Tuesday, December 12, 2017

इस्लामिक अत्याचारों की एक विस्मृत दास्तान



इस्लामिक अत्याचारों की एक विस्मृत दास्तान

डॉ विवेक आर्य

हिन्दू समाज के साथ 1200 वर्षों से मजहब के नाम पर अत्याचार होता आया है। सबसे खेदजनक बात यह है कि कोई इस अत्याचार के बारे में हिन्दुओं को बताये तो हिन्दू खुद ही उसे ही गंभीरता से नहीं लेते क्यूंकि उन्हें सेकुलरता के नशे में रहने की आदत पड़ गई है। रही सही कसर हमारे पाठयक्रम ने पूरी कर दी जिसमें अकबर महान, टीपू सुलतान देशभक्त आदि पढ़ा पढ़ा इस्लामिक शासकों के अत्याचारों को छुपा दिया गया। अब भी कुछ बचा था तो संविधान में ऐसी धारा डाल दी गई। जिसके अनुसार सार्वजनिक मंच अथवा मीडिया में इस्लामिक अत्याचारों पर विचार करना धार्मिक भावनाओं को बढ़काने जैसा करार दिया गया। इस सुनियोजित षड़यंत्र का परिणाम यह हुआ कि हिन्दू समाज अपना सत्य इतिहास ही भूल गया।

ऐसी हज़ारों दास्तानों में से एक है सिरोंज के महेश्वरी समाज की दास्तान। सिरोंज यह स्थान विदिशा से ५० मील की दूरी पर एक तहसील है। मध्यकाल में इस स्थान का विशेष महत्व था। कई इमारतें व उनसे जुड़ी ऐतिहासिक घटनाएँ इस बात का प्रमाण है। सिरोंज के दक्षिण में स्थित पहाड़ी पर एक प्राचीन मंदिर है। इसे उषा का मंदिर कहा जाता है। इसी नाम के कारण कुछ लोग इसे बाणासुर की राजधानी श्रोणित नगर के नाम से जानते थे। संभवतः यही शब्द बिगड़कर कालांतर में "सिरोंज' हो गया। नगर के बीच में पहले एक बड़ी हवेली हुआ करती थी, जो अब ध्वस्त हो चुकी है, इसे रावजी की हवेली के नाम से जाना जाता है। इसका निर्माण संभवतः मराठा- अधिपत्य के बाद ही हुआ होगा। ऐसी मान्यता है कि यह मल्हाराव होल्कर के प्रतिनिधि का आवास था।

200 साल पहले सिरोंज टोंक के एक नवाब के आधिपत्य में था। एक बार नवाब ने इस क्षेत्र का दौरा किया। उसी रात की यहाँ के माहेश्वरी सेठ की पुत्री का विवाह था। संयोग से रास्ते में डोली में से पुत्री की कीमती चप्पल गिर गई। किसी व्यक्ति ने उसे नवाब के खेमे तक पहुँचा दिया। नवाब को यह भी कहा गया कि चप्पल से भी अधिक सुंदर इसको पहनने वाली है। यह जानने के बाद नवाब द्वारा सेठ की पुत्री की माँग की गई। यह समाचार सुनते ही माहेश्वरी समाज में खलबली मच गई। बेटी देने का तो प्रश्न ही नहीं उठता था। अब किया क्या जाये? माहेश्वरी समाज के प्रतिनिधियों ने कुटनीति से काम किया। नवाब को यह सूचना दे दिया गया कि प्रातः होते ही डोला दे दिया जाएगा। इससे नवाब प्रसन्न हो गया। इधर माहेश्वरियों ने रातों- रात पुत्री सहित शहर से पलायन कर दिया तथा। उनके पूरे समाज में यह निर्णय लिया गया कि कोई भी माहेश्वरी समाज में न तो इस स्थान का पानी पिएगा, न ही निवास करेगा। एक रात में अपने स्थान को उजाड़ कर महेश्वरी समाज के लोग दूसरे राज्य चले गए। मगर अपनी इज्जत, अपनी अस्मिता से कोई समझौता नहीं किया। आज भी एक परम्परा माहेश्वरी समाज में अविरल चल रही है। आज भी माहेश्वरी समाज का कोई भी व्यक्ति सिरोंज जाता है। तो वहाँ का पानी पीता है और न ही रात को कभी रुकता हैं। यह त्याग वह अपने पूर्वजों द्वारा लिए गए संकल्प को निभाने एवं मुसलमानों के अत्याचार के विरोध को प्रदर्शित करने के लिए करता हैं।
दरअसल मुस्लिम शासकों में हिंदुओं की लड़कियों को उठाने, उन्हें अपनी हवस बनाने, अपने हरम में भरने की होड़ थी। उनके इस व्यसन के चलते हिन्दू प्रजा सदा आशंकित और भयभीत रहती थी। ध्यान दीजिये किस प्रकार हिन्दू समाज ने अपना देश, धन, सम्पति आदि सब त्याग कर दर दर की ठोकरे खाना स्वीकार किया। मगर अपने धर्म से कोई समझौता नहीं किया। अगर ऐसी शिक्षा, ऐसे त्याग और ऐसे प्रेरणादायक इतिहास को हिन्दू समाज आज अपनी लड़कियों को दूध में घुटी के रूप में दे। तो कोई हिन्दू लड़को कभी लव जिहाद का शिकार न बने।

Wednesday, December 6, 2017

इतिहास अन्वेषक स्वामी दयानन्द



इतिहास अन्वेषक स्वामी दयानन्द

7 दिसंबर,2014 को हिंदुस्तान टाइम्स, दिल्ली संस्करण में RSS (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) द्वारा इतिहास के पाठ्यकर्म में परिवर्तन को लेकर लेख छपा था। पाठक इस तथ्य से भली भांति परिचित है कि सरकार के इस कदम का वामपंथी विचारधारा से सम्बंधित लोग अलग अलग तर्क देकर विरोध करते रहे हैं। संघ का यह कदम स्वागत योग्य है। हालांकि पाठकों को यह अवगत करवाना आवश्यक है कि इतिहास विषय में भ्रांतियों को सर्वप्रथम उजागर करने का श्रेय स्वामी दयानंद को जाता है। क्रांतिगुरु स्वामी दयानंद के विशाल चिंतन में एक महत्वपूर्ण कड़ी इतिहास रुपी मिथ्या बातों का खंडन एवं सत्य इतिहास का शंखनाद हैं। स्वामी जी का भागीरथ प्रयास था कि विदेशी इतिहासकारों द्वारा अपने स्वार्थ हित एवं ईसाइयत के पोषण के लिए विकृत इतिहास द्वारा भारत वासियों को असभ्य, जंगली, अंधविश्वासी आदि सिद्ध करने के लिए किया जा रहा था। उसे न केवल सप्रमाण असत्य सिद्ध करे अपितु उसके स्थान पर सत्य इतिहास की स्थापना कर भारत वासियों को संसार कि श्रेष्ठतम, वैज्ञानिक, अध्यात्मिक रूप से सबसे उन्नत एवं प्रगतिशील सिद्ध करे। इसी कड़ी में स्वामी जी द्वारा अनेक तथ्य अपनी लेखनी द्वारा प्रस्तुत किये गये। जिन पर आधुनिक रूप से शौध कर उन्हें संसार के समक्ष सिद्ध कर अनुसन्धानकर्ताओं की सोच को बदलने की अत्यंत आवश्यकता हैं।

स्वामी जी द्वारा स्थापित कुछ इतिहास अन्वेषण तथ्यों को यहाँ पर प्रस्तुत कर रहे हैं।

1. आर्य लोग बाहर से आये हुए आक्रमणकारी नहीं थे। जिन्होंने यहाँ पर आकर यहाँ के मूल निवासियों पर जय पाकर उन पर राज्य किया था। वे यही के मूल निवासी थे और इस देश का नाम आर्यवर्त था।

2. वेदों में आर्य दस्यु युद्ध का किसी भी प्रकार का कोई उल्लेख नहीं हैं। और यह नितांत कल्पना है क्यूंकि वेद इतिहास पुस्तक नहीं है।

3. प्राचीन काल में नारी जाति अशिक्षित एवं घर में चूल्हे चौके तक सिमित न रहने वाली होकर गार्गी, मैत्रयी जैसी महान विदुषी एवं शास्त्रार्थ करने वाली थी। वेदों में तो मंत्र द्रष्टा ऋषिकाओं का भी उल्लेख मिलता हैं।

4. वेदों में एक ईश्वर कि पूजा और अर्चना का विधान है। एक ईश्वर के अनेक गुणों के कारण अनेक नाम हो सकते है और यह सभी नाम गुणवाचक है। मगर इसका अर्थ यह है कि ईश्वर एक है और अनेक गुणों के कारण अनेक नामों से जाना जाता हैं।

5. वेदों का उत्पत्ति काल २०००-३००० वर्ष नहीं है अपितु अरबों वर्ष पुराना है।

6. रामायण, महाभारत आदि काल्पनिक ग्रन्थ नहीं हैं। अपितु राजा परीक्षित के पश्चात आर्य राजाओं कि प्राप्त वंशावली से सिद्ध होता है कि वह सत्य इतिहास है।

7. श्री कृष्ण का जो चरित्र महाभारत में वर्णित है। वह आप्त अर्थात श्रेष्ठ पुरुषों वाला है। अन्य सब गाथायें मनगढ़त एवं असत्य हैं।

8. पुराणों के रचियता व्यास जी नहीं है। अपितु पंडितों ने अपनी अपनी बातें इसमें मिला दी थी और व्यास जी का नाम रख दिया था।

9. रामायण, महाभारत, मनु स्मृति आदि में जो कुछ वेदानुकूल है। वह मान्य है। बाकि भाग प्रक्षिप्त अर्थात मिलावटी है।

10. वैदिक ऋषि मन्त्रों के रचियता नहीं अपितु मंत्र द्रष्टा थे। वेद अपौरुषेय है अर्थात मनुष्य की नहीं अपितु मानव जाति की रचना है।

11. वेदों में यज्ञों में पशु बलि एवं माँसाहार आदि का कोई विधान नहीं हैं। वेदों की इस प्रकार की व्याख्या मध्य कालीन पंडितों का कार्य हैं। जो वाममार्ग से प्रभावित थे।

12. मूर्ति पूजा की उत्पत्ति जैन मत द्वारा आरम्भ हुई थी। न वेदों में और न ही इससे पूर्व काल में मूर्ति पूजा का कोई प्रचलन था।

13. वेदों में जादू टोना,काला जादू आदि का कोई विधान नहीं हैं। यह सब मनघड़त कल्पनाएँ हैं। मध्य काल में वाममार्ग आदि का प्रचलन हुआ जो पुरुषार्थ के स्थान पर मिथ्या विधानों में विश्वास रखता था। तांत्रिक कर्मकांड उसी विचारधारा की देन है।

14. वेदों में अश्लीलता आदि का कोई वर्णन नहीं हैं। यह सब मनघड़त कल्पनाएँ हैं। वाममार्ग द्वारा व्यभिचार की पुष्टि के लिए वेद मन्त्रों अर्थ किये गए जिससे यह प्रतीत होता है कि वेदों में अश्लीलता है।

15. सृष्टि कि उत्पत्ति के काल में बहुत सारे युवा पुरुष और नारी का त्रिविष्टप पर अमैथुनी प्रक्रिया से जन्म हुआ था और चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य एवं अंगिरा को ह्रदय में ईश्वर द्वारा वेदों का ज्ञान प्राप्त करवाया गया था। पश्चात उन्हीं युवा पुरुष और नारी से मैथुनी सृष्टि की रचना हुई एवं वेदों के ज्ञान का प्रचार प्रसार हुआ।

16. वेदों का ज्ञान बहुत काल तक श्रवण परम्परा द्वारा सुरक्षित रहा कालांतर में इक्ष्वाकु के काल में वेदों को सर्वप्रथम लिखित रूप में उपलब्ध करवाया गया था। देवनागरी लिपि को अक्षर रूप में बोलना हमें सृष्टि के आदि काल से ज्ञात था। जबकि उसे लिपि के रूप में राजा इक्ष्वाकु के काल में विकसित किया गया।

17. आर्य वैदिक सभ्यता प्राचीन काल में सम्पूर्ण विश्व में प्रचलित थी और आर्यवर्त देश संसार का विश्वगुरु था।

18. प्राचीन काल में विदेश गमन पर कोई प्रतिबन्ध नहीं था और न ही विदेश जाने से कोई भी धर्म से च्युत हो जाता था।

19. शुद्धि आदि का विधान गोभिल आदि ग्रंथों में विद्यमान था। इसलिए जो भी कोई वैदिक धर्म त्याग कर विधर्मी हो चुके है। उन्हें वापिस स्वधर्मी बनाया जा सकता है।

20. गुजरात के सोमनाथ में मुसलमानों की विजय का कारण मूर्ति पूजा एवं अवतारवाद से सम्बंधित पाखंड था। नाकि हिंदुओं में वीरता कि कमी थी।

ऐसे और उदहारण देकर एक पूरी पुस्तक लिखी जा सकती है। जिसका उद्देश्य स्वामी दयानंद को अपने समय का सबसे बड़े इतिहासकार, अनुसन्धान कर्ता के रूप में सिद्ध करना होगा। संघ द्वारा इतिहास विषय में चेतना उत्पन्न करने का श्रेय स्वामी दयानंद को अवश्य देना चाहिए।

डॉ विवेक आर्य

The Unforgotten tale of Bravery



The Unforgotten tale of Bravery
 We all know that Arab Invader Muhammad Bin Qasim conquered Sindh in 712 AD. However, the facts surrounding this conquest, and the ill fate that followed for the conqueror is known to few among us.
The invasion on our country was a war between faiths and Dharma. Muhammad Bin Qasim’s attacked the peaceful Kingdom ruled by Hindu King Raja Dahir. In previous invasion none of them was successful but this was first episode when Hindu king lost to the invader.   

Chachnama, a Sindhi book is a biography of Raja Dahir and sacrifice of his family. After Raja Dahar was killed, two of his daughters were made captive, whom Muhammad Bin Qasim sent to the capital Damascus. After a few days, the Caliph of the Muslims called the two young women to his court. The name of the elder daughter of Raja Dahar was Suryadevi, while the younger one’s name was Pirmaldevi.
Caliph Waleed Bin Abdul Malik fell for Suryadevi’s extraordinary beauty. He ordered for her younger sister to be taken away. The Caliph then began to take liberties with Suryadevi, pulling her to himself.
It is written that Suryadevi sprang up and said: “May the king live long: I, a humble slave, am not fit for your Majesty's bedroom, because Muhammad Bin Qasim kept both of us sisters with him for three days, and then sent us to the caliphate. Perhaps your custom is such, but this kind of disgrace should not be permitted by kings.”
Hearing this, the Caliph’s blood boiled as heat from anger and desire both compounded within him.
Blinded in the thirst of Suryadevi’s nearness and jealousy of Bin Qasim who had robbed him of the purity he would otherwise have had, the Caliph immediately sent for pen, ink and paper, and with his own hands wrote an order, directing that, “Muhammad (Bin) Qasim should, wherever he may be, put himself in raw leather and come back to the chief seat of the caliphate.”
Muhammad Bin Qasim was captured on Caliph’s orders in the city of Udhapur. He was wrapped in raw leather and locked him in a trunk before taking him to Damascus.
En route to the capital, Muhammad Bin Qasim breathed his last.  When the trunk carrying Muhammad Bin Qasim’s corpse wrapped in raw leather reached the Caliph’s court, the Caliph called upon Dahar’s daughters, asking them to bear witness to the spectacle of obedience of his men for the Caliph.
One of Dahar’s daughter’s then spoke in return and said: “The fact is that Muhammad Qasim was killer of her Family.  Although he never touched us, but we were full of revenge against him. He destroyed their family, their kingdom and ruined their lives. By playing tactic we took our revenge from him. The Caliph reacted to this instance by tying both sisters behind Horses and making them to run until both of them died. But their faces flashed with the smiles of Victory as they had taken their revenge before dying.

The sacrifice made by Raja Dahir Family is an unforgotten tale of bravery. Their sacrifice will always be remembered for centuries inspiring generations. 

राममंदिर विध्वंस एवं तुलसीदास



राममंदिर विध्वंस एवं तुलसीदास

-अरुण लवानिया

आपको कुछ मुसलमान और कम्युनिस्ट यह चिल्लाते दिखेंगे कि अगर बाबर ने हिन्दू मंदिर तोडा होता तो तुलसीदास ने लिखा होता। मगर इसका कोई प्रमाण रामचरितमानस में नहीं मिलता। सत्य यह है कि तुलसीदास जी ने बाबर के हाथों राममंदिर विध्वंस का वर्णन लिखा था। यह वर्णन रामचरितमानस में नहीं अपितु दोहा शतक में किया था। तुलसी दास जी ने दोहा शतक 1590 मे लिखा था। इसके आठ दोहे , 85 से 92, में मंदिर के तोड़े जाने का स्पष्ट वर्णन है। इसे रायबरेली के तालुकदार राय बहादुथ बाबू सिंह जी 1944 में प्रकाशित किया।यह राम जंत्रालय प्रेस से छपा। यह एक ही बार छपा और इसकी एक प्रति जौनपुर के शांदिखुर्द गांव में उपलब्ध है।

इलाहाबाद उच्च नयायालय में जब बहस शुरू हुयी तो श्री रामभद्राचार्य जी को Indian Evidence Act के अंतर्गत एक expert witness के तौर पर बुलाया गया और इस सवाल का उत्तर पूछा गया। उन्होंने कहा कि यह सही है कि श्री रामचरित मानस में इस घटना का वर्णन नहीं है लेकिन तुलसीदास जी ने इसका वर्णन अपनी अन्य कृति 'तुलसी दोहा शतक' में किया है जो कि श्री रामचरित मानस से कम प्रचलित है।

अतः यह कहना गलत है कि तुलसी दास जो कि बाबर के समकालीन भी थे,ने राम मंदिर तोड़े जाने की घटना का वर्णन नहीं किया है और जहाँ तक राम चरित मानस कि बात है उसमे तो कहीं भी मुग़लों की भी चर्चा नहीं है इसका मतलब ये निकाला जाना गलत होगा कि तुलसीदास के समय में मुगल नहीं रहे।

गोस्वामी जी ने 'तुलसी दोहा शतक' में इस बात का साफ उल्लेख किया है कि किस तरह से राम मंदिर को तोड़ा गया


(1) राम जनम महि मंदरहिं, तोरि मसीत बनाय ।
जवहिं बहुत हिन्दू हते, तुलसी किन्ही हाय ॥

जन्मभूमि का मन्दिर नष्ट करके, उन्होंने एक मस्जिद बनाई । साथ ही तेज गति उन्होंने बहुत से हिंदुओं की हत्या की । इसे सोचकर तुलसीदास शोकाकुल हुये ।

(2) दल्यो मीरबाकी अवध मन्दिर रामसमाज ।
तुलसी रोवत ह्रदय हति हति त्राहि त्राहि रघुराज ॥

मीरबकी ने मन्दिर तथा रामसमाज (राम दरबार की मूर्तियों) को नष्ट किया । राम से रक्षा की याचना करते हुए विदिर्ण ह्रदय तुलसी रोये ।

(3) राम जनम मन्दिर जहाँ तसत अवध के बीच ।
तुलसी रची मसीत तहँ मीरबाकी खाल नीच ॥

तुलसीदास जी कहते हैं कि अयोध्या के मध्य जहाँ राममन्दिर था वहाँ नीच मीरबकी ने मस्जिद बनाई ।

(4) रामायन घरि घट जँह, श्रुति पुरान उपखान ।
तुलसी जवन अजान तँह, कइयों कुरान अज़ान ॥

श्री तुलसीदास जी कहते है कि जहाँ रामायण, श्रुति, वेद, पुराण से सम्बंधित प्रवचन होते थे, घण्टे, घड़ियाल बजते थे, वहाँ अज्ञानी यवनों की कुरआन और अज़ान होने लगे।

(5) मन्त्र उपनिषद ब्राह्मनहुँ बहु पुरान इतिहास ।
जवन जराये रोष भरि करि तुलसी परिहास ॥

श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि क्रोध से ओतप्रोत यवनों ने बहुत सारे मन्त्र (संहिता), उपनिषद, ब्राह्मणग्रन्थों (जो वेद के अंग होते हैं) तथा पुराण और इतिहास सम्बन्धी ग्रन्थों का उपहास करते हुये उन्हें जला दिया ।

(6) सिखा सूत्र से हीन करि बल ते हिन्दू लोग ।
भमरि भगाये देश ते तुलसी कठिन कुजोग ॥

श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि ताकत से हिंदुओं की शिखा (चोटी) और यग्योपवित से रहित करके उनको गृहविहीन कर अपने पैतृक देश से भगा दिया ।

(7) बाबर बर्बर आइके कर लीन्हे करवाल ।
हने पचारि पचारि जन जन तुलसी काल कराल ॥

श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि हाँथ में तलवार लिये हुये बर्बर बाबर आया और लोगों को ललकार ललकार कर हत्या की । यह समय अत्यन्त भीषण था ।

(8) सम्बत सर वसु बान नभ ग्रीष्म ऋतु अनुमानि ।
तुलसी अवधहिं जड़ जवन अनरथ किये अनखानि ॥

(इस दोहा में ज्योतिषीय काल गणना में अंक दायें से बाईं ओर लिखे जाते थे, सर (शर) = 5, वसु = 8, बान (बाण) = 5, नभ = 1 अर्थात विक्रम सम्वत 1585 और विक्रम सम्वत में से 57 वर्ष घटा देने से ईस्वी सन 1528 आता है ।)

श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि सम्वत् 1585 विक्रमी (सन 1528 ई) अनुमानतः ग्रीष्मकाल में जड़ यवनों अवध में वर्णनातीत अनर्थ किये । (वर्णन न करने योग्य) ।

अब यह स्पष्ट हो गया कि गोस्वामी तुलसीदास जी की इस रचना में जन्मभूमि विध्वंस का विस्तृत रूप से वर्णन किया किया है।

इतने स्पष्ट प्रमाण होने  के बाद भी राममंदिर का निर्माण न होने का केवल और केवल एक ही कारण है। यह है हिन्दू समाज में एकता की कमी। हिन्दू समाज जिस दिन जातिवाद छोड़कर संगठित हो जायेगा। उस दिन राममंदिर के निर्माण से दुनिया की कोई ताकत हमें नहीं रोक सकती। 

Sunday, December 3, 2017

महान वीर योद्धा 'तक्षक'



महान वीर योद्धा 'तक्षक'

वीर तक्षक की गाथा जितनी बार भी पढ़े हम हर बार नयी ही लगती हमे प्रेरित ही करती है ।

वीर तक्षक गुर्जर प्रतिहार वंश के राजा नागभट्ट द्वितीय का अंगरक्षक था ।
.प्राचीन भारत का पश्चिमोत्तर सीमांत!

मोहम्मद बिन कासिम के आक्रमण से एक चौथाई सदी बीत चुकी थी।

तोड़े गए मन्दिरों, मठों और चैत्यों के ध्वंसावशेष

अब टीले का रूप ले चुके थे, और

उनमे उपजे वन में विषैले जीवोँ का आवास था।

यहां के वायुमण्डल में अब भी कासिम की सेना का अत्याचार पसरा थl....
जैसे बलत्कृता कुमारियों और सरकटे युवाओं का चीत्कार गूंजता था।
कासिम ने अपने अभियान में युवा आयु वाले एक भी व्यक्ति को जीवित नही छोड़ा था,

अस्तु अब इस क्षेत्र में हिन्दू प्रजा अत्यल्प ही थी।

संहार के भय से इस्लाम स्वीकार कर चुके कुछ निरीह परिवार यत्र तत्र दिखाई दे जाते थे, पर कहीं उल्लास का कोई चिन्ह नही था। कुल मिला कर यह एक शमशान था।....

जो कासिम के अभियान के समय मात्र आठ वर्ष का था,

वह इस कथा का मुख्य पात्र है। उसका नाम था तक्षक।

मुल्तान विजय के बाद कासिम के सम्प्रदायोन्मत्त मुस्लिम आतंकवादियों ने गांवो शहरों में भीषण रक्तपात मचाया था। हजारों स्त्रियों की छातियाँ नोची गयीं, और हजारों अपनी शील की रक्षा के लिए कुंए तालाब में डूब मरीं।

लगभग सभी युवाओं को या तो मार डाला गया या गुलाम बना लिया गया।
अरब ने पहली बार भारत को अपना ""इस्लाम धर्म "" दिखlया था,

और भारत ने पहली बार मानवता की हत्या देखी थी।...
तक्षक के पिता सिंधु नरेश दाहिर के सैनिक थे जो

इसी कासिम की सेना के साथ हुए युद्ध में वीरगति पा चुके थे।
लूटती अरब सेना जब तक्षक के गांव में पहुची

तो हाहाकार मच गया।

स्त्रियों को घरों से खींच खींच कर उनकी देह लूटी जाने लगी।
भय से आक्रांत तक्षक के घर में भी सब चिल्ला उठे।

तक्षक और उसकी दो बहनें भय से कांप उठी थीं।
तक्षक की माँ पूरी परिस्थिति समझ चुकी थी,

उसने कुछ देर तक अपने बच्चों को देखा और...
जैसे एक निर्णय पर पहुच गयी। ....

माँ ने अपने तीनों बच्चों को खींच कर छाती में चिपका लिया और रो पड़ी। फिर देखते देखते उस क्षत्राणी ने म्यान से तलवार खीचा और अपनी दोनों बेटियों का सर काट डाला।

उसके बाद "काटी जा रही गाय की तरह" बेटे की ओर अंतिम दृष्टि डाली, और तलवार को "अपनी" छाती में उतार लिया।...

आठ वर्ष का बालक "एकाएक" समय को पढ़ना सीख गया था,

उसने भूमि पर पड़ी मृत माँ के आँचल से अंतिम बार अपनी आँखे पोंछी, और घर के पिछले द्वार से निकल कर खेतों से होकर जंगल में भागा..............
पचीस वर्ष बीत गए।

तब का अष्टवर्षीय तक्षक अब बत्तीस वर्ष का पुरुष हो कर कन्नौज के प्रतापी शासक नागभट्ट द्वितीय का मुख्य अंगरक्षक था।

वर्षों से किसी ने उसके चेहरे पर भावना का कोई चिन्ह नही देखा था। वह न कभी खुश होता था न कभी दुखी, उसकी आँखे सदैव अंगारे की तरह लाल रहती थीं। उसके पराक्रम के किस्से पूरी सेना में सुने सुनाये जाते थे। अपनी तलवार के एक वार से हाथी को मार डालने वाला तक्षक सैनिकों के लिए "आदर्श " था।

कन्नौज नरेश नागभट्ट अपने अतुल्य पराक्रम, विशाल सैन्यशक्ति और अरबों के सफल प्रतिरोध के लिए ख्यात थे।

सिंध पर शासन कर रहे अरब कई बार कन्नौज पर आक्रमण कर चुके थे, पर हर बार योद्धा राजपूत उन्हें खदेड़ देते।

युद्ध के ""सनातन नियमों का पालन करते "" नागभट्ट कभी उनका पीछा "नहीं " करते, जिसके कारण

बार बार वे मजबूत हो कर पुनः आक्रमण करते थे।

ऐसा पंद्रह वर्षों से हो रहा था।...

आज महाराज की सभा लगी थी।...

कुछ ही समय पुर्व गुप्तचर ने सुचना दी थी, कि अरब के खलीफा से सहयोग ले कर सिंध की विशाल सेना कन्नौज पर आक्रमण के लिए प्रस्थान कर चुकी है, और संभवत: दो से तीन दिन के अंदर यह सेना कन्नौज की सीमा पर होगी।...

इसी सम्बंध में रणनीति बनाने के लिए महाराज नागभट्ट ने यह सभा बैठाई थी। नागभट्ट का सबसे बड़ा गुण यह था, कि वे अपने सभी सेनानायकों का विचार लेकर ही कोई निर्णय करते थे। आज भी इस सभा में सभी सेनानायक अपना विचार रख रहे थे।

अंत में तक्षक उठ खड़ा हुआ

और बोला- महाराज,

हमे इस बार वैरी को उसी की शैली में उत्तर देना होगा।

महाराज ने ध्यान से देखा अपने इस अंगरक्षक की ओर, बोले- अपनी बात खुल कर कहो तक्षक, हम कुछ समझ नही पा रहे।

- महाराज, अरब सैनिक महा बर्बर हैं,

उनके साथ सनातन नियमों के अनुरूप युद्ध करके हम अपनी प्रजा के साथ घात ही करेंगे।

उनको "उन्ही की शैली" में हराना होगा।...

महाराज के माथे पर लकीरें उभर आयीं,

बोले- किन्तु हम धर्म और मर्यादा नही छोड़ सकते सैनिक।

तक्षक ने कहा-

"मर्यादा का निर्वाह" उसके साथ किया जाता है जो मर्यादा का "अर्थ" समझते हों।

ये बर्बर धर्मोन्मत्त राक्षस हैं महाराज।

इनके लिए हत्या और बलात्कार ही धर्म है।

- पर यह हमारा धर्म नही हैं बीर,....

- राजा का केवल "एक ही धर्म" होता है महाराज,

और वह है प्रजा की रक्षा। देवल और मुल्तान का युद्ध याद करें महाराज, जब कासिम की सेना ने दाहिर को पराजित करने के पश्चात प्रजा पर कितना अत्याचार किया था।

ईश्वर न करे, यदि हम पराजित हुए
तो

बर्बर अत्याचारी अरब हमारी स्त्रियों, बच्चों और निरीह प्रजा के साथ कैसा व्यवहार करेंगे, यह महाराज जानते हैं।....

महाराज ने एक बार पूरी सभा की ओर निहारा,

सबका मौन तक्षक के तर्कों से सहमत दिख रहा था।

महाराज अपने मुख्य सेनापतियों मंत्रियों और
तक्षक के साथ गुप्त सभाकक्ष की ओर बढ़ गए।...

अगले दिवस की संध्या तक कन्नौज की पश्चिम सीमा पर

दोनों सेनाओं का पड़ाव हो चूका था, और आशा थी कि

अगला प्रभात एक भीषण युद्ध का साक्षी होगा।...
आधी रात्रि बीत चुकी थी

अरब सेना अपने शिविर में निश्चिन्त सो रही थी।

अचानक तक्षक के संचालन में कन्नौज की एक चौथाई सेना अरब शिविर पर टूट पड़ी।

अरबों को किसी "हिन्दू शासक से " रात्रि युद्ध की आशा "न" थी। वे उठते,सावधान होते और हथियार सँभालते इसके पुर्व ही आधे अरब गाजर मूली की तरह काट डाले गए।

इस भयावह निशा में तक्षक का शौर्य अपनी पराकाष्ठा पर था। वह घोडा दौड़ाते जिधर निकल पड़ता उधर की भूमि शवों से पट जाती थी।

उषा की प्रथम किरण से पुर्व अरबों की दो तिहाई सेना मारी जा चुकी थी। सुबह होते ही बची सेना पीछे भागी,....

किन्तु आश्चर्य!

महाराज नागभट्ट अपनी शेष सेना के साथ उधर तैयार खड़े थे। दोपहर होते होते समूची अरब सेना काट डाली गयी।

अपनी बर्बरता के बल पर विश्वविजय का स्वप्न देखने वाले आतंकियों को ""पहली बार"" किसी ने ऐसा उत्तर दिया था।...

विजय के बाद महाराज ने अपने सभी सेनानायकों की ओर देखा, उनमे तक्षक का कहीं पता नही था।

सैनिकों ने युद्धभूमि में तक्षक की खोज प्रारंभ की तो देखा- लगभग हजार अरब सैनिकों के शव के बीच

तक्षक की मृत देह दमक रही थी।

उसे शीघ्र उठा कर महाराज के पास लाया गया।

कुछ क्षण तक इस अद्भुत योद्धा की ओर चुपचाप देखने के पश्चात

महाराज नागभट्ट आगे बढ़े और....

तक्षक के चरणों में अपनी तलवार रख कर

उसकी मृत देह को प्रणाम किया।...

युद्ध के पश्चात युद्धभूमि में पसरी नीरवता में ...

भारत का वह महान सम्राट ""गरज"" उठा-

""""आप आर्यावर्त की वीरता के शिखर थे तक्षक."""...

भारत ने "अबतक" मातृभूमि की रक्षा में

प्राण ""न्योछावर करना"" सीखा था,...

आप ने मातृभूमि के लिए प्राण """"लेना"""" सिखा दिया।

भारत युगों युगों तक आपका आभारी रहेगा।....

इतिहास साक्षी है,

इस युद्ध के बाद

अगले तीन शताब्दियों तक

अरबों में भारत की तरफ

आँख उठा कर देखने की हिम्मत नही हुई।....

नमन हे "तक्षक"

आपसे प्रेरणा लेता हूँ ।

आपसे भी आग्रह है की दुष्टों की दुष्टता ओर इतिहास से सबक़ लेते हुये अब रक्षात्मक की जगह आक्रामकता से लड़े , नही तो अपने मासूम बच्चों ,निर्दोष महिलाओं के साथ होने वाले पाशविक बर्बरता के ज़िम्मेदार आप स्वयं ही होगे।

जय वैदिक सत्य सनातन

जय आर्यवर्त।।