Monday, September 30, 2013

बाइबिल में वैदिक कर्म-फल व्यवस्था

 


"जो जैसा बोयेगा वो वैसा पायेगा"

वेदों में वर्णित कर्म फल व्यवस्था को इतने आसान शब्दों में शायद ही कोई समझा सकता हो। प्राचीन काल से ही हर वैदिकधर्मी इस अटल एवं अकाट्य सिद्धांत को मानता आ रहा हैं। खेद हैं कालांतर में कुछ मानव निर्मित मत अपने अपने शोर्टकट के रूप में अलग रास्ता बताते हैं, जैसे उस मत के प्रवर्तक को केवल बात मान लो, पुरुषार्थ कर्म की चिंता मत करो अथवा जैसा उस मत की विशेष पुस्तक में लिखा हैं वैसा मान लो बाकि चिंता करने की आवश्यकता ही नहीं हैं।


सभी मत मतान्तरों की आंशिक शिक्षाएँ वेदों की सत्य शिक्षा से मेल खाती हैं।
जैसे बाइबिल में कर्म फल व्यवस्था का स्पष्ट वर्णन इस प्रकार से किया गया हैं।


रोमियो 2:6 वह हर एक को उसके कामों के अनुसार बदला देगा।
रोमियो 2:7 जो सुकर्म में स्थिर रहकर महिमा, और आदर, और अमरता की खोज में है, उन्हें वह अनन्त जीवन देगा।
रोमियो 2:12 इसलिये कि जिन्हों ने बिना व्यवस्था पाए पाप किया, वे बिना व्यवस्था के नाश भी होंगे, और जिन्हों ने व्यवस्था पाकर पाप किया, उन का दण्ड व्यवस्था के अनुसार होगा।
रोमियो 2:13 क्योंकि परमेश्वर के यहां व्यवस्था के सुनने वाले धर्मी नहीं, पर व्यवस्था पर चलने वाले धर्मी ठहराए जाएंगे।
याकूब 2:24 सो तुम ने देख लिया कि मनुष्य केवल विश्वास से ही नहीं, वरन कर्मों से भी धर्मी ठहरता है।
प्रकाशित वाक्य 22:12 देख, मैं शीघ्र आने वाला हूं; और हर एक के काम के अनुसार बदला देने के लिये प्रतिफल मेरे पास है।
गलतियों 6:7 धोखा न खाओ, परमेश्वर ठट्ठों में नहीं उड़ाया जाता, क्योंकि मनुष्य जो कुछ बोता है, वही काटेगा।

इतने स्पष्ट प्रमाण होने के बाद भी ईसाई समाज का यह मानना की जो प्रभु यीशु पर विश्वास लाता हैं उसी का कल्याण होगा संदेह जनक कथन प्रतीत होता हैं।
डॉ विवेक आर्य

Friday, September 27, 2013

शहीद भगत सिंह क्यों आदर्श है?




शहीद भगत सिंह क्यों आदर्श है?


 'मैं नास्तिक क्यों हूँ? शहीद भगतसिंह की यह छोटी सी पुस्तक वामपंथी, साम्यवादी लाबी द्वारा आजकल नौजवानों में खासी प्रचारित की जा रही है, जिसका उद्देश्य उन्हें भगत सिंह के जैसा महान बनाना नहीं अपितु उनमें नास्तिकता को बढ़ावा देना है। कुछ लोग इसे कन्धा भगत सिंह का और निशाना कोई और भी कह सकते हैं। मेरा एक प्रश्न उनसे यह है की क्या भगत सिंह इसलिए हमारे आदर्श होने चाहिएँ कि वे नास्तिक थे, अथवा इसलिए कि वे एक प्रखर देशभक्त और अपने सिद्धान्तों से किसी भी कीमत पर समझौता न करने वाले बलिदानी थे? सभी कहेंगे कि इसलिए कि वे देशभक्त थे। भगतसिंह के जो प्रत्यक्ष योगदान है उसके कारण भारतीय स्वतंत्रता के संघर्ष में उनका कद इतना उच्च है कि उन पर अन्य कोई संदिग्ध विचार धारा थोंपना कतई आवश्यक नहीं है। इस प्रकार के छद्म प्रोपगंडा से भावुक एवं अपरिपक्व नौजवानों को भगतसिंह के समग्र व्यक्तित्व से अनभिज्ञ रखकर अपने राजनैतिक उद्देश्य तो पूरे किये जा सकते हैं, भगतसिंह के आदर्शों का समाज नहीं बनाया जा सकता। किसी भी क्रांतिकारी की देशभक्ति के अलावा उनकी अध्यात्मिक विचारधारा अगर हमारे लिए आदर्श है तब तो भगत सिंह के अग्रज महान् कवि एवं लेखक, भगत सिंह जैसे अनेक युवाओं के मार्ग द्रष्टा, जिनके जीवन में क्रांति का सूत्रपात स्वामी दयानंद द्वारा रचित अमर ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश को पढऩे से हुआ था, कट्टर आर्यसमाजी, पंडित राम प्रसाद बिस्मिल जी जिनका सम्पूर्ण जीवन ब्रह्मचर्य पालन से होने वाले लाभ का साक्षात् प्रमाण था, क्यों हमारे लिए आदर्श और वरण करने योग्य नहीं हो सकते?
क्रान्तिकारी सुखदेव थापर वेदों से अत्यंत प्रभावित एवं आस्तिक थे एवं संयम विज्ञान में उनकी आस्था थी। स्वयं भगत सिंह ने अपने पत्रों में उनकी इस भावना का वर्णन किया है। हमारे लिए आदर्श क्यों नहीं हो सकते?
'आर्यसमाज मेरी माता के समान है और वैदिक धर्म मेरे लिए पिता तुल्य है। ऐसा उदघोष करने वाले लाला लाजपतराय जिन्होंने जमीनी स्तर पर किसान आन्दोलन का नेतृत्व करने से लेकर उच्च बौद्धिक वर्ग तक में प्रखरता के साथ देशभक्ति की अलख जगाई और साइमन कमीशन का विरोध करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। वे क्यों हमारे लिए वरणीय नहीं हो सकते? क्या इसलिए कि वे आस्तिक थे? वस्तुत: देशभक्त लोगों के प्रति श्रद्धा और सम्मान रखने के लिए यह एक पर्याप्त आधार है कि वे सच्चे देशभक्त थे और उन्होंने देश की भलाई के लिए अपने व्यक्तिगत स्वार्थों और सपनों सहित अपने जीवन का बलिदान कर दिया, इससे उनके सम्मान में कोई कमी या व्द्धि नहीं होती कि उनकी आध्यात्मिक विचारधारा क्या थी। रामप्रसाद के बलिदान का सम्मान करने के साथ अशफाक के बलिदान का केवल इस आधार पर अवमूल्यन करना कि वे इस्लाम से सम्बंधित थे, केवल मूर्खता ही कही जाएगी।
ऐसे हजारों क्रांतिकारियों का विवरण दिया जा सकता है जिन्होंने न केवल मातृभूमि की सेवा में अपने प्राण न्योछावर किये थे अपितु मान्यता से वे सब दृढ़ रूप से आस्तिक भी थे। क्या उनकी बलिदान और भगत सिंह  के बलिदान में कुछ अंतर हैं? नहीं। फिर  यह अन्याय नहीं तो और क्या है?
अब यह भी विचार कर लेना चाहिए कि भगत सिंह की नास्तिकता क्या वाकई में नास्तिकता है? भगत सिंह शहादत के समय एक 23 वर्ष के युवक ही थे। उस काल में 1920 के दशक में भारत के ऊपर दो प्रकार की विपत्तियाँ थीं। 1921 में परवान चढ़े खिलाफत के मुद्दे को कमाल पाशा द्वारा समाप्त किये जाने पर कांग्रेस एवं मुस्लिम संगठनों की हिन्दू-मुस्लिम एकता ताश के पत्तों के समान उड़ गई और सम्पूर्ण भारत में दंगों का जोर आरंभ हो गया। हिन्दू मुस्लिम के इस संघर्ष को भगत सिंह द्वारा आज़ादी की लड़ाई में सबसे बड़ी अड़चन के रूप में महसूस किया गया, जबकि इन दंगों के पीछे अंगे्रजों की फूट डालो और राज करो की नीति थी। इस विचार मंथन का परिणाम यह निकला कि भगत सिंह को "धर्म" नामक शब्द से घृणा हो गई। उन्होंने सोचा कि दंगों का मुख्य कारण धर्म है। उनकी इस मान्यता को दिशा देने में माक्र्सवादी साहित्य का भी योगदान था, जिसका उस काल में वे अध्ययन कर रहे थे। दरअसल धर्म दंगों का कारण ही नहीं था, दंगों का कारण मत-मतान्तर की संकीर्ण सोच थी। धर्म पुरुषार्थ रुपी श्रेष्ठ कार्य करने का नाम है, जो सार्वभौमिक एवं सर्वकालिक है। जबकि मत या मज़हब एक सीमित विचारधारा को मानने के समान हैं, जो न केवल अल्पकालिक हैं अपितु पूर्वाग्रह से युक्त भी हैं। उसमें उसके प्रवर्तक का सन्देश अंतिम सत्य होता है। माक्र्सवादी साहित्य की सबसे बड़ी कमजोरी उसका धर्म और मज़हब शब्द में अंतर न कर पाना है।
उस काल में अंग्रेजों की विनाशकारी नीतियों के कारण भारत देश में गरीबी अपनी चरम सीमा पर थी और अकाल, बाढ़, भूकंप, प्लेग आदि के प्रकोप के समय उचित व्यवस्था न कर पाने के कारण थोड़ी सी समस्या भी विकराल रूप धारण कर लेती थी। ऐसे में चारों ओर गरीबी, भूखमरी, बीमारियाँ आदि देखकर एक देशभक्त युवा का निर्मल ह्रदय का  व्यथित हो जाना स्वाभाविक है। परन्तु इस प्रकोप का श्रेय अंग्रेजी राज्य, आपसी फूट, शिक्षा एवं रोजगार का अभाव, अन्धविश्वास आदि को न देकर ईश्वर को देना कठिन विषय में अंतिम परिणाम तक पहुँचने से पहले की शीघ्रता के समान है। दुर्भाग्य से भगत सिंह जी को केवल 23 वर्ष की आयु में देश पर अपने प्राण न्योछावर करने पड़े, वर्ना कुछ और काल में विचारों में प्रगति होने पर उनका ऐसा मानना कि संसार में दुखों का होना इस बात को सिद्ध करता है कि ईश्वर नाम की कोई सत्ता नहीं हैं, वे स्वयं ही अस्वीकृत कर देते।
संसार में दु:ख का कारण ईश्वर नहीं अपितु मनुष्य स्वयं हैं। ईश्वर ने तो मनुष्य के निर्माण के साथ ही उसे वेद रूपी उपदेश में यह बता दिया कि उसे क्या करना है और क्या नहीं करना है? अर्थात् मनुष्य को सत्य-असत्य का बोध करवा दिया था। अब यह मनुष्य का कर्तव्य है कि वो सत्य मार्ग का वरण करे और असत्य मार्ग का त्याग करे। पर यदि मनुष्य अपनी अज्ञानता से असत्य मार्ग का वरण करता है तो आध्यात्मिक, आधिभौतिक एवं आधिदैविक तीनों प्रकार के दुखों का भागी बनता है। अपने सामथ्र्य के अनुसार कर्म करने में मनुष्य स्वतंत्र है- यह निश्चित सिद्धांत है मगर उसके कर्मों का यथायोग्य फल मिलना भी उसी प्रकार से निश्चित सिद्धांत है। जिस प्रकार से एक छात्र परीक्षा में अत्यंत परिश्रम करता है उसका फल अच्छे अंकों से पास होना निश्चित है, उसी प्रकार से दूसरा छात्र परिश्रम न करने के कारण फेल होता हैं तो उसका दोष ईश्वर का हुआ अथवा उसका हुआ। ऐसी व्यवस्था संसार के किस कर्म को करने में नहीं हैं? सकल कर्मों में हैं और यही ईश्वर की कर्मफल व्यवस्था है। फिर किसी भी प्रकार के दु:ख का श्रेय ईश्वर को देना और उसके पीछे ईश्वर की सत्ता को नकारना निश्चित रूप से गलत फैसला है। भगत सिंह की नास्तिकता वह नास्तिकता नहीं है जिसे आज के वामपंथी गाते हैं। यह एक 23 वर्ष के जोशीले, देशभक्त नौजवान युवक की क्षणिक प्रतिक्रिया मात्र है, व्यवस्था के प्रति आक्रोश है। भगतसिंह की जीवन शैली, उनकी पारिवारिक और शैक्षणिक पृष्ठभूमि और सबसे बढऋकर उनके जीवन-शैली से सिद्ध होता है कि किसी भी आस्तिक से आस्तिकता में कमतर नहीं थे। वे परोपकार रूपी धर्म से कभी अलग नहीं हुए, चाहे उन्हें इसके लिए कितनी भी होनि उठानी पड़ी। महर्षि दयानन्द ने इस परोपकार रूपी ईश्वराज्ञा का पालन करना ही धर्म माना है और साथ ही यह भी कहा है कि इस मनुष्य रूपी धर्म से प्राणों का संकट आ जाने पर भी पृथक न होवे। भगतसिंह का पूरा जीवन इसी धर्म के पालन का ज्वलंत उदाहरण है। इसलिए  उनकी आस्तिकता का स्तर किसी भी तरह से कम नहीं आंका जा सकता।
मेरा इस विषय को यहाँ उठाने का मंतव्य यह स्पष्ट करना है कि भारत माँ के चरणों में आहुति देने वाला हर क्रांतिकारी हमारे लिए महान और आदर्श है। उनकी वीरता और देश सेवा हमारे लिए वरणीय है। भगत सिंह की क्रांतिकारी विचारधारा और देशभक्ति का श्रेय नास्तिकता को नहीं अपितु उनके पूर्वजों द्वारा माँ के दूध में पिलाई गयी देश भक्ति कि लोरियां हैं, जिनका श्रेय स्वामी दयानंद, करतार सिंह साराभा, भाई परमानन्द, लाला लाजपत राय, प्रोफेसर जयदेव विद्यालंकार, भगत सिंह के दादा आर्यसमाजी सरदार अर्जुन सिंह और उनके परिवार के अन्य सदस्य, सिख गुरुओं की बलिदान की गाथाओं को जाता है, जिनसे प्रेरणा की घुट्टी उन्हें बचपन से मिली थी और जो निश्चित रूप से आस्तिक थे। भगत सिंह की महानता को नास्तिकता के तराजू में तोलना साम्यवादी लेखकों द्वारा शहीद भगत सिंह के साथ अन्याय के समान है। वैसे साम्यवादी लेखको कि दोगली मानसिकता के दर्शन हमें तब भी होते हैं जब वे भगत सिंह द्वारा गोरक्षा के लिए हुए कुका आंदोलन एवं वंदे मातरम के आज़ादी के उद्घोष के समर्थन में उनके द्वारा लिखे हुए साहित्य कि अनदेखी इसलिए करते हैं क्यूंकि यह उनकी पार्टी के एजेंडे के विरुद्ध जाता हैं। प्रबुद्ध  पाठक स्वयं पइस आशय को समझ सकते हैं।
डॉ विवेक आर्य

Thursday, September 26, 2013

Life and ideas of Dayanand Saraswati



According to Dr. S. Radhakrishna, "among the markers of modern India who had played and important role in the spiritual uplift of people and kindled the fire of patriotism, among them Swami Dayananda occupied the chief place." Swami Dayananda was a great social reformer and also a cultural nationalist. He was a great soldier of light, a warrior in God's world, a sculptor of men and institution. Dayananda Saraswati's greatest contribution was the foundation of Arya Samaj which brought a revolution in the field of religion.

Life of Dayananda:

Dayananda was born in an orthodox Brahman family at Tankara in the Morvi state in Kathiawar in 1824. The name of his father was Karsamji Tiwari who served as a priest in a saiva temple. The childhood name of Dayananda was Mulasi Dayaram or Mulasankar.

Under the loving care of his father Dayananda had acquired proficiency in Veda, Sanskrit grammar and Sanskrit language from childhood. Like Gautama became Buddha after witnessing four ordinary scenes of life, Dayananda's life style changed after a single incident. When he was fourteen years of age he kept fast on the Shivaratri day with the other members of the family.

At night other members of the family after worshipping Shiva began to sleep but Mulaji remained vigilant. He saw a rat eating the offering made to Shiva by the Devotees. This incident led him to think that the idol of Shiva could not be real God. When the idol could not protect the offering made to it, it could never protect the whole world. He became convinced about the futility of idol worship.

This experience aroused his conscience and Dayananda became a staunch crusader against the vices of Hinduism. His father tried to involve him in family life through marriage with a view to put restriction on his independent mind. Dayananda was not willing to enter into the bondage of family life.

The death of his uncle and sister further made him pensive to find out the real nature of death. Dayananda left home in search of truth and knowledge only at the age of 21in A.D. 1845. For long fifteen years Dayananda wandered from the bank of the Narmada to the caves of Himalayas in search of true God, but failed in finding an answer to his quest. During this period he came in contact with Lal Bhagat sect and Paramananda Paramhansa. The experience of the long travels made him more conscious on the vices of traditional Hinduism. In 1861 at Mathura Dayananda came in contact with Swami Brijananda.

This contact is decisive point in his career. He became his disciple and studied the ancient religious literature, various mythological books and Sanskrit grammar text. The philosophical foundation of Dayananda took concrete shape at Mathura. He got knowledge and realization. Mulasankara became Dayananda Sarswati and by the instruction of his guru Vrijananda dedicated himself to spread the message of Veda and to fight against the conservative Hindu religion and wrong traditions.

Dayananda though had contact with Brahmo Samaj; they were not prepared to accept the supremacy of the Vedas and transmigration of soul. To fulfill the mission of his life, he founded Arya Samaj at Bombay on 10th April, 1875 and passed the rest of his life in establishing Arya Samaj branches at different places. The reformative zeal of Dayananda irritated the orthodox Hindus. Dayananda stood firm and resolute in the face of criticisms. He died of food poisoning on 30th October, 1883.

Works of Dayananda:

The philosophy of Dayananda Saraswati can be known from his three famous contributions namely "Satyartha Prakash", ""Veda Bhashya Bhumika" and "Veda Bhashya Bhumika" and Veda Bhashya. Further the journal "Arya Patrika' edited by him also reflects his thought. Besides establishing his reputation as a prolific writer, above works indicate his role as a religious reformer. Swamiji believed that selfish and ignorant priests had perverted Hindu religion.

To him Veda is rock-bed of Hindu culture and infallible, being the inspired one of God. He tried to purge Hinduism from its vices and to provide it a rational basis. He gave the clarion call "Goods Back to Vedas". As a social reformer Dayananda was not influenced by western culture but was a true symbol of Hinduism. His approach was reformative to strengthen the fighting spirit of Hinduism.

He was against idol worship, caste system, ritualism, fatalism, infanticide, sale of grooms etc. he also stood for the liberation of women and upliftment of depressed class. Keeping in mind the supremacy of Vedas and Hindus, he opposed Islam and Christianity and advocated for Suddhi movement to reconvert the other sects to Hindu order. Swami Dayananda Saraswati sincerely believed that through the spread of Vedic education the urge of regeneration of Indian society could be met.

The gurukulas, Girl's Gurukulas and DAV colleges were the most significant contribution of Dayananda. In fact the efforts of Swami Dayanananda freed the people from the clutches of western education. Dayananda Saraswati also contributed to the growth of democracy and national awakening. It is said that "political independence was one of the first objectives of Dayananda. Indeed he was the first man to use the term Swaraj. "

He was the first to insist on people to use only swadeshi things manufactured in India and to discard the foreign things. He was the first to recognize Hindi as national language of India." Dayananda Saraswati was the strong votary of democracy and self government. He declared that good Government was no substitute for self-government.

He paid utmost attention to the regeneration of rural India. In many ways Dayananda anticipated Mahatma Gandhi in his constructive programme. His Arya Samaj was constituted through the procedure of democratic election from the below to bottom. Swami Dayananda represented a transitional stage and inaugurated future developments with his vision of a complete overhaul of Hindu Society.

Dayananda founded the first Arya Samaj at Bombay in 1875 and another at Lahore in 1877. The Arya Samaj was the institutional symbol of Dayananda's philosophy. The Samaj had done splendid work in social and educational field.

The success of this Samaj has been greatly due to commendable contribution of three gifted successors of Dayananda-Lala Hansaraj, Pandit Guru Dutt and Lala Lajpat Rai. The objectives of Arya Samaj was to recover and revive the forgotten values of Aryan culture, to inspire the Indians with the great Aryan ideal of the past and to reestablish the greatness of India by responding to internal as well as external challenges.

The members of Arya Samaj were guided by "Ten Principles" of which the first one was to study and realize the importance of Veda. The other principles provide emphasis on leading a moral and virtuous life. The Arya Samajists believe in one Supreme Being, who is omnipotent, eternal and maker of all. Dayananda believed in God alone and difference did not want the people to mistake shadow for the substance. Arya Samjists also emphasized on the expansion of education and abolition of illiteracy.

They also believed in karma and rebirth pursued path for the well being of the world. The Arya Samajists were opposed to idolatry, ritual and priesthood, and particularly to the prevalent caste system and popular Hinduism as preached by orthodox Brahmins.

They were also the ardent advocate of social reform, enlistment of women and depressed class and spread of education. The Arya Samajists stood for social equality and championed social solidarity and consolidation. One of the objectives of Arya Samaj was to prevent conversion of Hindus to other religions and to reconvert those Hindus who had been converted to other religions like Islam and Christianity through a pacificator ceremony called Shuddhi.

The Arya Samaj movement through its multi-dimensional activities weakened the hold of orthodox and conservative elements. It also contributed more than the rational movement of Brahmo Samaj to the development of a new national consciousness in India.

To conclude with the observation of cultural Heritage of India Series "The Arya Samaj is Dayananda writ large, and it reflects his versatile personality. It has in it saints, philosophers, organisers, scholars, thinkers and the laity-all reflecting in different prisms, in potent ways, the light of the brilliant son of lofty moral and spiritual ideals that Dayananda embodied. There is no doubt that his personality will leave its impress on humanity, and will influence, in an increasing measure, the religious history of India and the world."
 
Dr Satish Prakash

निजामुद्दीन दरगाह के हाकिम ख्वाजा हसन निजामी और "दाइये इस्लाम"


  निजामुद्दीन दरगाह के हाकिम ख्वाजा हसन निजामी और "दाइये इस्लाम" 

किसी भी दैनिक अख़बार को उठा कर देखिये आपको पढ़ने को मिलेगा की आज हिंदी फिल्मों का कोई प्रसिद्द अभिनेता या अभिनेत्री अजमेर में गरीब नवाज़ अथवा निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर चादर चढ़ा कर अपनी फिल्म के हिट होने की मन्नत मांगने के लिए गया। भारतीय समाज में भी एक विशेष आदत हैं, वह हैं अँधा अनुसरण करने की। क्रिकेट स्टार, फिल्म अभिनेता, बड़े उद्योगपति जो कुछ भी करे भी उसका अँधा अनुसरण करना चाहिए चाहे बुद्धि उसकी अनुमति दे चाहे न दे। 



दिल्ली के एक कोने में निजामुद्दीन औलिया की दरगाह हैं। १९४७ से पहले इस दरगाह के हाकिम का नाम था ख्वाजा हसन निजामी था। आज के मुस्लिम लेखक निज़ामी की प्रशंसा उनके उर्दू साहित्य को देन अथवा बहादुर शाह ज़फर द्वारा १८५७ के संघर्ष पर लिखी गई पुस्तक को पुन: प्रकाशित करने के लिए करते हैं। परन्तु निज़ामी के जीवन का एक और पहलु था। वह था मतान्धता। 



धार्मिक मतान्धता के विष से ग्रसित निज़ामी ने हिन्दुओं को मुसलमान बनाने के लिए १९२० के दशक में एक पुस्तक लिखी थी जिसका नाम था दाइये इस्लाम। इस पुस्तक को इतने गुप्त तरीके से छापा गया था की इसका प्रथम संस्करण का प्रकाशित हुआ और कब समाप्त हुआ इसका मालूम ही नहीं चला। इसके द्वितीय संस्करण की प्रतियाँ अफ्रीका तक पहुँच गई थी। एक आर्य सज्जन को उसकी यह प्रति अफ्रीका में प्राप्त हुई जिसे उन्होंने स्वामी श्रद्धानंद जी को भेज दिया। स्वामी ने इस पुस्तक को पढ़ कर उसके प्रतिउत्तर में पुस्तक लिखी जिसका नाम था "खतरे का घंटा"। इस पुस्तक में उस समय के २१ करोड़ हिन्दुओं में से १ करोड़ हिन्दुओं को इस्लाम में दीक्षित करने का लक्ष्य रखा गया था।

इस पुस्तक के कुछ सन्दर्भों के दर्शन करने मात्र से ही लेखक की मानसिकता का बोध हमें आसानी से मिल जायेगा की किस हद तक जाकर हिन्दुओं को मुस्लमान बनाने के लिए मुस्लिम समाज के हर सदस्य को प्रोत्साहित किया गया था जिससे न केवल धार्मिक द्वेष के फैलने की आशंका थी अपितु दंगे तक भड़कने के पूरे असार थे। आइये इस पुस्तक के कुछ अंशों का अवलोकन करते हैं।

१. फकीरों के कर्तव्य - जीवित पीरों की दुआ से बे औलादों के औलाद होना या बच्चों का जीवित रहना या बिमारियों का दूर होना या दौलत की वृद्धि या मन की मुरादों का पूरा होना, बददुआओं का भय आदि से हिन्दू लोग फकीरों के पास जाते हैं बड़ी श्रद्धा रखते हैं। मुस्लमान फकीरों को ऐसे छोटे छोटे वाक्य याद कराये जावे,जिन्हें वे हिन्दुओं के यहाँ भीख मांगते समय बोले और जिनके सुनने से हिन्दुओं पर इस्लाम की अच्छाई और हिन्दुओं की बुराई प्रगट हो।



२. गाँव और कस्बों में ऐसा जुलुस निकालना जिनसे हिन्दू लोगों में उनका प्रभाव पड़े और फिर उस प्रभाव द्वारा मुसलमान बनाने का कार्य किया जावे।



३. गाने बजाने वालों को ऐसे ऐसे गाने याद कराना और ऐसे ऐसे नये नये गाने तैयार करना जिनसे मुसलमानों में बराबरी के बर्ताव के बातें और मुसलमानों की करामाते प्रगट हो।



४. गिरोह के साथ नमाज ऐसी जगह पढ़ना जहाँ उनको दूसरे धर्म के लोग अच्छी तरह देख सके।

५. ईसाईयों और आर्यों के केन्द्रों या उनके लीडरों के यहाँ से उनके खानसामों, बहरों, कहारों चिट्ठीरसारो, कम्पाउन्डरों,भीख मांगने वाले फकीरों, झाड़ू देने वाले स्त्री या पुरुषों, धोबियों, नाइयों, मजदूरों, सिलावतों और खिदमतगारों आदि के द्वारा ख़बरें और भेद मुसलमानों को प्राप्त करनी चाहिए। 

६. सज्जादा नशीन अर्थात दरगाह में काम करने वाले लोगों को मुस्लमान बनाने का कार्य करे।

७. ताबीज और गंडे देने वाले जो हिन्दू उनके पास आते हैं उनको इस्लाम की खूबियाँ बतावे और मुस्लमान बनने की दावत दे।

८. देहाती मदरसों के अध्यापक अपने से पढने वालों को और उनके माता पिता को इस्लाम की खूबियाँ बतावे और मुस्लमान बनने की दावत दे।

९. नवाब रामपुर, टोंक, हैदराबाद , भोपाल, बहावलपुर और जूनागढ आदि को , उनके ओहदेदारों ,जमींदारों ,नम्बरदार, जैलदार आदि को अपने यहाँ पर काम करने वालो को और उनके बच्चों को इस्लाम की खूबियाँ बतावे और मुस्लमान बनने की दावत दे।

१०. माली, किसान,बागबान आदि को आलिम लोग इस्लाम के मसले सिखाएँ क्यूंकि साधारण और गरीब लोगों में दीन की सेवा करने का जोश अधिक रहता हैं।

११. दस्तगार जैसे सोने,चांदी,लकड़ी, मिटटी, कपड़े आदि का काम करने वालों को अलीम इस्लाम के मसलों से आगाह करे जिससे वे औरों को इस्लाम ग्रहण करने के लिए प्रोत्साहित करे।

१२. फेरी करने वाले घरों में जाकर इस्लाम के खूबियों बताये , दूकानदार दुकान पर बैठे बैठे सामान खरीदने वाले ग्राहक को इस्लाम की खूबियाँ बताये।

१३. पटवारी, पोस्ट मास्टर, देहात में पुलिस ऑफिसर, डॉक्टर , मिल कारखानों में बड़े औहदों पर काम करने वाले मुस्लमान इस्लाम का बड़ा काम अपने नीचे काम करने वाले लोगों में इस्लाम का प्रचार कर कर हैं सकते हैं।

१४. राजनैतिक लीडर, संपादक , कवि , लेखक आदि को इस्लाम की रक्षा एह वृद्धि का काम अपने हाथ में लेना चाहिये। 

१५. स्वांग करने वाले, मुजरा करने वाले, रण्डियों को , गाने वाले कव्वालों को, भीख मांगने वालो को सभी भी इस्लाम की खूबियों को गाना चाहिये।

यहाँ पर सारांश में निज़ामी की पुस्तक के कुछ अंशों को लिखा गया हैं। पाठकों को भली प्रकार से निज़ामी के विचारों के दर्शन हो गये होंगे। 

१९४७ के पहले यह सब कार्य जोरो पर था , हिन्दू समाज के विरोध करने पर दंगे भड़क जाते थे, अपनी राजनितिक एकता , कांग्रेस की नीतियों और अंग्रेजों द्वारा प्रोत्साहन देने से दिनों दिन हिन्दुओं की जनसँख्या कम होती गई जिसका अंत पाकिस्तान के रूप में निकला। 

अब पाठक यह सोचे की आज भी यही सब गतिविधियाँ सुचारू रूप से चालू हैं केवल मात्र स्वरुप बदल गया हैं। हिंदी फिल्मों के अभिनेता,क्रिकेटर आदि ने कव्वालों , गायकों आदि का स्थान ले लिया हैं और वे जब भी निजामुद्दीन की दरगाह पर माथा टेकते हैं तो मीडिया में यह खबर ब्रेकिंग न्यूज़  बन जाती हैं। उनको देखकर हिन्दू समाज भी भेड़चाल चलते हुए उनके पीछे पीछे उनका अनुसरण करने लगता हैं। 

देश भर में हिन्दू समाज द्वारा साईं संध्या को आयोजित किया जाता हैं जिसमे अपने आपको सूफी गायक कहने वाला कव्वाल हमसर हयात निज़ामी बड़ी शान से बुलाया जाता हैं। बहुत कम लोग यह जानते हैं की कव्वाल हमसर हयात निज़ामी 

के दादा ख्वाजा हसन निज़ामी के कव्वाल थे और अपने हाकिम के लिए ठीक वैसा ही प्रचार इस्लाम का करते थे जैसा निज़ामी की किताब में लिखा हैं। कहते हैं की समझदार को ईशारा ही काफी होता हैं यहाँ तो सप्रमाण निजामुद्दीन की दरगाह के हाकिम ख्वाजा हसन निजामी और उनकी पुस्तक दाइये इस्लाम पर प्रकाश डाला गया हैं। 

 हिन्दू समाज कब इतिहास और अपनी गलतियों से सीखेगा?

डॉ विवेक आर्य

किसी भी दैनिक अख़बार को उठा कर देखिये आपको पढ़ने को मिलेगा की आज हिंदी फिल्मों का कोई प्रसिद्द अभिनेता या अभिनेत्री अजमेर में गरीब नवाज़ अथवा निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर चादर चढ़ा कर अपनी फिल्म के हिट होने की मन्नत मांगने के लिए गया। भारतीय समाज में भी एक विशेष आदत हैं, वह हैं अँधा अनुसरण करने की। क्रिकेट स्टार, फिल्म अभिनेता, बड़े उद्योगपति जो कुछ भी करे भी उसका अँधा अनुसरण करना चाहिए चाहे बुद्धि उसकी अनुमति दे चाहे न दे।

दिल्ली के एक कोने में निजामुद्दीन औलिया की दरगाह हैं। १९४७ से पहले इस दरगाह के हाकिम का नाम था ख्वाजा हसन निजामी था। आज के मुस्लिम लेखक निज़ामी की प्रशंसा उनके उर्दू साहित्य को देन अथवा बहादुर शाह ज़फर द्वारा १८५७ के संघर्ष पर लिखी गई पुस्तक को पुन: प्रकाशित करने के लिए करते हैं। परन्तु निज़ामी के जीवन का एक और पहलु था। वह था मतान्धता।

धार्मिक मतान्धता के विष से ग्रसित निज़ामी ने हिन्दुओं को मुसलमान बनाने के लिए १९२० के दशक में एक पुस्तक लिखी थी जिसका नाम था दाइये इस्लाम। इस पुस्तक को इतने गुप्त तरीके से छापा गया था की इसका प्रथम संस्करण का प्रकाशित हुआ और कब समाप्त हुआ इसका मालूम ही नहीं चला। इसके द्वितीय संस्करण की प्रतियाँ अफ्रीका तक पहुँच गई थी। एक आर्य सज्जन को उसकी यह प्रति अफ्रीका में प्राप्त हुई जिसे उन्होंने स्वामी श्रद्धानंद जी को भेज दिया। स्वामी ने इस पुस्तक को पढ़ कर उसके प्रतिउत्तर में पुस्तक लिखी जिसका नाम था "खतरे का घंटा"। इस पुस्तक में उस समय के २१ करोड़ हिन्दुओं में से १ करोड़ हिन्दुओं को इस्लाम में दीक्षित करने का लक्ष्य रखा गया था।

इस पुस्तक के कुछ सन्दर्भों के दर्शन करने मात्र से ही लेखक की मानसिकता का बोध हमें आसानी से मिल जायेगा की किस हद तक जाकर हिन्दुओं को मुस्लमान बनाने के लिए मुस्लिम समाज के हर सदस्य को प्रोत्साहित किया गया था जिससे न केवल धार्मिक द्वेष के फैलने की आशंका थी अपितु दंगे तक भड़कने के पूरे असार थे। आइये इस पुस्तक के कुछ अंशों का अवलोकन करते हैं।

१. फकीरों के कर्तव्य - जीवित पीरों की दुआ से बे औलादों के औलाद होना या बच्चों का जीवित रहना या बिमारियों का दूर होना या दौलत की वृद्धि या मन की मुरादों का पूरा होना, बददुआओं का भय आदि से हिन्दू लोग फकीरों के पास जाते हैं बड़ी श्रद्धा रखते हैं। मुस्लमान फकीरों को ऐसे छोटे छोटे वाक्य याद कराये जावे,जिन्हें वे हिन्दुओं के यहाँ भीख मांगते समय बोले और जिनके सुनने से हिन्दुओं पर इस्लाम की अच्छाई और हिन्दुओं की बुराई प्रगट हो।

२. गाँव और कस्बों में ऐसा जुलुस निकालना जिनसे हिन्दू लोगों में उनका प्रभाव पड़े और फिर उस प्रभाव द्वारा मुसलमान बनाने का कार्य किया जावे।

३. गाने बजाने वालों को ऐसे ऐसे गाने याद कराना और ऐसे ऐसे नये नये गाने तैयार करना जिनसे मुसलमानों में बराबरी के बर्ताव के बातें और मुसलमानों की करामाते प्रगट हो।

४. गिरोह के साथ नमाज ऐसी जगह पढ़ना जहाँ उनको दूसरे धर्म के लोग अच्छी तरह देख सके।

५. ईसाईयों और आर्यों के केन्द्रों या उनके लीडरों के यहाँ से उनके खानसामों, बहरों, कहारों चिट्ठीरसारो, कम्पाउन्डरों,भीख मांगने वाले फकीरों, झाड़ू देने वाले स्त्री या पुरुषों, धोबियों, नाइयों, मजदूरों, सिलावतों और खिदमतगारों आदि के द्वारा ख़बरें और भेद मुसलमानों को प्राप्त करनी चाहिए।

६. सज्जादा नशीन अर्थात दरगाह में काम करने वाले लोगों को मुस्लमान बनाने का कार्य करे।

७. ताबीज और गंडे देने वाले जो हिन्दू उनके पास आते हैं उनको इस्लाम की खूबियाँ बतावे और मुस्लमान बनने की दावत दे।

८. देहाती मदरसों के अध्यापक अपने से पढने वालों को और उनके माता पिता को इस्लाम की खूबियाँ बतावे और मुस्लमान बनने की दावत दे।

९. नवाब रामपुर, टोंक, हैदराबाद , भोपाल, बहावलपुर और जूनागढ आदि को , उनके ओहदेदारों ,जमींदारों ,नम्बरदार, जैलदार आदि को अपने यहाँ पर काम करने वालो को और उनके बच्चों को इस्लाम की खूबियाँ बतावे और मुस्लमान बनने की दावत दे।

१०. माली, किसान,बागबान आदि को आलिम लोग इस्लाम के मसले सिखाएँ क्यूंकि साधारण और गरीब लोगों में दीन की सेवा करने का जोश अधिक रहता हैं।

११. दस्तगार जैसे सोने,चांदी,लकड़ी, मिटटी, कपड़े आदि का काम करने वालों को अलीम इस्लाम के मसलों से आगाह करे जिससे वे औरों को इस्लाम ग्रहण करने के लिए प्रोत्साहित करे।

१२. फेरी करने वाले घरों में जाकर इस्लाम के खूबियों बताये , दूकानदार दुकान पर बैठे बैठे सामान खरीदने वाले ग्राहक को इस्लाम की खूबियाँ बताये।

१३. पटवारी, पोस्ट मास्टर, देहात में पुलिस ऑफिसर, डॉक्टर , मिल कारखानों में बड़े औहदों पर काम करने वाले मुस्लमान इस्लाम का बड़ा काम अपने नीचे काम करने वाले लोगों में इस्लाम का प्रचार कर कर हैं सकते हैं।

१४. राजनैतिक लीडर, संपादक , कवि , लेखक आदि को इस्लाम की रक्षा एह वृद्धि का काम अपने हाथ में लेना चाहिये।

१५. स्वांग करने वाले, मुजरा करने वाले, रण्डियों को , गाने वाले कव्वालों को, भीख मांगने वालो को सभी भी इस्लाम की खूबियों को गाना चाहिये।

यहाँ पर सारांश में निज़ामी की पुस्तक के कुछ अंशों को लिखा गया हैं। पाठकों को भली प्रकार से निज़ामी के विचारों के दर्शन हो गये होंगे।

१९४७ के पहले यह सब कार्य जोरो पर था , हिन्दू समाज के विरोध करने पर दंगे भड़क जाते थे, अपनी राजनितिक एकता , कांग्रेस की नीतियों और अंग्रेजों द्वारा प्रोत्साहन देने से दिनों दिन हिन्दुओं की जनसँख्या कम होती गई जिसका अंत पाकिस्तान के रूप में निकला।

अब पाठक यह सोचे की आज भी यही सब गतिविधियाँ सुचारू रूप से चालू हैं केवल मात्र स्वरुप बदल गया हैं। हिंदी फिल्मों के अभिनेता,क्रिकेटर आदि ने कव्वालों , गायकों आदि का स्थान ले लिया हैं और वे जब भी निजामुद्दीन की दरगाह पर माथा टेकते हैं तो मीडिया में यह खबर ब्रेकिंग न्यूज़ बन जाती हैं। उनको देखकर हिन्दू समाज भी भेड़चाल चलते हुए उनके पीछे पीछे उनका अनुसरण करने लगता हैं।

देश भर में हिन्दू समाज द्वारा साईं संध्या को आयोजित किया जाता हैं जिसमे अपने आपको सूफी गायक कहने वाला कव्वाल हमसर हयात निज़ामी बड़ी शान से बुलाया जाता हैं। बहुत कम लोग यह जानते हैं की कव्वाल हमसर हयात निज़ामी के दादा ख्वाजा हसन निज़ामी के कव्वाल थे और अपने हाकिम के लिए ठीक वैसा ही प्रचार इस्लाम का करते थे जैसा निज़ामी की किताब में लिखा हैं।
 
कहते हैं की समझदार को ईशारा ही काफी होता हैं यहाँ तो सप्रमाण निजामुद्दीन की दरगाह के हाकिम ख्वाजा हसन निजामी और उनकी पुस्तक दाइये इस्लाम पर प्रकाश डाला गया हैं।

हिन्दू समाज कब इतिहास और अपनी गलतियों से सीखेगा?

डॉ विवेक आर्य

Monday, September 23, 2013

इस्लाम प्रचारक भाइयों से कुछ सवाल

 
 


(जहाँ पर भी ऐसा पोस्टर देखे उनसे इस्लाम के विषय में ये सवाल अवश्य पूछे)

पुस्तक मेले में मिशन इस्लाम वाले मिले थे।
 कुछ प्रश्न पूछे झुंझला उठे।

 एक दो प्रश्न को यहाँ पर लिख रहा हूँ।

 १. अगर एक नमाज़ पढ़ते हुए शिया को आत्मघाती हमले में एक सुन्नी बम्ब से मार डाले तो दोनों में से जन्नत कौन जायेगा और दोज़ख में किसे प्रवेश मिलेगा?

 २. अल्लाह का एक नाम रहीम हैं अर्थात रहम करने वाला। यह बताओ की अल्लाह को क्यूँ रहम नहीं आता की जो ईद के दिन अपनी खुशामद के लिए लाखों निरपराध प्राणियों की गर्दन पर तलवार चलवा देता हैं?

 ३. अगर कुरान के अनुसार अल्लाह ने सभी जानवरों को भोजन के लिए बनाया हैं तो फिर क्यूँ गर्दन काटते समय सभी जानवर चिल्लाते हैं, रोते हैं और उन्हें दर्द होता हैं, क्यूँ अपनी प्राण रक्षा करने के लिए प्रयास करते हैं। अल्लाह की बनाई हुई सृष्टी में कोई दोष नहीं हैं फिर यह दोष क्यूँ?

 ४. विकासवाद को अधर बनाकर मुस्लिम लोग कहते हैं की वेद पुराने समय के लिए थे आज के लिए कुरान हैं। चलो एक बार विकासवाद को भी मान लेते हैं फिर यह बताओ की कुरान के आने के बाद मनुष्य का विकास क्यूँ रुक गया जो आप उसे last एंड final किस आधार पर मानते हैं?

५. माँस खाने के पीछे कुतर्क देते हैं की अगर जानवरों को नहीं खायेगे तो वे इतने बढ़ जायेगे की धरती पर स्थान नहीं बचेगा। कल को मनुष्य की जनसँख्या का भी यही समाधान आप लोगो ने ढूंढा हैं क्या?

६. ओसामा बिन लादेन की लाश को मरने के बाद समुद्र में फैक दिया गया और उसकी लाश को मछलियाँ खा गई। अब यह बताओ कयामत के दिन किस कब्र से उसकी रूह हिसाब किताब देने के लिए निकलेगी? मतलब ओसामा बिन लादेन को न जन्नत मिली न दोज़ख।

 ७. अगर एक १ वर्ष का बच्चा अकाल मृत्यु से मर जाये तो जन्नत में जाकर वह जवान ७२ हूरों की क्या गोदी में खेलेगा? अगर हाँ तो उन हूरों की प्यास कौन बुझायेगा?

 ८. इस्लाम को मानने वालो के अनुसार मुहम्मद साहिब बड़े बड़े चमत्कार दिखाते थे जैसे चाँद के दो टुकड़े करना इत्यादि। जब मुहम्मद साहब के नवजात लड़के की अकाल मृत्यु हो गई तब वह क्यूँ फुट-फुट कर रोये, अपने बच्चे को चमत्कार से वापिस जिन्दा क्यूँ नहीं कर दिया?

 ९. मुहम्मद साहिब ने ३२ निकाह स्वयं किये और अनेक गुलाम बंदियाँ को पनाह दी मगर उन्होंने एक पाक मुस्लमान के लिए ४ ही निकाह क्यूँ बताये, उससे अधिक ३२ विश्व में केवल निकाह क्यूँ नहीं बताये?

 १०. गुलाम बनाने की कुप्रथा विश्व में केवल और केवल इस्लाम मत की धर्म पुस्तक और इतिहास में मिलती हैं। मानवाधिकार के तराजू में इस कुप्रथा को किस आधार पर सही ठहराया जा सकता हैं?

डॉ विवेक आर्य

 

मनुष्य सच्चा नेता कैसे बनता हैं?


मनुष्य सच्चा नेता कैसे बनता है?

डॉ विवेक आर्य

आज कल सभी को एक बुखार चढ़ा है, वो है नेता बनने का। पर सच्चा नेता कोई विरला ही बन पाता है।

आर्य समाज के इतिहास में कई बड़े और सच्चे नेता अपने जीवन से, अपने तप से, अपनी दिनचर्या से न केवल अपने जीवन का उद्धार कर चुके हैं। अपितु अन्यों के जीवन में भी क्रांति का सूत्रपात करते रहे है।

स्वामी श्रद्धानन्द, लाला लाजपतराय, महात्मा नारायण स्वामी, स्वामी स्वतंत्रानन्द जी महाराज उन महान आत्माओं में से हैं जिनके जीवन चरित हमें आज भी प्रेरणा दे रहे है
। स्वामी श्रद्धानन्द जी के जीवन को निकट से देखने से हमें मालूम चलता हैं की उनके बड़े नेता बनने का सबसे बड़ा कारण था ईश्वर में उनका विश्वास एवं संकट ग्रस्त किसी भी आर्य सज्जन को यथा संभव सहायता पहुँचाना।

चाहे कहीं भी हो स्वामी जी कभी आर्यसमाज का विरोध कर रहे लोगो से शास्त्रार्थ करते, कभी अदालत में गोपीनाथ ढोंगी की पोल खोलते दीखते, कभी विधवा विवाह के समर्थन में विरोधी पंचायत को शक्तिहिन कर देते, कभी स्थान स्थान पर जाकर आर्य कार्यकर्ताओं के मुकदमों को अपना मुकदमा समझ कर लड़ते, कभी आर्ष शिक्षा पद्यति के उद्धार ले लिए गले में झोला टांग कर दान संग्रह करने निकल पड़ते, कभी जंगलों में गुरुकुल की सहायता के लिए अपनी समस्त संपत्ति को दान करते दीखते, कभी अंग्रेजों के विरोध में चांदनी चौक में अपना सीना खोल कर खड़े हो जाते, कभी हिन्दू मुस्लिम एकता के लिए जामा मस्जिद के मिम्बर से व्याख्यान देते, कभी शुद्धि के रण में महारथी बन विकट से विकट संकटों का सामना करते थे।

स्वामी जी के जीवन के कुछ प्रसंगों को यहाँ पर देकर यह समझने का प्रयास किया जा सकता हैं की किस प्रकार जीवन में सच्चा नेता बना जाता हैं।

महात्मा मुंशीराम एवं कपूरथला का वैदिक संस्कार

महात्मा मुंशीराम एवं कुछ अन्य सज्जनों के सहयोग से कपूरथला में 1894 में आर्य समाज की स्थापना हुई। पहले पहल आर्यसमाज की कार्य वही लाला अमरनाथ सरना जी की दुकान पर होती थी। शहर का कोतवाल सदैव लाला जी को तंग करने के मंशा से पीछे पड़ा रहता था और उन्हें धमकी तक दे डालता था कि अगर आर्यसमाज का प्रचार किया तो किसी न किसी दिन जेल जाना पड़ेगा। कुछ काल पश्चात सुल्तानपुर में आर्यसमाज किराये पर ले लिया गया एवं साप्ताहिक सत्संग वही लगने लगा। 1910 में आर्य समाज के मंदिर का भी निर्माण हो गया। 1924 में इसी समाज मंदिर में स्वामी जी द्वारा सैकड़ों हरिजनों की शुद्धि की गई थी।

1901 में लाला अमरनाथ सरना जी की माता जी का देहांत हो गया। उन्होंने अपनी माता जी का दाह संस्कार वैदिक रीती से करने की घोषणा कर दी। इस समाचार को सुनते ही नगर में हलचल मच गई। लाला जी के घर पर पुलिस आ गई और कहा की यदि आपने वैदिक रीति से संस्कार किया तो आपको जीवन भर कारागार में रहना पड़ेगा। यह समाचार जालंधर और लुधियाना के समाजों तक फैल गया। महात्मा मुंशीराम जी कई अन्य आर्यों के साथ सांय चार बजे लाला जी के यहाँ पर पहुँच गये। अर्थी उठाई गई और बाज़ार में लाई गई। कोतवाल ने अर्थी को रोक लिया। महात्मा जी ने झट कहा- आपने किस विधान से अर्थी को रोका है? क्या आपको यह नहीं मालूम की अर्थी को रोकना मना है? यह सुनकर कोतवाल पीछे हट गया। इतने में बाज़ार से लेकर शमशान भूमि तक पुलिस ने घेराबंदी कर दी। अर्थी के शमशान में पहुँचने के समय वहाँ पर पर्याप्त पुलिस की पलटन थी। रियासत के सब एहलकार लोग हाथियों पर चढ़कर इस संस्कार को देखने आये थे। दर्शक लोग वहाँ पर सैकड़ों की संख्या में उपस्थित थे। दाह संस्कार विधिपूर्वक सम्पन्न हो गया। संस्कार के पश्चात पौराणिक पंडितों ने आर्यसमाज के सदस्यों का सामाजिक बहिष्कार कर दिया। आर्यों के लिए खाने-पिने का सामान दो माह तक जालंधर से आता था।

महात्मा मुंशी राम जी के भागीरथ प्रयास से ही उत्तर भारत विशेष रूप से पंजाब में गली गली में आर्यों का निर्माण हुआ जिनकी सहयोग से ही महात्मा जी गुरुकुल कांगड़ी जैसी वैभव शाली क्रांतिकारी संस्था का निर्माण करने में सक्षम हुए थे।

स्वामी श्रद्धानंद एवं महाशय चिरंजीलाल का मुकदमा

आर्यसमाज के अनन्य प्रचारक महाशय चिरंजीलाल जी पंडित लेखराम के समान वैदिक धर्म के प्रचार प्रसार में अपना तन, मन, धन समर्पित करने वाले प्रचारक थे। 19 वर्ष की आयु में आपने 1877 में स्वामी दयानंद के दर्शन लुधियाना में किये थे। बस तभी से आपने वैदिक धर्म का प्रचार करने की ठान ली थी। परन्तु एक तो आपका विवाह हो चूका था ऊपर से आपके पिताजी की मृत्यु होने से घर का सार बोझ आपके कंधो पर आ चूका था। 10-12 वर्ष तक आपने किसी प्रकार धैर्य किया और दुकानदारी से कुटुम्ब का भरण पोषण करने लगे। जब छोटा भाई कार्य भार सँभालने योग्य हो गया तो आप प्रचार कार्य में निकल पड़े। इनके प्रचार का साधन इन्ही की बनाई हुई पंजाबी की सी हर्फियाँ होती थी। उन्हें यह उर्दू में छपवा लेते और गा-गा कर उनका प्रचार करते थे। आप पर एक अभियोग भी चला जिसके कारण आपको 4 मास की सजा हुई और 50 रुपये का दंड मिला। आपके लिए महात्मा मुंशीराम ने अपील की जिससे आप छूट गए पर कुछ काल तक आपको जेल में रहना पड़ा था। कारावास की यह कहानी करुणाजनक है। इस कारावास ने आपके प्रचार को द्विगुणित कर दिया। संगठन निर्माणकर्ता वही बन सकता है जो अपने सहयोगियों के दुःख और दर्द में उनका साथ दे।

गढ़वाल में विरोध के बीच सहायता कार्य

सन 1918 में जब गढ़वाल में अकाल पड़ा था। स्वामी जी महाराज ने अकाल पीड़ितों की सहायता का विशाल आयोजन किया। और अपने मानसिक पुत्रों ( गुरुकुल के छात्रों ) को इस यज्ञ में अपनी अपनी आहुति देने के लिए निमंत्रित किया। इस आदेश के समय हम उस समय महाविद्यालय विभाग के प्राय : सब ब्रहमचारी सेवा कार्यार्थ वहां पहुँच गए और श्रदेय स्वामी जी की अधीनता में कार्य करने लगे। स्वामी जी पौड़ी, रूद्रप्रयाग, उत्तर काशी, केदारनाथ आदि अनेक स्थानों पर गए। उनका ह्रदय पीड़ितों के लिए सहानुभूति भरा और संवेदन शील था। पीड़ितों की अवस्था को देखकर उनकी आँखों में आंसू आ जाते थे तथापि वे उनके दुःख निवारणार्थ वे आतुर रहते थे। कई बार वे 19-20 मील तक हमारे साथ चलते थे। और अपने आराम की तनिक भी चिन्ता न करते थे। उन्हीं दिनों की बात हैं की गढ़वाल के एक स्थानीय पत्र में किसी आर्यसमाजी सज्जन ने वहां की सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध एक लेख लिखा जिससे गढ़ वाली जनता में खलबली मच गई और कुछ अविवेकी गढ़वालियों ने आर्यसमाज के सर्वमान्य नेता के रूप में स्वामी श्रद्धानन्द जी पर ही आक्रमण करने का निश्चय किया और इस उद्देश्य से पौड़ी (गढ़वाल की राजधानी में) एक सभा बुलवाई। इसकी सुचना अपने कुछ भक्तों द्वारा पाते ही (जिन्होंने जिन्होंने उनसे निवेदन किया की वे पौड़ी न जाये ताकि दुष्ट उन पर किसी प्रकार का आक्रमण उस उत्तेजित अवस्था में न कर बैठे)। वीर केसरी स्वामी श्रद्धानन्द जी महाराज न केवल रूद्र प्रयाग से पौड़ी पहुंचे बल्कि उस सभा में भी जा पहुंचे। जहाँ उनके विरुद्ध बड़ी भयंकर उत्तेजना फैलाई जा रही थी। वीर नरसिंह के उस सभा में पहुँचते ही सारा वायु मंडल परिवर्तित हो गया और स्वामी जी के निंदासूचक प्रस्ताव के स्थान में चारों और से उनकी सेवाओं के लिए अभिनन्दन किया जाने लगा। यह था निर्भयता का आदर्श जो ईश्वर के सच्चे भगत उन वीर सन्यासी ने प्रत्येक समय दिखाया था और जिसके कारण सब विरोधिनी शक्तियों पर विजय प्राप्त करने में वे सफल हुए थे।

छात्रों के प्रति उनकी उदारता

वे अपने छात्रों का कितना ख्याल रखते थे। इसका एक उदहारण सुनिए। गुरुकुल की कक्षा में एक लड़का सत्यप्रिय था। उसको किसी अपराध पर उन्होंने गुरुकुल से निकाल दिया था। कुछ काल बाद रंगून से उनके किसी व्यापारी मित्र ने उन्हें लिखा कि उसे एक लेखक की आवश्यकता है। वे किसी को भेज दे। उन्होंने सत्य प्रिय को लिखा की वे उनका पत्र लेकर रंगून चला जाये। उसकी नियुक्ति वहा 80 या 100 रुपये में कर दी है।

इस लेख का मुख्य उद्देश्य यह बताना हैं की कोई भी व्यक्ति सच्चा नेता अपने जमीनी कार्यकर्ताओं के विपत्तिकाल में सहयोग से बनता है ।उनके रक्षण से बनता है नाकि अपने नाम के आगे नेता लगाने से बनता है।


क्या सिकंदर महान था ?

 
 
सिकंदर (एलेक्सजेंडर) का नाम आते ही एक महान योद्धा और नेक राजा की छवि सामने आ जाती है | पाठ्य पुस्तकों में सिकंदर महान नाम से प्रचलित इतिहास के अध्याय और कहानिया पढ़ कर हम ऐसे क्रूर और कायर आक्रमणकारी को महान बताते है जिसका इतिहास में कही सम्मान नहीं हुआ |
यह सारा भ्रम पैदा हुआ है पश्चिम की शिक्षा प्रणाली को अपनाने की वजह से , सिकन्दर अथवा अलक्ष्येन्द्र (एलेक्ज़ेंडर तृतीय, एलेक्सजेंडर दी ग्रेट तथा ...एलेक्ज़ेंडर मेसेडोनियन) मेसेडोनिया का ग्रीक शासक था इसीलिए ग्रीस में सिकंदर का बहुत प्रभाव था और पश्चिमी लेखको ने वही से सारा इतिहास उतार कर विश्वभर में प्रस्तुत किया, ग्रीस के प्रभाव से लिखी गई पश्चिम के इतिहास की किताबों में यही बताया जाता है की सिकंदर एक महान योद्धा था, एक विश्व विजेता था, मगर जहा भी सिकंदर ने हमला किया वहा का इतिहास कुछ ओर कहता है जो सिकंदर की वास्तविक छवी दर्शित होती है | सत्य यह है कि सिकंदर महान नहीं था बल्कि विश्व इतिहास के क्रूरतम आक्रमणकारियों और हत्यारों में से एक था, उसके जीवन में ऐसे तमाम उदाहरण भरे है जिनके आधार पर उसे महान और नेक राजा नहीं कहा जा सकता, पर यह भारत का दुर्भाग्य है या शायद भारतीयों की नासमझी की हमने उसे अपनी आने वाली पीढियों के सामने एक महान शासक बना कर पेश किया है |
एक सभ्यता जिसके इतिहास में सिर्फ गुलामी प्रथा हो, वो सिकंदर को महान बताये तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए पर सर्व गुण ज्ञान सम्पंदा सम्पन भारतीय यदि सिकंदर को महान बताये तो यह चिंता का विषय अवश्य है ,
इसीलिए सिकंदर के बारे में कुछ तथ्य जानने बहुत जरुरी है जो हम भारतीय को इतिहास में नहीं पढाया जाता, और कोशिश करिए की अधिक से अधिक लोग इस सत्य से अवगत हो सके |

सिकंदर अपने पिता की मृत्यु के पश्चात् अपने सौतेले व चचेरे भाइयों को कत्ल करने के बाद मेसेडोनिया के सिंहासन पर बैठा था। अपनी महत्वकन्क्षा के कारण वह विश्व विजय को निकला। अपने आसपास के विद्रोहियों का दमन करके उसने इरान पर आक्रमण किया,इरान को जीतने के बाद गोर्दियास को जीता । गोर्दियास को जीतने के बाद टायर को नष्ट कर डाला। बेबीलोन को जीतकर पूरे राज्य में आग लगवा दी। बाद में अफगानिस्तान के क्षेत्र को रोंद्ता हुआ सिन्धु नदी तक चढ़ आया।

पहला भ्रम यह उत्पन्न किया गया है पश्चिमी शिक्षा में की एलेक्सजेंडर विश्व विजेता था और भारत आक्रमण के दौरान राजा पुरु की हार हुई थी पर सत्य यह है की
सिकंदर को अपनी जीतों से घमंड होने लगा था । वह अपने को इश्वर का अवतार मानने लगा, तथा अपने को पूजा का अधिकारी समझने लगा। परंतु भारत में उसका वो मान मर्दन हुआ जो कि उसकी मौत का कारण बना।

सिन्धु को पार करने के बाद भारत के तीन छोटे छोटे राज्य थे। ताक्स्शिला (जहाँ का राजा अम्भी था), पोरस, और अम्भिसार ,जो की काश्मीर के चारो और फैला हुआ था। अम्भी का पुरु से पुराना बैर था, इसलिए उसने सिकंदर से हाथ मिला लिया। अम्भिसार ने भी तठस्त रहकर सिकंदर की राह छोड़ दी, परंतु भारतमाता के वीर पुत्र पुरु ने सिकंदर से दो-दो हाथ करने का निर्णय कर लिया।

कुछ प्रमाणों के आधार पर और इतिहासकारो के अनुसार सिकंदर कितना महान था ::

सिकंदर ने आम्भी की साहयता से सिन्धु पर एक स्थायी पुल का निर्माण कर लिया।
प्लुतार्च के अनुसार," 20,000 पैदल व 15000 घुड़सवार सिकंदर की सेना पुरु की सेना से बहुत अधिक थी, तथा सिकंदर की साहयता आम्भी की सेना ने भी की थी। "

कर्तियास लिखता है की, "सिकंदर झेलम के दूसरी और पड़ाव डाले हुए था। सिकंदर की सेना का एक भाग झेहलम नदी के एक द्वीप में पहुच गया। पुरु के सैनिक भी उस द्वीप में तैरकर पहुच गए। उन्होंने यूनानी सैनिको के अग्रिम दल पर हमला बोल दिया। अनेक यूनानी सैनिको को मार डाला गया। बचे कुचे सैनिक नदी में कूद गए और उसी में डूब गए।"
बाकि बची अपनी सेना के साथ सिकंदर रात में नावों के द्वारा हरनपुर से 60 किलोमीटर ऊपर की और पहुच गया। और वहीं से नदी को पार किया। वहीं पर भयंकर युद्ध हुआ। उस युद्ध में पुरु का बड़ा पुत्र वीरगति को प्राप्त हुआ।

एरियन लिखता है कि, "भारतीय युवराज ने अकेले ही सिकंदर के घेरे में घुसकर सिकंदर को घायल कर दिया और उसके घोडे 'बुसे फेलास 'को मार डाला।"
ये भी कहा जाता है की पुरु के हाथी दल-दल में फंस गए थे इस वजह से सिकंदर पुरु के पुत्र को मार पाने में सफल हो पाया |

तो कर्तियास लिखता है कि, "इन पशुओं ने घोर आतंक पैदा कर दिया था। उनकी भीषण चीत्कार से सिकंदर के घोडे न केवल डर रहे थे बल्कि बिगड़कर भाग भी रहे थे। अनेको विजयों के ये शिरोमणि अब ऐसे स्थानों की खोज में लग गए जहाँ इनको शरण मिल सके। सिकंदर ने छोटे शास्त्रों से सुसज्जित सेना को हाथियों से निपटने की आज्ञा दी। इस आक्रमण से चिड़कर हाथियों ने सिकंदर की सेना को अपने पावों में कुचलना शुरू कर दिया।"

वह आगे लिखता है कि, "सर्वाधिक ह्रदयविदारक द्रश्य यह था कि, यह मजबूत कद वाला पशु यूनानी सैनिको को अपनी सूंड से पकड़ लेता व अपने महावत को सोंप देता और वो उसका सर धड से तुंरत अलग कर देता। इसी प्रकार सारा दिन समाप्त हो जाता,और युद्ध चलता ही रहता। "

इसी प्रकार दियोदोरस लिखता है की, "हाथियों में अपार बल था, और वे अत्यन्त लाभकारी सिद्ध हुए। अपने पैरों के तले उन्होंने बहुत सारे यूनानी सैनिको को चूर-चूर कर दिया।

कहा जाता है की पुरु ने अनाव्यशक रक्तपात रोकने के लिए सिकंदर को अकेले ही निपटने का प्रस्ताव रक्खा था। परन्तु सिकंदर ने भयातुर उस वीर प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था।

इथोपियाई महाकाव्यों का संपादन करने वाले इ.ए. दब्ल्यु. बैज लिखता है की, "जेहलम के युद्ध में सिकंदर की अश्व सेना का अधिकांश भाग मारा गया। सिकंदर ने अनुभव किया कि यदि में लडाई को आगे जारी रखूँगा, तो पूर्ण रूप से अपना नाश कर लूँगा। अतः उसने युद्ध बंद करने की पुरु से प्रार्थना की। राजा पुरु मान गए और सिकंदर से संधि करी गयी , भारतीय परम्परा के अनुसार पुरु ने शत्रु का वध नही किया। संधि यह की गयी की राजा पुरु सिकंदर को जीवनदान देंगे बदले में सिकंदर से वचन लिया गया की वो फिर कभी भारत पर हमला नहीं करेगा |

बिल्कुल साफ़ है की प्राचीन भारत की रक्षात्मक दिवार से टकराने के बाद सिकंदर का घमंड चूर हो चुका था। उसके सैनिक भी डरकर विद्रोह कर चुके थे ।
तब सिकंदर ने पुरु से वापस जाने की आज्ञा मांगी। पुरु ने सिकंदर को उस मार्ग से जाने को मना कर दिया जिससे वह आया था। और अपने प्रदेश से दक्खिन की और से जाने का मार्ग दिया।
जिन मार्गो से सिकंदर वापस जा रहा था,उसके सैनिको ने भूख के कारण राहगीरों को लूटना शुरू कर दिया। इसी लूट को भारतीय इतिहास में सिकंदर की दक्खिन की और की विजय लिख दिया। परंतु इसी वापसी में मालवी नामक एक छोटे से भारतीय गणराज्य ने सिकंदर की लूटपाट का विरोध किया।
इस लडाई में सिकंदर बुरी तरह घायल हो गया।

प्लुतार्च लिखता है कि,"भारत में सबसे अधिक खूंखार लड़ाकू जाती मलावी लोगो के द्वारा सिकंदर के टुकड़े टुकड़े होने ही वाले थे, उनकी तलवारे व भाले सिकंदर के कवचों को भेद गए थे।और सिकंदर को बुरी तरह से आहात कर दिया। शत्रु का एक तीर उसका बख्तर पार करके उसकी पसलियों में घुस गया।सिकंदर घुटनों के बल गिर गया। शत्रु उसका शीश उतारने ही वाले थे की प्युसेस्तास व लिम्नेयास आगे आए। किंतु उनमे से एक तो मार दिया गया तथा दूसरा बुरी तरह घायल हो गया।"
इसी भरी मारकाट में सिकंदर की गर्दन पर एक लोहे की लाठी का प्रहार हुआ और सिकंदर अचेत हो गया। उसके अन्ग्रक्षक उसी अवस्था में सिकंदर को निकाल ले गए। भारत में सिकंदर का संघर्ष सिकंदर की मौत का कारण बन गया। अपने देश वापस जाते हुए वह बेबीलोन में रुका। भारत विजय करने में उसका घमंड चूर चूर हो गया। इसी कारण वह अत्यधिक मद्यपान करने लगा, तीर का घाव फैलता गया और वो ज्वर से पीड़ित हो गया। तथा कुछ दिन बाद उसी ज्वर ने उसकी जान ले ली।

सिकंदर की मौत के विषय में यह भी कहा जाता है की राजा पुरु से युद्ध के समय एक हार के बाद यूनानी सैनिक ने नन्द से लड़ने से मना कर हथियार डाल दिए थे की पुरु की 15 सहस्त्र के सेना ने ये हाल किया था तो नन्द की 2.5 लाख की सेना तो पूरी तरह से मिटा ही डालेगी| अपनी सेना के विरोध के बाद सिकंदर ने भी हथियार डाल दिए परन्तु बेबीलोन अपनी राजधानी पहुचने के बाद उसने नन्द से लड़ने की तैयारी शुरू कर दी पर संघ और सेना को ये पसंद नहीं आया । वे भारत जैसे भीमकाय शक्तिशाली राष्ट्र पर आक्रमण कर, शत्रुता कर सबकुछ गवाना नहीं चाहते थे। यदि युद्ध होता तो जो धन सिकंदर फारस से जीता था वो यूनान भेजने के बजाये युद्ध में लगा देता और ये संघ को और सैनिको को मंजूर नहीं था इसीलिए 323 ईसापूर्व में सिकंदर की जहर दे कर हत्या कर दी गयी और वही दूसरी तरफ उसके एकलौते बेटे सिकंदर चतुर्थ की भी।

स्पष्ट रूप से पता चलता है कि सिकंदर भारत के एक भी राज्य को नही जीत पाया । परंतू पुरु से इतनी मार खाने के बाद भी इतिहास में जोड़ दिया गया कि सिकंदर ने पुरु पर जीत हासिल की। भारत में भी महान राजा पुरु की जीत को पुरु की हार ही बताया जाता है। यूनान सिकंदर को महान कह सकता है लेकिन भारतीय इतिहास में सिकंदर को नही बल्कि उस पुरु को महान लिखना चाहिए जिन्होंने एक विदेशी आक्रान्ता का मानमर्दन किया।

सिकंदर की क्रूरता, जूठा इतिहास और अन्य जातियों का पराक्रम -

सिकन्दर को सबसे पहले एक गणराज्य के प्रधान के विरोध का सामना करना पड़ा, जिसे यूनानी ऐस्टीज़ कहते हैं, संस्कृत में जिसका नाम हस्तिन है; वह उस जाति का प्रधान था जिसका भारतीय नाम हास्तिनायन था (पाणिनि, VI, 4, 174) |
यूनानी में इसके लिए अस्टाकेनोई या अस्टानेनोई-जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है, और उसकी राजधानी प्यूकेलाओटिस अर्थात् पुष्कलावती लिखी गई है। इस वीर सरदार ने अपने नगरकोट पर यूनानियों की घेरेबंदी का पूरे तीस दिन तक मुकाबला किया और अंत में लड़ता हुआ मारा गया। इसी प्रकार आश्वायन तथा आश्वकायन भी आखिरी दम तक लड़े, जैसा कि इस बात से पता चलता है कि उनके कम से कम 40,000 सैनिक बंदी बना लिए गए। उनकी आर्थिक समृद्धि का भी अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि इस लड़ाई में 2,30,000 बैल सिकन्दर के हाथ लगे। (चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक: राधाकुमुद मुखर्जी)

आश्वकायनों ने 30,000 घुड़सवार 38,000 पैदल और 30 हाथियों की सेना लेकर, जिनकी सहायता के लिए मैदानों के रहने वाले 7,000 वेतनभोगी सिपाही और थे, सिकन्दर से मोर्चा लिया। यह पूरी आश्वकायनों की क़िलेबंद राजधानी मस्सग [मशक, जो मशकावती नामक नदी के तट पर स्थित था, जिसका उल्लेख पाणिनि के काशिक भाष्य में मिलता है [(VI,2,85;VI,3,119)] में अपनी वीरांगना रानी क्लियोफ़िस (संस्कृत:- कृपा?) के नेतृत्व में आश्वकायनों ने "अंत तक अपने देश की रक्षा करने का दृढ़ संकल्प किया।" रानी के साथ ही वहाँ की स्त्रियों ने भी प्रतिरक्षा में भाग लिया। वेतनभोगी सैनिक के रूप में बड़े निरुत्साह होकर लड़े, परन्तु बाद में उन्हें जोश आ गया और उन्होंने "अपमान के जीवन की अपेक्षा गौरव के मर जाना" ही बेहतर समझा। [मैकक्रिंडिल-कृत इनवेज़न, पृष्ठ 194 (कर्टियस), 270 (डियोडोरस)] उनके इस उत्साह को देखकर अभिसार नामक निकटवर्ती पर्वतीय देश में भी उत्साह जाग्रत हुआ और वहाँ के लोग भी प्रतिरक्षा के लिए डट गए।

भारत पर सिकन्दर के आक्रमण के समय आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त अथवा कौटिल्य) तक्षशिला में प्राध्यापक थे। आचार्य चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को साथ लेकर एक नये साम्राज्य की स्थापना की और सिकन्दर द्वारा पद्दोनित पंजाब के राजदूत सेल्यूकस को हराया। सिकन्दर के आक्रमण के समय सिन्धु नदी की घाटी के निचले भाग में शिविगण के पड़ोस में रहने वाला एक गण का नाम अगलस्सोई था। अस्सकेनोई लोगों ने सिकन्दर से जमकर लोहा लिया और उनके एक तीर से सिकन्दर घायल भी हो गया।
अगालास्सोई जाति के लोगों ने 40,000 पैदल सिपाहियों और 3,000 घुड़सवारों की सेना लेकर सिकन्दर से टक्कर ली। कहा जाता है कि उनके एक नगर के 20,000 निवासियों ने अपने-आपको बंदियों के रूप में शत्रुओं के हाथों में समर्पित करने के बजाय बाल-बच्चों सहित आग में कूदकर प्राण दे देना ही उचित समझा। अस्सपेसिओई गण भारत पर सिकन्दर के आक्रमण के समय पश्चिमोत्तर सीमा पर कुनड़ अथवा त्रिचाल नदी की घाटी में रहता था।

इसके बाद सिकन्दर को कई स्वायत्त जातियों के संघ के संगठित विरोध का सामना करना पड़ा, जिनमें मालव तथा क्षुद्रक आदि जातियाँ थीं, जिनकी संयुक्त सेना में 90,000 पैदल सिपाही, 10,000 घुड़सवार और 900 से अधिक रथ थे। उनके ब्राह्मणों ने भी पढ़ने-लिखने का काम छोड़कर तलवार सम्भाली और रणक्षेत्र में लड़ते हुए मारे गए, "बहुत ही कम लोग बंदी बनाए जा सके।"

कठ एक और वीर जाति थी, जो अपने शौर्य के लिए दूर-दूर तक विख्यात थी [अर्रियन, V. 22,2] कहा जाता है कि रणक्षेत्र में उनके 17,000 लोग मारे गए थे और 70,000 बंदी बना लिए गए थे।

मालवों ने अलग से भी 50,000 सैनिकों की सेना लेकर एक नदी की घाटी की रक्षा की। अंबष्ठों की सेना में 60,000 पैदल, 6,000 घुड़सवार और 500 रथ थे। अकेले सिंधु घाटी के निचले भाग में होने वाले युद्धों में 80,000 सिपाही मारे गए।

इस इलाके में ब्राह्मणों ने अगुवाई की और प्रतिरोध की भावना तथा युद्ध के प्रति लोगों में अदम्य उत्साह पैदा किया और धर्म की रक्षा करते हुए हँसते-हँसते अपने प्राणों की आहुति दे दी। [चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल | [लेखक: राधाकुमुद मुखर्जी],[(प्लूटार्क, लाइव्स X; कैंब्रिज हिस्ट्री, I, पृष्ठ 378) ]

अन्य देशो में सिकंदर -

प्राचीन ईरानी अकेमेनिड साम्राज्य की राजधानी – पर्सेपोलिस – के खंडहरों को देखने जानेवाले हर सैलानी को तीन बातें बताई जाती हैं – कि इसे डेरियस महान ने बनाया था, कि इसे उसके बेटे ज़ेरक्सस ने और बढ़ाया, और कि इसे 'उस इंसान' सिकंदर ने तबाह कर दिया |

यदि कोई पश्चिमी इतिहास की किताबों को पढ़े तो उसे ये सोचने के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता कि ईरानी बने ही इसलिए थे कि सिकंदर आए और उनको जीत ले |
ईरानियों को इससे पहले भी यूनानियों ने दो बार हराया था, जब ईरानियों ने उनपर हमला करने की नाकाम कोशिश की, और इसलिए सिकंदर ने ईरान पर हमला बदला लेने के लिए किया था |
ईरानी दृष्टिकोण से देखें तो पाएँगे कि सिकंदर महानता से कोसों दूर था |

वहाँ दिखेगा कि सिकंदर ने पर्सेपोलिस को जमींदोज़ कर दिया, एक रात एक ग्रीक नर्तकी के प्रभाव में आकर जमकर शराब पीने के बाद, और ये दिखाने के लिए कि वो ऐसा ईरानी शासक ज़ेरक्सस से बदला लेने के लिए कर रहा है जिसने कि ग्रीस के शहर ऐक्रोपोलिस को जला दिया था|
उसने अपने साम्राज्य में सांस्कृतिक और धार्मिक स्थलों को नुक़सान पहुँचाने को बढ़ावा दिया, उसके समय में ईरानियों के प्राचीन सम्प्रदाय, पारसी सम्प्रदाय के मुख्य उपासना स्थलों पर हमले किए गए |

सिकंदर के हमले की कहानी बुनने में पश्चिमी देशों को ग्रीक भाषा और संस्कृति से मदद मिली जो ये कहती है कि सिकंदर का अभियान उन पश्चिमी अभियानों में पहला था जो पूरब के बर्बर समाज को सभ्य और सुसंस्कृत बनाने के लिए किए गए, मतलब की उनके अनुसार हम सभी असभ्य थे और हमें हत्या कर के वो सभ्य बनाना चाहता था |

प्रसिद्द इतिहासकार एर्रीयन लिखता हैं – जब बैक्ट्रिया के राजा बसूस को बंदी बनाकर लाया गया, तब सिकन्दर ने उनको कोड़े लगवाये और उनके नाक-कान कटवा डाले. इतने पर भी उसे संतोष ना हुआ. उसने अंत में उनकी हत्या करवा दी| उसने अपने पसंदीदा दार्शनिक अरस्तु के भतीजे कलास्थनीज को मारने में संकोच नहीं किया| एक बार किसी छोटी सी बात पर उसने अपने सबसे करीबी मित्र क्लाइटस को मार डाला था| अपने पिता के मित्र परमेनीयन जिनकी गोद में सिकंदर खेला था उसने उनको भी मरवा दिया| सिकंदर की सेना जहाँ भी जाती पूरे-के-पूरे नगर जला दिए जाते, सुन्दर महिलाओं का अपहरण कर लिया जाता |

इतिहास में सिकंदर के महान होने की कोई घटना या उसके देश में जनता के साथ उचित न्याय करने का प्रमाण नहीं है , सिकंदर के जीवन में शुरू से अंत तक कत्लेआम लूटपाट ही दिखाई देती है , सिकंदर के ऊपर कई किताबे लिखी गयी है और कुछ फिल्मे भी बनी है जिसमे उसे बहुत ही बहादुर , युद्धकुशल राजा के रूप में दिखाया गया है , पर सच्चाई यह है की उसने जिनसे युद्ध किया वो कमजोर थे इसीलिए हार गए , जिस संघ के बल पर सिकंदर ने अपने कुछ जमीन के टुकड़े जीते थे वो संघ सिकंदर के पिता फिलिप ने ग्रीक के कई राज्यों को हरा कर संघ का निर्माण किया था | उसने फारस को लगातार तीन युद्धों में हराया, इसका कारण ये नहीं सिकंदर महान और बलशाली था पर फारस का राज दरस एक कमजोर राजा था, उसके खुद के साम्राज्य में बड़े हिस्से में उसकी नहीं चलती थी। आगे के युद्ध में उसने फारस की सेना को गुलाम बना कर अपनी सेना में शामिल कर लिया और इसी तरह सिकंदर की सेना बड़ी होती गयी और वो युद्ध जीतता रहा , क़त्ल करता रहा , शहर के शहर जलाता रहा , धन दौलत लूट कर अपने देश भेजता रहा पर .... अतत: भारत से युद्ध करने पर उसे खुद के बहादुर होने की मिथ्या से छुटकारा मिला और अंत में सिकंदर अपनी सेना के साथ नावों से नदी के मार्ग से भागा।
जो राजा साम्राज्य के पीछे हो वो महान कैसे ? जिसे सिर्फ साम्राज्य जीतने की भूख हो , जनता को , देश की संस्कृति को , इतिहास को रौंदा कुचला हो वो राजा महान कैसे हो सकता है | वास्तव में सिकंदर जैसे लोग सभ्यता के शांत प्रवाह में महामारी के समान थे। उन्होंने ज्वालामुखी सरीखी हलचल मचाई सभ्यता के शांत प्रवाह में और फिर अपनी विनाश-लीला और क्रूरता की कहानी छोड़कर शून्य में विलीन हो गए। जहाँ भी पहुँचे वहाँ के लोगों को गुलाम बनाया। स्वतंत्रता-प्रेमी जनों से नृशंस बदला लिया। सिकंदर जैसे लोगों को इतिहास 'महान' का विशेषण लगाता है यह अत्यंत शर्मनाक है
 
एक विद्रोही

Saturday, September 21, 2013

Khwaja Muinuddin Chisti / Nizamuddin Auliya – The Real Face

                             

ajmer sharif













Khwaja Muinuddin Chisti and PrithviRaj Chauhan
Khwaja Muinuddin Chisti is regarded as foremost preacher of Sufism among Sufis of India. Akbar, the Mughal emperor believed that it was his blessings which lead him a son and the heir for the Mughal throne. This belief of Akbar started a trend among the people. They also started visiting to the mazar of Chisti thinking that the mazar will fulfill their ambitions by offering prayers. Since, then this have become as a tradition. Many people sings about the glory and miracles associated with the Chisti. But very few are aware of the reality. Among Hindus hardly anyone knows about the real relation between PrithviRaj Chauhan, the last Hindu ruler of our country and Khwaja Muinuddin Chisti.
Chisti came to India along with Islamic invader Muhammad Gori. He was advisory to Gori. It will be no exaggeration to state that Chisti was a spy to Muhammad Gori. What chisti would have advised can be easily imagined by the fanatic and radical hostility of Gori towards Hindus of this country.
Stories have mushroomed to prove that Khwaja as a mystic with high spiritual powers. But the truth is something else. The belief of Khwaja in Shariat and support to Muslim invader Muhammad Gori in establishment of Islamic rule in India clearly outlines his inclination towards Islam.
We will take few examples from his life which will expose Chisti intentions and real motives.
Chisti believed in conversion of Hindus to Islam
The fawaidu’l –fu’ad says that when Khwaja arrived in Delhi from Lahore seven hundred people (Hindus), besides hamidu’din – din dihlawi, embrace Islam (ref- page 117 vol. 1 a history of Sufism in India –Saiyid Athar Abbas Rizvi).
A critical review of miracles done by Chisti-
Khwaja Ajmer visit is mentioned as full of miracles (exaggerated stories). Since, Khwaja arrived in Ajmer lot of disputes occurred with PrithviRaj, then ruler of Kannauj with capital in Ajmer.
1. Reaching there he (Chisti) decided to sit under a tree. The camel keepers of PrithviRaj ordered him to leave away from that area as it belonged to the King and restricted area. The truth was that camels keeping area was PrithviRaj army area in which locals were not allowed. A story is imagined that the Khwaja in interfacing the servants of PrithviRaj wished that none of the camels would be able to stand on their legs and so happened. When none of the Camels were able to stand the news reached to the officials of Raj. His officials came to Chisti pleading for guilty. It was than only Khwaja made them well. Any laymen can easily even interpret this whole episode as a fairy tale. Another option is the camels were drugged with some herb which caused paralysis in them provided Chisti was smart enough for that act.
We will take another example which is far from Truth.
2. The Khwaja and his followers moved to a place near the Anasagar Lake. His servants killed a cow and cooked kebabs for him. Some members of the Khwaja’s party went to Anasagar and the others to Pansela Lake for ablutions. There were one thousand temples on the shores of two lakes. The Brahmans stopped the ablutions and the party complained to the Khwaja. He sent his servant to bring water for his ewer(Pot). As soon as the ewer touched the Pansela Lake, all the lakes, tanks and wells around became dry. Now, Khwaja went to the Anasagar lake temple and asked the name of the idol. He was told it was called Sawi Deva. The Khwaja asked whether the idol had talked to them. On receiving a negative reply he made the idol recite kalma and converted it into a human being, naming it Sa’di. This caused a sensation in the town. PrithviRaj ordered his Prime Minister Jaipal who was also a magician, to avert the evil influence of the Khwaja. Jaipal proceeded to fight the Khwaja with 700 magical dragons, 1500 magical discs and 700 disciples. The Khwaja drew a circle bringing his party within it under his protection and succeeded in killing all the dragons and disciples. Pithaura and Jaipal begged the Khwaja for forgiveness. The Khwaja prayer restored water to the lakes, tanks and wells. A large number of people accepted Islam. Pithaura refused to accept Islam and the Khwaja prophesied he would be handed over to the Islamic army.
(Ref- Ali asghar chisti- jawahir-I faridi , Lahore 1884, pp.155-160 )
The truth was that the area around the two lakes was decorated with many Temples and was considered sacred by the Hindus. Killing of cow again sacred for Hindus was considered as a heinous crime. It is still considered sacred even today. Everyone is aware that a cow eater is strictly forbidden to visit the shrines and temples among Hindus. The same rule was applicable for the visit of Khwaja to Anasagar lake temple. So, its natural for the Hindus to resist Chisti stay near Temples being a meat eater.
Regarding the fairy tale story of discs and dragons its easy to reach the conclusion that they are exaggerated and hyperbolic statements. They can amuse blind followers and disciples of Chisti. They do not even fulfill the criteria for proper analysis.
One doubt arrives in my mind that if Khwaja was so powerful then why Muhammad Gori was defeated in first war against PrithviRaj? Why didn’t the Khwaja changed his conquest into victory by his miracles? Why did Gori waited till the second war? That also when King Jaichand/Jaipal, the father in law of PrithviRaj helped Mohammad Gori against Prithviraj. It means that forces of Jaipal lead to victory in war and not the miracles of Chisti.
So, we easily reach this conclusion that the stories of miracles of chisti are myths and only myths. No wise person will believe in these falsified and exaggerated Myths.
PrithviRaj died as a hero fighting for his country after taking revenge of his loss. The famous incident is mentioned by Chand Bardai, the accompaniment poet of PrithviRaj.
I will also like to mention about Sheikh Nizamuddin-din Auliya in this article. He was disciple of Chisti. He mentions that when Khwaja Muinuddin reached Ajmer, India was ruled by Pithaura rai’s (Prithvi Raj Chauhan) and his capital was Ajmer. Pithaura and his high officials resented the sheik’s presence in their city, but the latter’s eminence and his apparent power to perform miracles, prompted them to refrain from taking action against him. A disciple of the Khwaja’s was in the service of Prithviraj Raj’s. After the disciple began o receive hostile treatment from the Rajs, the Khwaja sent a message to Pithaura in favor of the Muslim. Pithaura refused to accept the recommendation, thus indicating his resentment of, the khwaja’s alleged claims to understand the secrets of the unseen. When Khwaja mu’inu’d-din heard of this reply he prophesied: “We have seized Pithaura alive and handed him over to the army of Islam.” about the same time Sultan Muhammad Gori arrived from Ghazna, attacked the forces of Pithaura and defeated them. Pithaura was taken alive and thus the khwaja’s prophesy was fulfilled.
(Ref- Amir khwurd, siyaru’l – auliya, delhi,1885,pp.45-47)
The above reference is by a renowned Sufi mystic Nizamuddin Auliya whose shrine is situated in the periphery of Delhi. It not even exposes the real intentions of the Sufi’s but even proves that they were propagator of Islam. Those who considers that Sufism [reach universal brotherhood and humanity are heading in darkness.
Dr Vivek Arya

Thursday, September 19, 2013