थे और उनको पुनः वैदिक धर्मी बनाते थे।

स्वामी भीष्म जी पूरे देश में विशेषकर उत्तर भारत में बहुत प्रभावशाली भजनोपदेशक के रूप में जाने गए। उनके प्रभाव का यह आलम था कि दिल्ली में एक बार एक पौराणिक साधु ने उनका भजनोपदेश सुना तो वह आर्यसमाजी हो गए। वे स्वामी रामेश्वरानन्द थे जो अनेक बार सांसद रहे। उनकी भजन पार्टी का अनेक बार सांगियों से मुकाबला हुआ। उनके शिष्य स्व0 पं0 चन्द्रभानु आर्य के अनुसार एक बार उ0 प्र0 के एक गांव में स्वामी जी की भजन मण्डली और वहाँ के मशहूर सांगी होशियारा का एक साथ ही एक गांव में जाना हो गया। कई दिन तक सांग और भजनों का आमना सामना होता रहा। सांग में हाजरी रोज घटती रही और स्वामी जी के प्रचार में बढ़ती रही। आखिर सांग पार्टी वहाँ से प्रस्थान कर गई और स्वामीजी ने जमकर प्रचार किया।

स्वामी भीष्म जी ने 124 वर्ष की दीर्घायु पाई। उन्होंने बहुत दीर्घकाल तक गाया और बहुत कुछ लिखा। डाॅ0 भवानीलाल भारतीय जी ने स्वामी जी द्वारा लिखित पुस्तकों की सूची स्वामी भीष्म अभिनन्दन ग्रंथ में दी है। खेद है कि उनका सम्पूर्ण साहित्य अभी तक पुनप्र्रकाशित नहीं हो पाया है। उनके भजनोपदेशक शिष्यों की सूची भी बहुत लम्बी है। हरियाणा में जन्मे उनके प्रमुुख शिष्य स्वामी विद्यानन्द, स्व0 चैधरी नत्थासिंह, स्व0 पं0 ताराचन्द वैदिक तोप, स्व0 पं0 चन्द्रभान, स्व0 पं0 ज्योति स्वरूप, स्व0 पं0 हरलाल, स्वामी रुद्रवेश आदि ने विशेष यश प्राप्त किया। 24 मई 1981 को कुरुक्षेत्र में भारत के गृहमंत्री ज्ञानी जैलसिंह की अध्यक्षता में आपका सार्वजनिक अभिनन्दन हुआ। 8 जनवरी 1984 ई0 को आपका निधन हुआ।

चौधरी ईश्वरसिंह गहलोत
चौधरी ईश्वरसिंह आर्यसमाज के बहुत प्रभावशाली कवि एवं भजनोपदेशक थे। आपका जन्म सन् 1885 ई0 में दिल्ली के ग्राम काकरोला मेें हुआ था। आपके पिताजी का नाम श्री रामकिशन था जो एक साधारण किसान थे। ईश्वर सिंह किशोरावस्था में ही थे कि उनके पिता का देहान्त हो गया। ईश्वरसिंह बचपन से ही आर्यसमाज से प्रभावित थे। गाने का भी शौक था। पैतृक व्यवसाय कृषि करते करते आर्यसमाज की गतिविधियों में भाग लेते थे। इसी क्रम में आर्यसमाज नजफगढ़ के उत्सव में मास्टर नत्थूसिंह के भजन सुने और उन जैसा बनने का संकल्प ले लिया। मास्टर नत्थूसिंह बहुत पुराने और प्रभावशाली भजनोपदेशक थे। इनका उल्लेख हरयाणा आर्यसमाज के प्रारम्भिक नेता डाॅ0 रामजीलाल हुड्डा ने अपनी डायरियों में किया है। अगली बार के उत्सव में ईश्वरसिंह ने आर्यसमाज में भजन प्रस्तुत किये जो बहुत पसन्द किये। आर्यसमाज के वरिष्ठों ने उन्हें बहुत प्रोत्साहित किया।

चैधरी ईश्वरसिंह का कण्ठ बहुत सुरीला था। साथ ही वे बहुत ऊँची और मीठी आवाज में गाते थे। उन्होंने गायन और लेखन की एक नई शैली का विकास किया। उनकी प्रसिद्धि और प्रभाव के बारे में आज भी बुजुर्गों से अनेक किंवदन्तियाँ सुनी जा सकती हैं। कहते हैं कि उनके प्रचार में 80 लालटेन जलती थीं। यह उपस्थिति का पैमाना है। दूर दूर से लोग उनको सुनने आते थे। कुरुक्षेत्र और भैंसवाल के ऐेसे अनेक प्रसंग हैं जब ग्रामीणों ने आर्यसमाज के बड़े विद्वानों के भाषण को रोककर चैधरी ईश्वरसिंह के भजन सुनाने की मांग की। चैद्दरी ईश्वरसिंह के भजनों के आगे सांगियों के ठुमके फेल हो जाते थे। शांतिधर्मी के संस्थापक स्व0 पं0 चन्द्रभानु आर्य भजनोपदेशक अपने गुरु स्वामी भीष्म जी के हवाले से लिखते हेैं कि करनाल के गांव मुंडलाना में चैधरी ईश्वरसिंह का मुकाबला पं0 लखमीचन्द की सांग पार्टी से हुआ। 13 दिन तक मुकाबला चलता रहा। आखिर सांगी भाग गए और ईश्वर सिंह 14 वें दिन भी विजय पताका फहरा कर गए। चैधरी ईश्वरसिंह लेखनी के भी धनी थे। उन्होंने हजारों भजनों की रचना की जो सैंकड़ों पुस्तकों में समाहित है। उनकी रचनाओं का पुनप्र्रकाशन परममित्र मानव निर्माण संस्थान की ओर से दो खण्डों में हुआ है। चैधरी ईश्वरसिंह ने समुदाय के उत्थान में भी महत्त्वपूर्ण योगदान किया। हरयाणा में शिक्षा का प्रचार नहीं था। लाहौर में पढ़ने वाले चार मित्रों ने हरयाणा में शिक्षा संस्थान खोलने का निश्चय किया। रोहतक, हिसार और संगरिया में ये शिक्षण संस्थाएँ खुलीं। चैधरी ईश्वरसिंह ने इस प्रकरण पर ‘बलदेव भेंट’ लिखी और इन संस्थाओं का व्यापक प्रचार प्रसार किया। गुरुकुल कुरुक्षेत्र, गुरुकुल मण्टिडु के प्रचार में भी सहयोग किया। गुरुकुल भैंसवाल के लिये भी इनका विशेष सहयोग रहा। इनका देहान्त 1958 ई0 में हुआ।

स्वामी नित्यानन्द

स्वामी नित्यानन्द का संन्यास पूर्व नाम चैधरी न्योनन्दसिंह धनखड़ था। आप चैधरी ईश्वरसिंह के शिष्य थे। आपका जन्म किलोई जिला झज्जर में सन 1887 में एक धार्मिक किसान श्री झण्डाराम के गृह में हुआ था। आपने हरयाणा के ग्राम ग्राम में आर्यसमाज का प्रचार किया। आप खड़ताल पर गाते थे। इनका विशालकाय शरीर था। आपके भजन और उपदेशों का जनता पर जादू जैसा प्रभाव पड़ता था। वे पाखण्ड, अंधविश्वास और अविद्या पर कठोर प्रहार करते थे। वे निर्भीक, निर्लोभ और सच्चे साधु थे। इनका सादगीपूर्ण जीवन भी प्रेरणास्रोत था। स्वामी नित्यानन्द सरल और लोकप्रिय तर्जों पर भजनों की रचना करते थे। इनके भजनों के द्वारा आर्यसमाज का जबरदस्त प्रचार हुआ। ग्रामीण बहनों ने इनकी रचनाओं का बहुत प्रयोग किया। आज भी स्वामी नित्यानन्द के भजन गांव गांव में माताओं की जुबान से सुने जा सकते हैं। ये वास्तव में लोककवि थे। इनकी कुछ रचनाओं का संग्रह हरयाणा में प्रशासनिक अधिकारी श्री महेन्द्रसिंह धनखड़ ने प्रकाशित कराया था।

स्वामी नित्यानन्द जी ने गुरुकुलों, शिक्षण संस्थाओं के प्रचार में अप्रतिम योगदान किया। लड़कियों को गुरुकुलों में पढ़ाने के लिए प्रेरित किया और आर्य शिक्षा संस्थाओं के लिये धन संग्रह का कार्य किया। उन्होंने स्वयं भी कासनी में कन्या पाठशाला खोली। उन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलन में भी बढ़ चढ़ कर भाग लिया। हैदराबाद और लोहारू के आन्दोलनों में आपने अनेक यातनाएँ सहीं। लोहारू में नवाब के गुण्डों के आक्रमण से आपको सिर पर गंभीर चोट आई थी। महात्मा भगत फूलसिंह के आप अनन्य सहयोगी थे। आपने अपने जीवन में अनेक आर्यसमाजों की स्थापना की। 24 अप्रैल 1977 को आपका देहान्त हो गया।

स्वामी केवलानन्द

आपका जन्म ग्राम कारौली जिला रेवाड़ी में एक ब्राह्मण परिवार में 1871 ई0 हुआ था। आप स्वामी श्रद्धानन्द के प्रभाव से आर्य समाज में आये। आप इकतारा और खड़ताल पर गाते थे। आपने पाखण्ड और अंधविश्वास के निवारण में और आर्य द्दर्म के प्रचार में आजीवन परिश्रम किया। उन्होंने अपना कोई मठ या आश्रम नहीं बनाया। वे त्यागी, तपस्वी साधु थे। प्रचार के साथ साथ उन्होंने समाज सुधार के लिए धरातल पर कार्य किया। उन्होंने कसाईयों को गाय बेचने पर अपने क्षेत्र में पंचायती तौर पर प्रतिबंध लगवाया। उन्होंने अनेक भजनों की रचना की। उनकी तीन भजनों की पुस्तकें प्रकाशित हुई थीं जो अब प्रायः नहीं मिलती हैं। (पोप की पोपणी हमारे संग्रह में है।) उन्होंने स्वतंन्त्रता आन्दोलन में भी भाग लिया। हैदराबाद आन्दोलन में जेलयात्रा की और लोहारू आन्दोलन में यातनाएँ सहीं। अहीरवाल क्षेत्र के आर्य नेता महाशय हीरालाल के साथ उनका अहीरवाल के गांव गांव में आर्यसमाज को पहुंचाने में अतुल्य योगदान रहा है। आपका निद्दन 1943 में हो गया।

महाशय बुद्धिधर

आपका जन्म 1895 में लुहाना जिला रेवाड़ी में हुआ था। आप आर्य समाज के बड़े प्रभावशाली भजनोपेदेशक थे। आपने समाज को अंधविश्वासों से मुक्ति दिलाने में महती भूमिका निभाई। इनकी दो पुस्तकें प्रकाशित हुईं- ‘अमृतगीता’ और ‘सतसार’। आपका सिद्धान्त ज्ञान भी गहन था। अनेक स्थानों पर पौराणिकों और विधर्मियों से शास्त्रार्थ किये और विजय प्राप्त की।


चौधरी पृथ्वीसिंह बेधड़क


चौधरी पृथ्वीसिंह बेधड़क आर्यसमाज के अद्वितीय प्रतिभाशाली और प्रभावशाली भजनोपदेशक थे। आपने भजनोपदेश की नई फास्ट शैैली को जन्म दिया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार आप अनेक प्रकरणों पर एक साथ शुरुआत करते थे और चामत्कारिक ढंग से उसका समापन करते थे। प्राचीन हरियाणा के गांव गांव में आपका यश अब भी दुखा सुना जा सकता है। आप अत्यंत प्रतिभाशाली कवि थे। आपकी रचनाओं में अनुप्रास की निराली छटा दिखाई देती है। आपने भारत वर्ष के प्राचीन इतिहास की अनेक कथाओं को भजनों के माध्यम से प्रस्तुत किया। उनके भजनों का संग्रह भी चैद्दरी मित्रसेन आर्य ने पुनः प्रकाशित करा दिया था। आपका जन्म ग्राम शिकोहपुर जिला बागपत में हुआ था। भजनोपदेश के साथ साथ आपका सामाजिक प्रभाव भी अद्वितीय था। आपके भजनों में एक अलग ही आकर्षण था। पृथ्वीसिंह बेधड़क के नाम में आज भी आकर्षण है।


पं0 बहोतराम
आपका जन्म ग्राम जुडौला, जिला गुड़गांव में एक सामान्य कृषक परिवार में हुआ। आपने पुराणों का विशेष अध्ययन किया था। आपके भजनों में अवैदिक मान्यताओं का तर्कपूर्ण प्रामाणिक खण्डन मिलता है। पोपों का तो आपका नाम सुनकर ही हृदय कांपता था। आप रात को प्रचार करते। सुबह लोगों को यज्ञ में भाग लेने के लिये पे्ररित करते। संध्या हवन सिखाते और यज्ञोपवीत प्रदान करते। इनकी एक पुस्तक हमारे संग्रह में विद्यमान है।

दादा शिवनारायण

पं0 शिवनारायण का जन्म जींद के गांव डहोला में हुआ था। आप लोकप्रिय तर्जों में गाते थे। आप पाखण्ड का बहुत कठोर शब्दों में खण्डन करते थे। आपने आर्य प्रतिनिद्दि सभा पंजाब संयुक्त के माध्यम से भी प्रचार किया। कठोर खण्डन और शास्त्रार्थ के बीच कई बार शस्त्रार्थ भी हो जाता था। 1953 ई0 (अनुमानित) में उचाना मण्डी में मृतक-श्राद्ध का खण्डन करने पर लोग लाठियाँ जेलियाँ लेकर लोग इनको मारने चढ़ आये थे। स्व0 पं0 चन्द्रभान आर्य ने चिमटा लेकर उनको ललकारा। कुछ समय में आर्य समाज के लोग भी आ गए और मुश्किल से मामला शांत हुआ। आर्यसमाज के पुराने बुजुर्ग अब भी इनका नाम बड़े सम्मान से लेते हैं। खेद है कि इनकी कोई भी रचना उपलब्ध नहीं है। इनके परिवार के लोग भी अब संभवतः दिल्ली में रहते हैं।


स्वामी बेधड़क

आपका जन्म जींद के धमतान गांव में एक दलित (द्दाणक) परिवार में हुआ था। आप आर्यसमाज के जांति पांति के विरुद्ध आन्दोलन के जीवित जाग्रत उदाहरण थे। आप अपने प्रचार में कहते थे- आर्यसमाज ने मुझे स्वामी बना दिया। आप वास्तव में ही बेधड़क थे। एक बार पानीपत के गांव बापौली में स्व0 पं0 चन्द्रभानु आर्य के साथ गये थे। (तब प्रायः जूनियर भजनोपदेशक की पार्टी के साथ सीनियर भजनोपदेशक भेजे जाते थे।) गांव में पहुंचने में देर हो गई। प्रधान लक्ष्मणसिंह वर्मा ने कहा- खाओ पीयो और सो जाओ, अब प्रचार में कौन आयेगा! बेधड़क जी और दादा शिवनारायण ने कहा- सोने नहीं, प्रचार करने आये है। पुराना टीन का पीपा लेकर चैपाल पर चढ़ गए और लगे रुक्के मारने- आओ भाईयो, आर्य समाज का प्रचार होगा। लोग इकट्ठे हो गए, जम कर प्रचार हुआ।


इस लेख की सीमाएँ हैं। वास्तव में आर्यसमाज के भजनोपदेशकों का इतिहास त्याग बलिदान और समर्पण का अप्रतिम इतिहास है। हरयाणा के भजनोपदेशकों में श्री बलबीर सिंह झाभर, पं0 प्रभुदयाल प्रभाकर पौली, महाशय प्यारेलाल भापड़ौदा, पं0 शिवलाल, हरलाल सिंह मंधार, महाशय भोलूराम अलाहर, रामकरण शामलो, रामपत वानप्रस्थी, पं0 शिवकरण जी, महाशय श्रीचन्द मतलौडा, कालूराम कोथ, लालसिंह मिलकपुर, इन्द्रसिंह पेटवाड़, पं0 भूराराम, नत्थूसिंह, नानूराम, रिछपालसिंह, हनुमंतराम, जौहरीसिंह, पं0 भगतराम, वैद्य मंगलदेव गोली आदि आदि ज्ञात-अज्ञात हजारों भजनोपदेशकों का इतिहास लुप्त ही हो रहा है, जिनका समाज के उत्थान में मौलिक योगदान रहा है। इनके विषय में अन्यत्र प्रकाश डालने का प्रयास किया जायेगा। अब तो उन सब ज्ञात अज्ञात नींव के पत्थरों को नमन करते हुए ठाकुर उदयसिंह जी के शब्दों में इस लेख का समापन करते हैं-


शीश पर बिस्तर और बगल में छतरी लगी,
एक हाथ बैग दूजे बालटी संभाली है।
दिन गया धक धक में रात गई बक बक में,
कभी है अपच और कभी पेट खाली है।
जंगल में सलूना और सड़क पे दशहरा मना,
मोटर में होली और रेल में दीवाली है।।
पुत्र मरा सावन में और पत्र मिला फागुन में,
‘ठाकुर’ इन उपदेशकों की दशा भी निराली है।।

संदर्भ ग्रंथ




1- आर्यसमाज का इतिहास सत्यकेतु, 2- आर्य लेखक कोश: डाॅ0 भवानीलाल भारतीय, 3- आर्यसमाज का इतिहास: डाॅ0 धर्मदेव विद्यार्थी, 4- चन्द्रभानु आर्योपदेशक व्यक्तित्व एव कृतित्व, 5- आदर्श भजनमाला: चैधरी ईश्वरसिंह, 6- बस्तीराम सर्वस्व: परममित्र मानव निर्माण संस्थान, 7- शांतिधर्मी मासिक पत्रिका, 8- बेधड़क भजनावली, 9- स्वामी भीष्म अभिनन्दन ग्रंथ

Saturday, January 20, 2018

सद्गुरु रामसिंह कूका और उनके गोभक्त शिष्य



सद्गुरु रामसिंह कूका और उनके गोभक्त शिष्य
17 जनवरी/बलिदान दिवस
17 जनवरी, 1872 की प्रातः ग्राम जमालपुर (मालेरकोटला, पंजाब) के मैदान में भारी भीड़ एकत्र थी। एक-एक कर 50 गोभक्त सिख वीर वहाँ लाये गये। उनके हाथ पीछे बँधे थे। इन्हें मृत्युदण्ड दिया जाना था। ये सब सद्गुरु रामसिंह कूका के शिष्य थे।
अंग्रेज जिलाधीश कोवन ने इनके मुह पर काला कपड़ा बाँधकर पीठ पर गोली मारने का आदेश दिया; पर इन वीरों ने साफ कह दिया कि वे न तो कपड़ा बँधवाएंगे और न ही पीठ पर गोली खायेंगे। तब मैदान में एक बड़ी तोप लायी गयी। अनेक समूहों में इन वीरों को तोप के सामने खड़ा कर गोला दाग दिया जाता। गोले के दगते ही गरम मानव खून के छींटे और मांस के लोथड़े हवा में उड़ते। जनता में अंग्रेज शासन की दहशत बैठ रही थी। कोवन का उद्देश्य पूरा हो रहा था। उसकी पत्नी भी इस दृश्य का आनन्द उठा रही थी।
इस प्रकार 49 वीरों ने मृत्यु का वरण किया; पर 50 वें को देखकर जनता चीख पड़ी। वह तो केवल 12 वर्ष का एक छोटा बालक बिशनसिंह था। अभी तो उसके चेहरे पर मूँछें भी नहीं आयी थीं। उसे देखकर कोवन की पत्नी का दिल भी पसीज गया। उसने अपने पति से उसे माफ कर देने को कहा। कोवन ने बिशनसिंह के सामने रामसिंह को गाली देते हुए कहा कि यदि तुम उस धूर्त का साथ छोड़ दो, तो तुम्हें माफ किया जा सकता है।
यह सुनकर बिशनसिंह क्रोध से जल उठा। उसने उछलकर कोवन की दाढ़ी को दोनों हाथों से पकड़ लिया और उसे बुरी तरह खींचने लगा। कोवन ने बहुत प्रयत्न किया; पर वह उस तेजस्वी बालक की पकड़ से अपनी दाढ़ी नहीं छुड़ा सका। इसके बाद बालक ने उसे धरती पर गिरा दिया और उसका गला दबाने लगा। यह देखकर सैनिक दौड़े और उन्होंने तलवार से उसके दोनों हाथ काट दिये। इसके बाद उसे वहीं गोली मार दी गयी। इस प्रकार 50 कूका वीर उस दिन बलिपथ पर चल दिये।
गुरु रामसिंह कूका का जन्म 1816 ई0 की वसन्त पंचमी को लुधियाना के भैणी ग्राम में जस्सासिंह बढ़ई के घर में हुआ था। वे शुरू से ही धार्मिक प्रवृत्ति के थे। कुछ वर्ष वे महाराजा रणजीत सिंह की सेना में रहे। फिर अपने गाँव में खेती करने लगे। वे सबसे अंग्रेजों का विरोध करने तथा समाज की कुरीतियों को मिटाने को कहते थे। उन्होंने सामूहिक, अन्तरजातीय और विधवा विवाह की प्रथा चलाई। उनके शिष्य ही ‘कूका’ कहलाते थे।
कूका आन्दोलन का प्रारम्भ 1857 में पंजाब के विख्यात बैसाखी पर्व (13 अप्रैल) पर भैणी साहब में हुआ। गुरु रामसिंह जी गोसंरक्षण तथा स्वदेशी के उपयोग पर बहुत बल देते थे। उन्होंने ही सर्वप्रथम अंग्रेजी शासन का बहिष्कार कर अपनी स्वतन्त्र डाक और प्रशासन व्यवस्था चलायी थी।
मकर संक्रान्ति मेले में मलेरकोटला से भैणी आ रहे गुरुमुख सिंह नामक एक कूका के सामने मुसलमानों ने जानबूझ कर गोहत्या की। यह जानकर कूका वीर बदला लेने को चल पड़े। उन्होंने उन गोहत्यारों पर हमला बोल दिया; पर उनकी शक्ति बहुत कम थी। दूसरी ओर से अंग्रेज पुलिस एवं फौज भी आ गयी। अनेक कूका मारे गये और 68 पकड़े गये। इनमें से 50 को 17 जनवरी को तथा शेष को अगले दिन मृत्युदण्ड दिया गया।
अंग्रेज जानते थे कि इन सबके पीछे गुरु रामसिंह कूका की ही प्रेरणा है। अतः उन्हें भी गिरफ्तार कर बर्मा की जेल में भेज दिया। 14 साल तक वहाँ काल कोठरी में कठोर अत्याचार सहकर 1885 में सदगुरु रामसिंह कूका ने अपना शरीर त्याग दिया।

मनुस्मृति में शूद्रों की स्थिति



*🥀मनुस्मृति में शूद्रों की स्थिति🥀*

मनुस्मृति के अन्तःसाक्ष्यों पर दृष्टिपात करने पर हमें कुछ अत्यन्त महत्त्वपूर्ण एवं आधारभूत तथ्य उपलब्ध होते हैं जो शूद्रों के विषय में मनु की भावनाओं का संकेत देते हैं। वे इस प्रकार हैं―

*🌻(1) दलितों-पिछड़ों को शूद्र नहीं कहा*―आजकल की दलित, पिछड़ी और जनजाति कही जाने वाली जातियों को मनुस्मृति में कहीं 'शूद्र' नहीं कहा गया है। मनु की वर्णव्यवस्था है, अतः सभी व्यक्तियों के वर्णों का निश्चय गुण-कर्म-योग्यता के आधार पर किया गया है, जाति के आधार पर नहीं। यही कारण है कि शूद्र वर्ण में किसी जाति की गणना करके ये नहीं कहा है कि अमुक-अमुक जातियां 'शूद्र' हैं। परवर्ती समाज और व्यवस्थाकारों ने समय-समय पर शूद्र संज्ञा देकर कुछ वर्णों को शूद्रवर्ग में सम्मिलित कर दिया। कुछ लोग भ्रान्तिवश इसकी जिम्मेदारी मनु पर थोंप रहे हैं। विकृत व्यवस्थाओं का दोषी तो है परवर्ती समाज, किन्तु उसका दण्ड मनु को दिया जा रहा है। न्याय की मांग करने वाले दलित प्रतिनिधियों का यह कैसा न्याय है?

*🌻(2) मनुकृत शूद्रों की परिभाषा वर्तमान शूद्रों पर लागू नहीं होती*―मनु द्वारा दी गई शूद्र की परिभाषा भी आज की दलित और पिछड़ी जातियों पर लागू नहीं होती। मनुकृत शूद्र की परिभाषा है―जिनका ब्रह्मजन्म=विद्याजन्म रुप दूसरा जन्म होता है, वे 'द्विजाति' ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य हैं। जिनका ब्रह्मजन्म नहीं होता वह 'एकजाति' रहने वाला शूद्र है। अर्थात् जो बालक निर्धारित समय पर गुरु के पास जाकर संस्कारपूर्वक वेदाध्ययन, विद्याध्ययन और अपने वर्ण की शिक्षा-दीक्षा प्राप्त करता है, वह उसका 'विद्याजन्म' नामक दूसरा जन्म है, जिसे शास्त्रों में 'ब्रह्मजन्म' कहा गया है। जो जानबूझकर, मन्दबुद्धि के कारण अथवा अयोग्य होने के कारण 'विद्याध्ययन' और उच्च तीन द्विज वर्णों में से किसी भी वर्ण की शिक्षा-दीक्षा नहीं प्राप्त करता, वह अशिक्षित व्यक्ति एकजाति=एक जन्म वाला' अर्थात् शूद्र कहलाता है। इसके अतिरिक्त उच्च वर्णों में दीक्षित होकर जो निर्धारित कर्मों को नहीं करता, वह भी शूद्र हो जाता है (मनु० २.१२६, १६९, १७०, १७२; १०.४ आदि। इस विषयक एक-दो प्रमाण द्रष्टव्य हैं―
*(अ) ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः, त्रयो वर्णाः द्विजातयः ।*
*चतुर्थः एकजातिस्तु शूद्रः नास्ति तु पंचमः ।।*
―(मनु० १०.४)
*अर्थात्*–ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, इन तीन वर्णों को द्विजाति कहते हैं, क्योंकि इनका दूसरा विद्याजन्म होता है। चौथा वर्ण एकजाति=केवल माता-पिता से ही जन्म प्राप्त करने वाला और विद्याजन्म न प्राप्त करने वाला, शूद्र है। इन चारों वर्णों के अतिरिक्त कोई वर्ण नहीं है।

*(आ) शूद्रेण हि समस्तावद् यावद् वेदे न जायते ।*
―(२.१७२)
*अर्थात्*―जब तक व्यक्ति का ब्रह्मजन्म=वेदाध्ययन रुप जन्म नहीं होता, तब तक वह शूद्र के समान ही होता है।

*(इ) न वेत्ति अभिवादस्य.....यथा शूद्रस्तथैव सः ।*
―(२.१२६)
*अर्थात्*–जो अभिवादन विधि का ज्ञान नहीं रखता, वह शूद्र ही है।

*(ई) "प्रत्यवायेन शूद्रताम्"*―(४.२४५)
*अर्थात्*–ब्राह्मण, हीन लोगों के संग और आचरण से शूद्र हो जाता है।

बाद तक भी शूद्र की यही परिभाषा रही है―
*(उ) जन्मना जायते शूद्रः, संस्काराद् द्विज उच्यते ।*
―(स्कन्दपुराण)
*अर्थात्*―प्रत्येक व्यक्ति जन्म से शूद्र होता है, उपनयन संस्कार में दीक्षित होकर ही द्विज बनता है।

मनु की यह यह व्यवस्था अब भी बालिद्वीप में प्रचलित है। वहाँ 'द्विजाति' और 'एकजाति' संज्ञाओं का ही प्रयोग होता है। शूद्र को अस्पृश्य नहीं माना जाता।

*🌻(3) शूद्र अस्पृश्य नहीं*―अनेक श्लोकों से ज्ञात होता है कि शूद्रों के प्रति मनु की मानवीय सद्भावना थी और वे उन्हें अस्पृश्य, निन्दित अथवा घृणित नहीं मानते थे। मनु ने शूद्रों के लिए उत्तम, उत्कृष्ट, शुचि जैसे विशेषणों का प्रयोग किया है, ऐसा विशेष्य व्यक्ति कभी अस्पृश्य या घृणित नहीं माना जा सकता (९.३३५)। शूद्रों को द्विजाति वर्णों के घरों में पाचन, सेवा आदि श्रमकार्य करने का निर्देश दिया है (१.९१; ९.३३४-३३५)। किसी द्विज के यहाँ यदि कोई शूद्र अतिथिरुप में आ जाये तो उसे भोजन कराने का आदेश है (३.११२)। द्विजों को आदेश है कि अपने भृत्यों को, जो कि शूद्र होते थे, पहले भोजन कराने के बाद, भोजन करें (३.११६)। क्या आज के वर्णरहित सभ्य समाज में भृत्यों को पहले भोजन कराया जाता है? और उनका इतना ध्यान रखा जाता है? कितना मानवीय, सम्मान और कृपापूर्ण दृष्टिकोण था मनु का।

वैदिक वर्णव्यवस्था में परमात्मापुरुष अथवा ब्रह्मा के मुख, बाहु, जंघा, पैर से क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र की आलंकारिक उत्पत्ति बतलायी है (१.३१)। इससे तीन निष्कर्ष निकलते हैं। एक, चारों वर्णों के व्यक्ति परमात्मा की एक जैसी सन्तानें हैं। दूसरा, एक जैसी सन्तानों में कोई अस्पृश्य और घृणित नहीं होता। तीसरा, एक ही शरीर का अंग 'पैर' अस्पृश्य या घृणित नहीं होता है। ऐसे श्लोकों के रहते कोई तटस्थ व्यक्ति क्या यह कह सकता है कि मनु शूद्रों को अस्पृश्य और घृणित मानते थे?

*🌻(4) शूद्र को सम्मान व्यवस्था में छूट*―मनु ने सम्मान के विषय में शूद्रों को विशेष छूट दी है। मनुविहित सम्मान-व्यवस्था में प्रथम तीन वर्णों में अधिक गुणों के आधार पर अधिक सम्मान देने का कथन है जिनमें विद्यावान् सबसे अधिक सम्मान्य है (२.१११, ११२, १३०)। किन्तु शूद्र के प्रति अधिक सद्भाव प्रदर्शित करते हुए उन्होंने विशेष विधान किया है कि द्विज वर्ण के व्यक्ति वृद्ध शूद्र को पहले सम्मान दें, जबकि शूद्र अशिक्षित होता है। यह सम्मान पहले तीन वर्णों में किसी को नहीं दिया गया है―

*"मानार्हः शूद्रो ऽपि दशमीं गतः"*-(२.१३७)
*अर्थात्*–वृद्ध शूद्र को सभी द्विज पहले सम्मान दें। शेष तीन वर्णों में अधिक गुणी पहले सम्मान का पात्र है।

*🌻(5) शूद्र को धर्मपालन की स्वतन्त्रता―*
*"न धर्मात् प्रतिषेधनम्"*(१०.१२६) अर्थात्–'शूद्रों को धार्मिक कार्य करने का निषेध नहीं है' यह कहकर मनु ने शूद्र को धर्मपालन की स्वतन्त्रता दी है। इस तथ्य का ज्ञान उस श्लोक से भी होता है जिसमें मनु ने कहा है कि 'शूद्र से भी उत्तम धर्म को ग्रहण कर लेना चाहिए' (२.२१३)। वेदों में शूद्रों को स्पष्टतः यज्ञ आदि करने और वेदशास्त्र पढ़ने का अधिकार दिया है―

*यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्यः ।*
*ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय ।।*
―(यजुर्वेद २६.२)
*अर्थात्*–मैंने इस कल्यणकारिणी वेद वाणी का उपदेश सभी मनुष्यों–ब्राह्मण, क्षत्रिय, शूद्र, वैश्य, स्वाश्रित स्त्री-भृत्य आदि और अतिशूद्र आदि के लिए किया है।

मनु की प्रतिज्ञा है कि उनकी मनुस्मृति वेदानुकूल है, अतः वेदाधारित होने के कारण मनु की भी वही मान्यताएं हैं। यही कारण है कि उपनयन प्रसंग में कहीं भी शूद्र के उपनयन का निषेध नहीं किया है, क्योंकि शूद्र तो तब कहाता है, जब कोई उपनयन नहीं कराता।

*🌻(6) दण्डव्यवस्था में शूद्र को सबसे कम दण्ड*―आइये, अब मनुविहित दण्डव्यवस्था पर दृष्टिपात करते हैं। यह कहना नितान्त अनुचित है कि मनु ने शूद्रों के लिए कठोर दण्डों का विधान किया है और ब्राह्मणों को विशेषाधिकार एवं विशेष सुविधाएं प्रदान की हैं। मनु की दण्डव्यवस्था के मानदण्ड हैं―गुण-दोष, और आधारभूत तत्व हैं―बौद्धिक स्तर, सामाजिक स्तर, पद, अपराध का प्रभाव। मनु की दण्डव्यवस्था यथायोग्य दण्डव्यवस्था है, जो मनोवैज्ञानिक है। यदि मनु वर्णों में गुण-कर्म-योग्यता के आधार पर उच्च वर्णों को अधिक सम्मान और सामाजिक स्तर प्रदान करते हैं तो अपराध करने पर उतना ही अधिक दण्ड भी देते हैं। इस प्रकार मनु की यथायोग्य दण्ड व्यवस्था में शूद्र को सबसे कम दण्ड है, और ब्राह्मण को सबसे अधिक, राजा को उससे भी अधिक। मनु की यह सर्वमान्य दण्डव्यवस्था है, जो सभी दण्डस्थानों पर लागू होती है―

*अष्टापाद्यं तु शूद्रस्य स्तेये भवति किल्विषम्*
*षोडशैव तु वैश्यस्य द्वात्रिंशत् क्षत्रियस्य च ।।*
*ब्राह्मणस्य चतुःषष्टिः पूर्णं वाऽपि शतं भवेत् ।*
*द्विगुणा वा चतुःषष्टिः, तद्दोषगुणविद्धि सः ।।*
―(८.३३७-३३८)
*अर्थात्*–किसी चोरी आदि के अपराध में शूद्र को आठ गुणा दण्ड दिया जाता है तो वैश्य को सोलहगुणा, क्षत्रिय को बत्तीस गुणा, ब्राह्मण को चौंसठगुणा, अपितु उसे सौगुणा अथवा एक सौ अट्ठाईसगुणा दण्ड करना चाहिए क्योंकि उत्तरोत्तर वर्ण के व्यक्ति अपराध के गुण-दोषों और उनके परिणामों, प्रभावों आदि को भलीभांति समझने वाले हैं।

इसके साथ ही मनु ने राजा को आदेश दिया है कि उक्त दण्ड से किसी को छूट नहीं दी जानी है, चाहे वह आचार्य, पुरोहित और राजा के पिता-माता ही क्यों न हों। राजा दण्ड दिये बिना मित्र को भी न छोड़े और कोई समृद्ध व्यक्ति शारीरिक अपराधदण्ड के बदले में विशाल धनराशि देकर छूटना चाहे तो उसे भी न छोड़े (८.३३५, ३४७)

देखिए, मनु की दण्डव्यवस्था कितनी मनोवैज्ञानिक, न्यायपूर्ण, व्यावहारिक और श्रेष्ठप्रभावी है। इसकी तुलना आज की दण्डव्यवस्था से करके देखिए, दोनों का अन्तर स्पष्ट हो जायेगा।

मनु की दण्डव्यवस्था अपराध की प्रकृति पर निर्भर है। वे गम्भीर अपराध में यदि कठोर दण्ड का विधान करते हैं तो चारों वर्णों को ही, और यदि सामान्य अपराध में सामान्य दण्ड का विधान करते हैं, तो वह भी चारों वर्णों के लिए सामान्य होता है। शूद्रों के लिए जो कठोर दण्डों का विधान मिलता है वह प्रक्षिप्त (मिलावटी) श्लोकों में है। उक्त दण्डनीति के विरुद्ध जो श्लोक मिलते हैं, वे मनुरचित नहीं हैं।

*🌻(7) शूद्र दास नहीं है*–शूद्र से दासता कराने अथवा जीविका न देने का कथन मनु के निर्देशों के विरुद्ध है। मनु ने सेवकों, भृत्यों का वेतन, स्थान और पद के अनुसार नियत करने का आदेश राजा को दिया है और यह सुनिश्चित किया है कि उनका वेतन अनावश्यक रुप से न काटा जाये (७.१२५-१२६;८.२१६)

*🌻(8) शूद्र सवर्ण हैं*―वर्तमान मनुस्मृति को उठाकर देख लीजिए, उनकी ऐसी कितनी ही व्यवस्थाएं हैं, जिन्हें परवर्ती समाज ने अपने ढंग से बदल लिया है। मनु ने शूद्र सहित चारों वर्णों को सवर्ण माना है, चारों से भिन्न को असवर्ण (१०.४,४५), किन्तु परवर्ती समाज शूद्र को असवर्ण कहने लग गया। मनु ने शिल्प, कारीगरी आदि कार्य करने वाले लोगों को वैश्य वर्ण के अन्तर्गत माना है (३.६४;९.३२९;१०.९९;१०.१२०), किन्तु परवर्ती समाज ने उन्हें भी शूद्रकोटि में ला खड़ा कर दिया। दूसरी ओर, मनु ने कृषि, पशुपालन को वैश्यों का कार्य माना है (१.९०), किन्तु सदियों से ब्राह्मण और क्षत्रिय भी कृषि-पशुपालन कर रहे हैं, उन्हें वैश्य घोषित नहीं किया। इसको मनु की व्यवस्था कैसे माना जा सकता है?

_इस प्रकार मनु की व्यवस्थाएं न्यायपूर्ण हैं। उन्होंने न शूद्र और न किसी अन्य वर्ण के साथ अन्याय या पक्षपात किया है।_

*[साभार–"मनु का विरोध क्यों?" पुस्तक से,लेखक-डॉ० सुरेन्द्र कुमार]*


कम्युनिष्ट कल आज और कल



कम्युनिष्ट कल आज और कल


कम्यूनिष्टो की चालबाजिया आज नई नहीं हैं. इनकी भारत व मानवता विरोधी कार्यशैली पर इतिहास की महान हस्तियों के विचार देखें
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नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के विचार-
1-
5 जनवरी 1928 को कलकत्ता में अखिल भारतीय युवक सम्मेलन में उन्होंने कहा- मैं उन लोगों में से नहीं हूं जो जो आधुनिकता के जोश में अतीत के गौरव को भूल जाते हैं। हमें भूतकाल को अपना आधार बनाना है। भारत की संस्कृति को सुनिश्चित धाराओं में विकसित करते जाना है। विश्व को देने के लिए हमारे पास दर्शन, साहित्य, कला आदि बहुत कुछ है। हमें नए और पुराने का मेल करना है।

उनका कहना था कि व्यक्ति केवल रोटी खाकर ही जीवित नहीं रहता, उसके लिए नैतिक और आध्यात्मिक खुराक की भी आवश्यकता होती है।

कम्युनिज्म किसी भी ढंग से राष्ट्रवाद के बारे में सहानुभूति नहीं रखता और न ही यह भारतीय आंदोलन को एक राष्ट्रीय आंदोलन मानता है।
(शिशिर कुमार घोष, नेताजी सलेक्टेड वक्र्स, भाग-2 पृष्ठ 351)

2--
साम्यवाद तथा फासिज्म के बारे में सुभाष बाबू का कहना था- दोनों में समानताएं है, दोनों व्यक्ति पर राज्य की प्रभुता को मानते है। दोनों ही पार्लियामेंटरी प्रजातंत्र को नकारते है। दोनों पार्टी शासन को, पार्टी के अधिनायकवाद को मानते है तथा समस्त असहमत अल्पसंख्यकों के दमन के पक्ष में है।
(शिशिर कुमार घोष, नेताजी सलेक्टेड वक्र्स, भाग-2 पृष्ठ 352)

3--
''इसके प्रमाण के रूप में मैं यह कह सकता हूं कि साम्यवाद की विश्वव्यापी तथा मानवीय अपील के बाद भी साम्यवाद भारत में कोई स्थान नहीं बना पाया है, मुख्यत: क्योंकि उनके द्वारा अपनाए गए तरीके एवं युक्तियां ऐसे हैं, जो दुश्मन बनाते हैं, न कि मित्रों तथा सहयोगियों को जीतते हैं।''
(5 अप्रैल, 1931 अखिल भारतीय नवयुवक भारत सभा कराची में भाषण से)
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डॉ. अंबेडकर उन राष्ट्रीय महान पुरूषों में से थे जिन्होंने राष्ट्रीय एकात्मता, भारतीयता, प्रखर राष्ट्रभक्ति तथा भारतीय जनमानस को आगे बढने की प्रेरणा दी।

कम्युनिस्टों ने अपने मकसद में डॉ. अंबेडकर को अवरोध मानते हुए समय-समय पर उनके व्यक्तित्व पर तीखे प्रहार किए। पूना पैक्ट के बाद कम्युनिस्टों ने डा. अंबेडकर पर 'देशद्रोही', 'ब्रिटीश एजेंट', 'दलित हितों के प्रति गद्दारी करनेवाला', 'साम्राज्यवाद से गठजोड़ करनेवाला' आदि तर्कहीन तथा बेबुनियाद आक्षेप लगाए। इतना ही नहीं, डा. अंबेडकर को 'अवसरवादी', 'अलगाववादी' तथा 'ब्रिटीश समर्थक' बताया।

(गैइल ओंबवेडन, 'दलित एंड द डेमोक्रेटिक रिवोल्यूशन: डॉ. अंबेडकर एंड दी दलित मूवमेंट इन कॉलोनियल इंडिया')

कम्युनिज्म पर डॉ. अंबेडकर के विचार-

'मेरे कम्युनिस्टों से मिलने का प्रश्न ही नहीं उठता। अपने स्वार्थों के लिए मजदूरों का शोषण करनेवाले कम्युनिस्टों का मैं जानी दुश्मन हूं।'

'माक्र्सवाद तथा कम्युनिस्टों ने सभी देशों की धार्मिक व्यवस्थाओं को झकझोर दिया है। माक्र्स और उसके कम्युनिस्ट का पूरा उत्तर बुध्द के विचारों में है। बौध्द धर्म को मानने वाले देश, जो कम्युनिज्म की बात कर रहे हैं, वे नहीं जानते कि कम्युनिज्म क्या है। रूस के प्रकार का जो कम्युनिज्म है, वह रक्त-क्रांति के बाद ही आता है। बुध्द का कम्युनिज्म रक्तहीन क्रांति से आता है। पूर्व के एशियाई देशों को रूस के जाल में फंसने से सावधान रहना चाहिए।'

'संविधान की भर्त्सना ज्यादातर दो हल्कों से है-कम्युनिस्ट पार्टी तथा समाजवादी पार्टी से। वे संविधान को क्यों बुरा कहते हैं। क्या इसलिए कि यह वास्तव में एक बुरा संविधान है। मैं कहना चाहता हूं-नहीं। कम्युनिस्ट चाहते है कि संविधान सर्वहारा की तानाशाही के सिध्दांतों पर आधारित होना चाहिए। वे संविधान की आलोचना इसलिए करते है कि क्योंकि यह संसदीय लोकतंत्र पर आधारित है। समाजवादी दो चीजें चाहते है। प्रथम- यदि वे सत्ता में आएं तो संविधान को बिना किसी क्षतिपूर्ति के व्यक्ति संपत्ति के राष्ट्रीयकरण या समाजीकरण की स्वतंत्रता होनी चाहिए। दूसरे- समाजवादी चाहते है कि संविधान में वर्जित मूल अधिकार पूर्ववत् हों और बिना किसी नियंत्रण के हों, क्योंकि यदि उनकी पार्टी सत्ता में नहीं आई तो उन्हें केवल आलोचनाओं की नहीं, बल्कि राज्य को पलटने की भी हो।'
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आज कम्यूनिष्ट डा अम्बेडकर के नाम का प्रयोग दलितों को भडकाने के लिए करते हैं. दलितों को सावधान रहना चाहिए.
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कम्यूनिष्ट और सेक्यूलरिज्म

कार्ल मार्क्‍स ने बड़े जोर देकर कहा था, 'मजहब लोगों के लिए अफीम के समान है (Religion as the opium of the people)।

आज इस्‍लामिक आतंकवाद पर यदि कोई बोलना चाहता है तो सबसे पहले ये कम्‍युनिस्‍ट ही आतंकी को बचाने में सहायता करने आते हैं।

कुछ साल पहले कोच्चि में माकपा की बैठक में अनोखा नजारा देखने को मिला। मौलवी ने नमाज की अजान दी तो माकपा की बैठक में मध्यांतर की घोषणा कर दी गई। मुसलिम कार्यकर्ता बाहर निकले।
रात को उन्हें रोजा तोड़ने के लिए पार्टी की तरफ से नाश्ता परोसा गया। यह बैठक वहां के रिजेंट होटल हाल में हो रही थी।

कुछ साल हुए. कन्नूर (केरल) से माकपा सांसद केपी अब्दुल्लाकुट्टी हज यात्रा पर गए। जब बात फैली तो सफाई दी कि अकादमिक वजहों से गए थे।

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वहीं जब पश्चिम बंगाल के खेल व परिवहन मंत्री सुभाष चक्रवर्ती तारापीठ मंदिर गए तो पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने तो यहां तक कह दिया, 'सुभाष चक्रवर्ती पागल हैं।

कम्युनिस्ट हिन्दुओं के मानबिन्दुओं का अपमान करने में ही सबसे आगे रहे हैं। इसलिए सीपीएम नेता कडकम्पल्ली सुरेंद्रन जब यह झूठ बोलते हैं कि 'किसी भी संगठन द्वारा मंदिरों का इस्तेमाल हथियारों और शारीरिक प्रशिक्षण के लिए करना श्रद्धालुओं के साथ अन्याय है।' तब हिन्दुओं के खिलाफ किसी साजिश की बू आती है। जिन्होंने कभी हिन्दुओं की चिंता नहीं की, वे हिन्दुओं की आड़ लेकर राष्ट्रवादी विचारधारा पर प्रहार करना चाह रहे हैं।
सरकार की नीयत मंदिरों पर कब्जा जमाने की है। केरल की विधानसभा में एक विधेयक पेश किया गया है। इस विधेयक के पारित होने के बाद केरल के मंदिरों में जो भी नियुक्तियाँ होंगी, वह सब लोक सेवा आयोग (पीएससी) के जरिए होंगी। माकपा सरकार इस व्यवस्था के जरिए मंदिरों की संपत्ति और उनके प्रशासनिक नियंत्रण को अपने हाथ में रखना चाहती है। मंदिरों की देखरेख और प्रबंधन के लिए पूर्व से गठित देवास्वोम बोर्ड की ताकत को कम करना का भी षड्यंत्र माकपा सरकार कर रही है। माकपा सरकार ने देवास्वोम बोर्ड को 'सफेद हाथी' की संज्ञा दी है और इस बोर्ड को समाप्त करना ही उचित समझती है।

दरअसल, दो अलग-अलग कानूनों के जरिए माकपा सरकार ने हिंदू मंदिरों की संपत्ति पर कब्जा जमाने का षड्यंत्र रचा है। एक कानून के जरिए मंदिर के प्रबंधन को सरकार (माकपा) के नियंत्रण में लेना है और दूसरे कानून के जरिए मंदिरों से राष्ट्रवादि विचारधारा को दूर रखना है। ताकि जब कम्युनिस्ट मंदिरों की संपत्ति का दुरुपयोग करें, तब उन्हें टोकने-रोकने वाला कोई उपस्थित न हो।

हमारे प्रगतिशील कामरेड वर्षों से भोपाल गैस कांड को लेकर अमेरिकी कंपनी तथा वहां के शासकों की निर्ममता के विरूध्द आग उगलते रहे हैं। लेकिन भोपाल गैस कांड के लिए दोषी यूनियन कार्बाइड की मातृ संस्था बहुराष्ट्रीय अमेरिकी कंपनी डाऊ केमिकल्स को हल्दिया-नंदीग्राम में केमिकल कारखाना लगाने के लिए बंगाल की कम्युनिस्ट सरकार न्यौता दिया था. यह कैसा मजाक और दोहरा मानदंड है। आप भोपाल गैस कांड के लिए दोषी प्रबंधकों तथा पीड़ितों को मुआवजा न देने वाले लोगों को दंडित करवाने के बजाय उनकी आरती उतारने के लिए बेताब हैं।