Wednesday, September 30, 2015

समाज का मार्गदर्शन कौन करे?





समाज का मार्गदर्शन कौन करे?


एक रटे रटाये फिल्मी डॉयलाग बोलने वाला बॉलीवुड का फिल्मी हीरो!

एक कम से कम कपड़े पहन कर दर्शकों को रिझाने वाली फिल्मी नायिका!

एक अंग्रेजी में अश्लीलता भरा उपन्यास लिखकर पैसे कमाने वाला लेखक!

एक विदेशी अख़बार अथवा न्यूज़ चैनल में नौकरी कर पेट पालने वाला पत्रकार!

एक विदेशी चंदे के दम पर फलने फूलने वाले NGO छाप समाज सेवक!

एक क्रिकेट खेलने वाले और पेप्सी कोला का विज्ञापन करने वाला खिलाड़ी!

एक बाहुबल, जातिवाद एवं परिवारवाद के दम पर बनने वाला नेता!


क्या अपने आपको सभ्य कहने वाली ये जमात हमारे देशवासियों को धर्म और जीवन सिखाने के काबिल हैं?


उत्तर- नहीं


न इनके जीवन में धार्मिकता है? न सदाचार है? न शुद्ध आचरण और न ही शुद्ध विचार। न ज्ञान न ही पक्षपात रहित व्यवहार।


फिर क्यों ये लोग समाज को दिशा निर्देश देते हैं। इनके भ्रामक प्रचार के कारण युवाओं के अपरिपक्व मस्तिष्क सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।


वेद के मंत्र के अनुसार राजव्यवस्था चलाने के लिए तीन सभाओं का निर्माण करना चाहिए। राज आर्य सभा, विद्या आर्य सभा एवं धर्म आर्य सभा।


राज आर्य सभा राजा आदि से परिपूर्ण हो जिसका करना राज व्यवस्था को सम्भालना हो। राजा संयमी, विद्वान, धार्मिक, बलशाली, पक्षपात रहित, किसी भी प्रकार के नशे आदि दोषों से रहित एवं जनकल्याण करने वाला हो। वर्तमान में लोक सभा राज आर्य सभा का प्रारूप है। मगर उसके सभी सदस्य ऐसे आचरण वान नहीं हैं।


विद्या आर्य सभा विद्वत लोगों की सभा हो जिसका उद्देश्य विभिन्न क्षेत्रों में राज आर्य सभा को दिशा निर्देश एवं सहयोग देना हो। इस सभा हर सदस्य अपने अपने क्षेत्र का अधिकारी विद्वान हो। वर्तमान में राज्य सभा विद्या आर्य सभा का प्रारूप है। मगर उसके सभी सदस्य न तो विद्वान है, न ही आचरणवान हैं।


धर्म आर्य सभा धर्माचार्य लोगों की सभा हो जिसका उद्देश्य राज आर्य सभा, विद्या आर्य सभा दोनों का मार्गदर्शन करना हो। इस सभा का हर सदस्य धर्मचारी, सदाचारी एवं ईश्वरभक्त हो। वर्तमान में यह सभा अस्तित्व में ही नहीं हैं। मत-मतान्तर के गुरु, मठाधीश आदि सभी देश, धर्म और जाति से ज्यादा भोग और आराम में लीन हैं।


वैदिक विचारधारा का पालन करने वाला, धर्मात्मा,सदाचारी, विद्वान व्यक्तित्व ही हमारा मार्गदर्शन करने वाला हो सकता हैं।


डॉ विवेक आर्य

ईसाई मत की मान्यताएँ: तर्क की कसौटी पर



ईसाई मत की मान्यताएँ: तर्क की कसौटी पर

ऊपर से देखने पर ईसाई मत एक सभ्य,सुशिक्षित,शांतिप्रिय समाज लगता हैं। जिसका उद्देश्य ईसा मसीह की शिक्षाओं का प्रचार प्रसार एवं निर्धनों, दीनों की सेवा-सहायता करना हैं। इस मान्यता का कारण ईसाई समाज द्वारा बनाई गई छवि है। यह कटु सत्य है कि ईसाई मिशनरी विश्व के जिस किसी देश में गए। उस देश के निवासियों के मूल धर्म में सदा खामियों को प्रचारित करना एवं अपने मत को बड़ा चढ़ाकर पेश करना ईसाईयों की सुनियोजित नीति रही हैं। इस नीति के बल पर वे अपने आपको श्रेष्ठ एवं सभ्य तथा दूसरों को निकृष्ट एवं असभ्य सिद्ध करते रहे हैं। इस लेख के माध्यम से हम ईसाई मत की तीन सबसे प्रसिद्द मान्यताओं की समीक्षा करेंगे जिससे पाठकों के भ्रम का निवारण हो जाये।



1. प्रार्थना से चंगाई

2. पापों का क्षमा होना

3. गैर ईसाईयों को ईसाई मत में धर्मान्तरित करना



1. प्रार्थना से चंगाई[i]



ईसाई समाज में ईसा मसीह अथवा चर्च द्वारा घोषित किसी भी संत की प्रार्थना करने से बिमारियों का ठीक होने की मान्यता पर अत्यधिक बल दिया जाता हैं। आप किसी भी ईसाई पत्रिका, किसी भी गिरिजाघर की दीवारों आदि में जाकर ऐसे विवरण (Testimonials) देख सकते हैं। आपको दिखाया जायेगा की एक गरीब आदमी था। जो वर्षों से किसी लाईलाज बीमारी से पीड़ित था। बहुत उपचार करवाया मगर बीमारी ठीक नहीं हुई। अंत में प्रभु ईशु अथवा मरियम अथवा किसी ईसाई संत की प्रार्थना से चमत्कार हुआ। और उसकी यह बीमारी सदा सदा के लिए ठीक हो गई। सबसे अधिक निर्धनों और गैर ईसाईयों को प्रार्थना से चंगा होता दिखाया जाता हैं। यह चमत्कार की दुकान सदा चलती रहे इसलिए समय समय पर अनेक ईसाईयों को मृत्यु उपरांत संत घोषित किया जाता हैं। हाल ही में भारत से मदर टेरेसा और सिस्टर अलफोंसो को संत घोषित किया गया हैं और विदेश में दिवंगत पोप जॉन पॉल को संत घोषित किया गया है। यह संत बनाने की प्रक्रिया भी सुनियोजीत होती हैं। पहले किसी गरीब व्यक्ति का चयन किया जाता हैं जिसके पास इलाज करवाने के लिए पैसे नहीं होते।



प्रार्थना से चंगाई में विश्वास रखने वाली मदर टेरेसा खुद विदेश जाकर तीन बार आँखों एवं दिल की शल्य चिकित्सा करवा चुकी थी[ii]। संभवत हिन्दुओं को प्रार्थना का सन्देश देने वाली मदर टेरेसा को क्या उनको प्रभु ईसा मसीह अथवा अन्य ईसाई संतो की प्रार्थना द्वारा चंगा होने का विश्वास नहीं था जो वे शल्य चिकित्सा करवाने विदेश जाती थी?

सिस्टर अलफोंसो केरल की रहने वाली थी। अपनीअपने जीवन के तीन दशकों में से करीब 20 वर्ष तक अनेक रोगों से ग्रस्त रही थी[iii]। केरल एवं दक्षिण भारत में निर्धन हिन्दुओं को ईसाई बनाने की प्रक्रिया को गति देने के लिए संभवत उन्हें भी संत का दर्जा दे दिया गया और यह प्रचारित कर दिया गया की उनकी प्रार्थना से भी चंगाई हो जाती हैं।

दिवंगत पोप जॉन पॉल स्वयं पार्किन्सन रोग से पीड़ित थे और चलने फिरने से भी असमर्थ थे। यहाँ तक की उन्होंने अपना पद अपनी बीमारी के चलते छोड़ा था[iv]। कोस्टा रिका की एक महिला के मस्तिष्क की व्याधि जिसका ईलाज करने से चिकित्सकों ने मना कर दिया था। वह पोप जॉन पॉल के चमत्कार से ठीक हो गई। इस चमत्कार के चलते उन्हें भी चर्च द्वारा संत का दर्ज दिया गया हैं।

पाठक देखेगे की तीनों के मध्य एक समानता थी। जीवन भर ये तीनों अनेक बिमारियों से पीड़ित रहे थे। मरने के बाद अन्यों की बीमारियां ठीक करने का चमत्कार करने लगे। अपने मंच से कैंसर, एड्स जैसे रोगों को ठीक करने का दावा करने वाले बैनी हिन्न (Benny Hinn) नामक प्रसिद्द ईसाई प्रचारक हाल ही में अपने दिल की बीमारी के चलते ईलाज के लिए अस्पताल में भर्ती हुए थे[v]। वह atrial fibrillation नामक दिल के रोग से पिछले 20 वर्षों से पीड़ित है। तर्क और विज्ञान की कसौटी पर प्रार्थना से चंगाई का कोई अस्तित्व नहीं हैं। अपने आपको आधुनिक एवं सभ्य दिखाने वाला ईसाई समाज प्रार्थना से चंगाई जैसी रूढ़िवादी एवं अवैज्ञानिक सोच में विश्वास रखता हैं। यह केवल मात्र अंधविश्वास नहीं अपितु एक षड़यंत्र है। गरीब गैर ईसाईयों को प्रभावित कर उनका धर्म परिवर्तन करने की सुनियोजित साजिश हैं।



2. पापों का क्षमा होना



ईसाई मत की दूसरी सबसे प्रसिद्द मान्यता है पापों का क्षमा होना। इस मान्यता के अनुसार कोई भी व्यक्ति कितना भी बड़ा पापी हो। उसने जीवन में कितने भी पाप किये हो। अगर वो प्रभु ईशु मसीह की शरण में आता है तो ईशु उसके सम्पूर्ण पापों को क्षमा कर देते है। यह मान्यता व्यवहारिकता,तर्क और सत्यता की कसौटी पर खरी नहीं उतरती। व्यवहारिक रूप से आप देखेगे कि संसार में सभी ईसाई देशों में किसी भी अपराध के लिए दंड व्यवस्था का प्रावधान हैं। क्यों? कोई ईसाई मत में विश्वास रखने वाला अपराधी अपराध करे तो उसे चर्च ले जाकर उसके पाप स्वीकार (confess) करवा दिए जाये। स्वीकार करने पर उसे छोड़ दिया जाये। इसका क्या परिणाम निकलेगा? अगले दिन वही अपराधी और बड़ा अपराध करेगा क्यूंकि उसे मालूम है कि उसके सभी पाप क्षमा हो जायेगे। अगर समाज में पापों को इस प्रकार से क्षमा करने लग जाये तो उसका अंतिम परिणाम क्या होगा? जरा विचार करे।



महर्षि दयानन्द ने सत्यार्थ प्रकाश[vi] में ईश्वर द्वारा अपने भक्तों के पाप क्षमा होने पर ज्ञानवर्धक एवं तर्कपूर्ण उत्तर दिया हैं। स्वामी जी लिखते है। - "नहीं, ईश्वर किसी के पाप क्षमा नहीं करता। क्योंकि जो ईश्वर पाप क्षमा करे तो उस का न्याय नष्ट हो जाये और सब मनुष्य महापापी हो जायें। इसलिए कि क्षमा की बात सुन कर ही पाप करने वालों को पाप करने में निभर्यता और उत्साह हो जाये। जैसे राजा यदि अपराधियों के अपराध को क्षमा कर दे तो वे उत्साहपूर्वक अधिक अधिक बड़े-बड़े पाप करें। क्योंकि राजा अपना अपराध क्षमा कर देगा और उन को भी भरोसा हो जायेगा कि राजा से हम हाथ जोड़ने आदि चेष्टा कर अपने अपराध छुड़ा लेंगे और जो अपराध नहीं करते, वे भी अपराध करने में न डर कर पाप करने में प्रवृत्त हो जायेंगे। इसलिए सब कर्मों का फल यथावत् देना ही ईश्वर का काम है, क्षमा करना नहीं"।

वैदिक विचारधारा में ईश्वर को न्यायकारी एवं दयालु बताया गया हैं। परमेश्वर न्यायकारी है,क्यूंकि ईश्वर जीव के कर्मों के अनुपात से ही उनका फल देता है कम या ज्यादा नहीं। परमेश्वर दयालु है, क्यूंकि कर्मों का फल देने की व्यवस्था इस प्रकार की है जिससे जीव का हित हो सके। शुभ कर्मों का अच्छा फल देने में भी जीव का कल्याण है और अशुभ कर्मों का दंड देने में भी जीव का ही कल्याण है। दया का अर्थ है जीव का हित चिंतन और न्याय का अर्थ है, उस हितचिंतन की ऐसी व्यवस्था करना कि उसमें तनिक भी न्यूनता या अधिकता न हो।

ईसाई मत में प्रचलित पापों को क्षमा करना ईश्वर के न्यायप्रियता और दयालुता गुण के विपरीत हैं। अव्यवहारिक एवं असंगत होने के कारण अन्धविश्वास मात्र हैं।

3. गैर ईसाईयों को ईसाई मत में धर्मान्तरित करना

ईसाई मत को मानने वालो में गैर ईसाईयों को ईसाई मत में धर्मान्तरित कर शामिल करने की सदा चेष्टा बनी रहती हैं। उन्हें देखकर ऐसा लगता हैं कि जैसे वही ईसाई सच्चा ईसाई तभी माना जायेगा जो गैर ईसाईयों को ईसाई नहीं बना लेगा। ऐसा प्रतीत होता है कि ईसाईयों में आचरण और पवित्र व्यवहार से अधिक धर्मान्तरण महत्वपूर्ण हो चला हैं। धर्मांतरण के लिए ईसाई समाज हिंसा करने से भी भी पीछे नहीं हटता। अपनी बात को मैं उदहारण देकर सिद्ध करना चाहता हूँ। ईसाई प्रभुत्व वाले पूर्वोत्तर के राज्य मिजोरम से वैष्णव हिन्दू रीति को मानने वाली रियांग जनजाति को धर्मान्तरण कर ईसाई न बनने पर चर्च द्वारा समर्थित असामाजिक लोगों ने हिंसा द्वारा राज्य से निकाल दिया[vii]। हिंसा के चलते रियांग लोग दूसरे राज्यों में शरणार्थी के रूप में रहने को बाधित हैं। सरकार द्वारा बनाई गई नियोगी कमेटी के ईसाईयों द्वारा धर्मांतरण के लिए अपनाये गए प्रावधानों को पढ़कर धर्मान्तरण के इस कुचक्र का पता चलता हैं[viii]। चर्च समर्थित धर्मान्तरण एक ऐसा कार्य हैं जिससे देश की अखंडता और एकता को बाधा पहुँचती हैं।

इसीलिए हमारे देश के संभवत शायद ही कोई चिंतक ऐसे हुए हो जिन्होंने प्रलोभन द्वारा धर्मान्तरण करने की निंदा न की हो। महान चिंतक एवं समाज सुधारक स्वामी दयानंद का एक ईसाई पादरी से शास्त्रार्थ हो रहा था। स्वामी जी ने पादरी से कहा की हिन्दुओं का धर्मांतरण करने के तीन तरीके है। पहला जैसा मुसलमानों के राज में गर्दन पर तलवार रखकर जोर जबरदस्ती से बनाया जाता था। दूसरा बाढ़, भूकम्प, प्लेग आदि प्राकृतिक आपदा जिसमें हज़ारों लोग निराश्रित होकर ईसाईयों द्वारा संचालित अनाथाश्रम एवं विधवाश्रम आदि में लोभ-प्रलोभन के चलते भर्ती हो जाते थे और इस कारण से आप लोग प्राकृतिक आपदाओं के देश पर बार बार आने की अपने ईश्वर से प्रार्थना करते है और तीसरा बाइबिल की शिक्षाओं के जोर शोर से प्रचार-प्रसार करके। मेरे विचार से इन तीनों में सबसे उचित अंतिम तरीका मानता हूँ। स्वामी दयानंद की स्पष्टवादिता सुनकर पादरी के मुख से कोई शब्द न निकला। स्वामी जी ने कुछ ही पंक्तियों में धर्मान्तरण के पीछे की विकृत मानसिकता को उजागर कर दिया[ix]



राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ईसाई धर्मान्तरण के सबसे बड़े आलोचको में से एक थे। अपनी आत्मकथा में महात्मा गांधी लिखते है "उन दिनों ईसाई मिशनरी हाई स्कूल के पास नुक्कड़ पर खड़े हो हिन्दुओं तथा देवी देवताओं पर गलियां उड़ेलते हुए अपने मत का प्रचार करते थे। यह भी सुना है की एक नया कन्वर्ट (मतांतरित) अपने पूर्वजों के धर्म को, उनके रहन-सहन को तथा उनके गलियां देने लगता है। इन सबसे मुझमें ईसाइयत के प्रति नापसंदगी पैदा हो गई।" इतना ही नहीं गांधी जी से मई, 1935 में एक ईसाई मिशनरी नर्स ने पूछा कि क्या आप मिशनरियों के भारत आगमन पर रोक लगाना चाहते है तो जवाब में गांधी जी ने कहा था,' अगर सत्ता मेरे हाथ में हो और मैं कानून बना सकूं तो मैं मतांतरण का यह सारा धंधा ही बंद करा दूँ। मिशनरियों के प्रवेश से उन हिन्दू परिवारों में जहाँ मिशनरी पैठे है, वेशभूषा, रीतिरिवाज एवं खानपान तक में अंतर आ गया है[x]



समाज सुधारक एवं देशभक्त लाला लाजपत राय द्वारा प्राकृतिक आपदाओं में अनाथ बच्चों एवं विधवा स्त्रियों को मिशनरी द्वारा धर्मान्तरित करने का पुरजोर विरोध किया गया जिसके कारण यह मामला अदालत तक पहुंच गया। ईसाई मिशनरी द्वारा किये गए कोर्ट केस में लाला जी की विजय हुई एवं एक आयोग के माध्यम से लाला जी ने यह प्रस्ताव पास करवाया की जब तक कोई भी स्थानीय संस्था निराश्रितों को आश्रय देने से मना न कर दे तब तक ईसाई मिशनरी उन्हें अपना नहीं सकती[xi]

समाज सुधारक डॉ अम्बेडकर को ईसाई समाज द्वारा अनेक प्रलोभन ईसाई मत अपनाने के लिए दिए गए मगर यह जमीनी हकीकत से परिचित थे की ईसाई मत ग्रहण कर लेने से भी दलित समाज अपने मुलभुत अधिकारों से वंचित ही रहेगा। डॉ आंबेडकर का चिंतन कितना व्यवहारिक था यह आज देखने को मिलता है।''जनवरी 1988 में अपनी वार्षिक बैठक में तमिलनाडु के बिशपों ने इस बात पर ध्यान दिया कि धर्मांतरण के बाद भी अनुसूचित जाति के ईसाई परंपरागत अछूत प्रथा से उत्पन्न सामाजिक व शैक्षिक और आर्थिक अति पिछड़ेपन का शिकार बने हुए हैं। फरवरी 1988 में जारी एक भावपूर्ण पत्र में तमिलनाडु के कैथलिक बिशपों ने स्वीकार किया 'जातिगत विभेद और उनके परिणामस्वरूप होने वाला अन्याय और हिंसा ईसाई सामाजिक जीवन और व्यवहार में अब भी जारी है। हम इस स्थिति को जानते हैं और गहरी पीड़ा के साथ इसे स्वीकार करते हैं।' भारतीय चर्च अब यह स्वीकार करता है कि एक करोड़ 90 लाख भारतीय ईसाइयों का लगभग 60 प्रतिशत भाग भेदभावपूर्ण व्यवहार का शिकार है। उसके साथ दूसरे दर्जे के ईसाई जैसा अथवा उससे भी बुरा व्यवहार किया जाता है। दक्षिण में अनुसूचित जातियों से ईसाई बनने वालों को अपनी बस्तियों तथा गिरिजाघर दोनों जगह अलग रखा जाता है। उनकी 'चेरी' या बस्ती मुख्य बस्ती से कुछ दूरी पर होती है और दूसरों को उपलब्ध नागरिक सुविधओं से वंचित रखी जाती है। चर्च में उन्हें दाहिनी ओर अलग कर दिया जाता है। उपासना (सर्विस) के समय उन्हें पवित्र पाठ पढऩे की अथवा पादरी की सहायता करने की अनुमति नहीं होती। बपतिस्मा, दृढि़करण अथवा विवाह संस्कार के समय उनकी बारी सबसे बाद में आती है। नीची जातियों से ईसाई बनने वालों के विवाह और अंतिम संस्कार के जुलूस मुख्य बस्ती के मार्गों से नहीं गुजर सकते। अनुसूचित जातियों से ईसाई बनने वालों के कब्रिस्तान अलग हैं। उनके मृतकों के लिए गिरजाघर की घंटियां नहीं बजतीं, न ही अंतिम प्रार्थना के लिए पादरी मृतक के घर जाता है। अंतिम संस्कार के लिए शव को गिरजाघर के भीतर नहीं ले जाया जा सकता। स्पष्ट है कि 'उच्च जाति' और 'निम्न जाति' के ईसाइयों के बीच अंतर्विवाह नहीं होते और अंतर्भोज भी नगण्य हैं। उनके बीच झड़पें आम हैं। नीची जाति के ईसाई अपनी स्थिति सुधारने के लिए संघर्ष छेड़ रहे हैं, गिरजाघर अनुकूल प्रतिक्रिया भी कर रहा है लेकिन अब तक कोई सार्थक बदलाव नहीं आया है। ऊंची जाति के ईसाइयों में भी जातिगत मूल याद किए जाते हैं और प्रछन्न रूप से ही सही लेकिन सामाजिक संबंधोंं में उनका रंग दिखाई देता है[xii]
           महान विचारक वीर सावरकर धर्मान्तरण को राष्ट्रान्तरण मानते थे। आप कहते थे "यदि कोई व्यक्ति धर्मान्तरण करके ईसाई या मुसलमान बन जाता है तो फिर उसकी आस्था भारत में न रहकर उस देश के तीर्थ स्थलों में हो जाती है जहाँ के धर्म में वह आस्था रखता है, इसलिए धर्मान्तरण यानी राष्ट्रान्तरण है।
इस प्रकार से प्राय: सभी देशभक्त नेता ईसाई धर्मान्तरण के विरोधी रहे है एवं उसे राष्ट्र एवं समाज के लिए हानिकारक मानते है।



[i] Read Congregation for the doctrine of the faith: Instruction on prayers for healing published from Vatican
[ii] Ref. The final Verdict by Aroup Chatterjee
[iii] Popular Christianity in India: Riting between the Lines edited by Selva J. Raj, Corinne G. Dempsey.Page 129
[iv] Vatican hid Pope's Parkinson's disease diagnosis for 12 years: News published in The telegraph, Rome on 19 Mar 2006
[v] Pulliam Bailey, Sarah (25 March 2015). "Televangelist Benny Hinn has been admitted to the hospital for heart trouble" The Washington Post.
[vi] सप्तम समुल्लास
[vii] Religious cleansing of Hindus,Dr. Koenraad ELST, speaking in The Hague, 7 Feb. 2004, at the Agni conference on the persecution of Hindus in various countries.
[viii] The Niyogi committee gave the following recommendations:[2]
 (1) those missionaries whose primary object is proselytisation should be asked to withdraw and the large influx of foreign missionaries should be checked;
 (2) the use of medical and other professional services as a direct means of making conversions should be prohibited by law;
 (3) attempts to convert by force or fraud or material inducements, or by taking advantage of a person’s inexperience or confidence or spiritual weakness or thoughtlessness, or by penetrating into the religious conscience of persons for the purpose of consciously altering their faith, should be absolutely prohibited;
 (4) the Constitution of India should be amended in order to rule out propagation by foreigners and conversions by force, fraud and other illicit means;
 (5) legislative measures should be enacted for controlling conversion by illegal means;
 (6) rules relating to registration of doctors, nurses and other personnel employed in hospitals should be suitably amended to provide a condition against evangelistic activities during professional service; and
 (7) Circulation of literature meant for religious propaganda without approval of the State Government should be prohibited.  
 [Vindicated by Time: The Niyogi Committee Report](edited by Sita Ram Goel, 1998)
[ix] Biography of Swami Dayanand
[x] M.K. Gandhi, Christian Missions, Ahmedabad, 1941 and Collected Works
[xi] Socio-Religious Reform Movements in British India by K W Jones
[xii] Caste based Discrimination inside church is common practice. Read news published as title “SC Christians Allege Caste Discrimination” in The New Indian Express dated Wednesday, September 30, 2015.

Tuesday, September 29, 2015

मदर टेरेसा: क्या वो संत थी?







मदर टेरेसा: क्या वो संत थी?



मदर टेरेसा! यह नाम सुनते ही किसी के भी मस्तिष्क में एक नीले बॉर्डर वाली, सर तक ढकी हुई, सफ़ेद साड़ी पहनी हुई, वृद्ध महिला का झुरियों भरा चेहरा उभरता है, जिसने मानवता की सच्ची सेवा के लिए अपना मूल देश त्याग दिया। जो गरीबों की हमदर्द बनकर उभरी और जिसने हज़ारों अनाथों, दीनों और निराश्रयों को सहारा दिया। जिसे उसकी सेवा के लिए विश्व शांति का नोबल पुरस्कार मिला था। मदर टेरेसा के विषय आपको यह सब मालूम है क्यूंकि आपको यही बताया गया हैं। परन्तु इस सिक्के के दूसरे पहलु से आप अभी अनभिज्ञ है। उसी से अवगत करवाना इस लेख का मुख्य उद्देश्य है।

सत्य अगर कड़वा भी हो तो भी वह सत्य ही कहलाता है। भारत में कार्य करने वाली ईसाई संस्थाओं का एक चेहरा अगर सेवा है तो दूसरा असली चेहरा प्रलोभन, लोभ, लालच, भय और दबाव से धर्मान्तरण भी करना हैं। इससे तो यही प्रतीत होता है की जो भी सेवा कार्य मिशनरी द्वारा किया जा रहा है उसका मूल उद्देश्य ईसा मसीह के लिए भेड़ों की संख्या बढ़ाना है। संत वही होता है जो पक्षपात रहित एवं जिसका उद्देश्य मानवता की भलाई है। ईसाई मिशनरीयों का पक्षपात इसी से समझ में आता है की वह केवल उन्हीं गरीबों की सेवा करना चाहती है, जो ईसाई मत को ग्रहण कर ले।



मदर टेरेसा का जन्म 26 अगस्त 1910 को स्कोप्जे, मेसेडोनिया[i] में हुआ था और बारह वर्ष की आयु में उन्हें अहसास हुआ कि “उन्हें ईश्वर बुला रहा है”। 24 मई 1931 को वे कलकत्ता आई और यही की होकर रह गई। कोलकाता आने पर धन की उगाही करने के लिए मदर टेरेसा ने अपनी मार्केटिंग आरम्भ करी। उन्होंने कोलकाता को गरीबों का शहर के रूप में चर्चित कर और खुद को उनकी सेवा करने वाली के रूप में चर्चित कर अंतराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त करी। वे कुछ ही वर्षों में "दया की मूर्ति", "मानवता की सेविका", "बेसहारा और गरीबों की मसीहा", “लार्जर दैन लाईफ़” वाली छवि से प्रसिद्द हो गई। हालाँकि उन पर हमेशा वेटिकन की मदद और मिशनरीज ऑफ़ चैरिटी की मदद से “धर्म परिवर्तन” का आरोप तो लगता रहा । गौरतलब तथ्य यह है कि इनमें से अधिकतर आरोप पश्चिम की प्रेस[ii] या ईसाई पत्रकारों आदि ने ही किये थे[iii][iv]। ना कि किसी हिन्दू संगठन ने, जिससे संदेह और भी गहरा हो जाता है[v]। अपने देश के गरीब ईसाईयों की सेवा करने के स्थान पर मदर टेरेसा को भारत के गरीब गैर ईसाईयों के उत्थान में अधिक रूचि होना क्या ईशारा करता है? पाठक स्वयं निर्णय कर सकते है।



मदर टेरेसा को समूचे विश्व से, कई ज्ञात और अज्ञात स्रोतों से बड़ी-बड़ी धनराशियाँ दान के तौर पर मिलती थी। सबसे बड़ी बात यह थी की मदर ने कभी इस विषय में सोचने का कष्ट नहीं किया की उनके धनदाता की आय का स्रोत्र एवं प्रतिष्ठा कैसी थी। उदहारण के लिए अमेरिका के एक बड़े प्रकाशक रॉबर्ट मैक्सवैल, जिन्होंने कर्मचारियों की भविष्यनिधि फ़ण्ड्स में 450 मिलियन पाउंड का घोटाला किया[vi]। उसने मदर टेरेसा को 1.25 मिलियन डालर का चन्दा दिया। मदर टेरेसा मैक्सवैल की पृष्ठभूमि को जानती थी। हैती के तानाशाह जीन क्लाऊड डुवालिये ने मदर टेरेसा को सम्मानित करने बुलाया। मदर टेरेसा कोलकाता से हैती सम्मान लेने गई। जिस व्यक्ति ने हैती का भविष्य बिगाड़ कर रख दिया। गरीबों पर जमकर अत्याचार किये और देश को लूटा। टेरेसा ने उसकी “गरीबों को प्यार करने वाला” कहकर तारीफ़ों के पुल बांधे थे। मदर टेरेसा को चार्ल्स कीटिंग से 1.25 मिलियन डालर का चन्दा मिला था। ये कीटिंग महाशय वही हैं जिन्होंने “कीटिंग सेविंग्स एन्ड लोन्स” नामक कम्पनी 1980 में बनाई थी और आम जनता और मध्यमवर्ग को लाखों डालर का चूना लगाने के बाद उसे जेल हुई थी[vii]। अदालत में सुनवाई के दौरान मदर टेरेसा ने जज से कीटिंग को माफ़ करने की अपील की थी। उस वक्त जज ने उनसे कहा कि जो पैसा कीटिंग ने गबन किया है क्या वे उसे जनता को लौटा सकती हैं? ताकि निम्न-मध्यमवर्ग के हजारों लोगों को कुछ राहत मिल सके, लेकिन तब वे चुप्पी साध गई।

यह दान किस स्तर तक था इसे जानने के लिए यह पढ़िए। मदर टेरेसा की मृत्यु के समय सुसान शील्ड्स को न्यूयॉर्क बैंक में पचास मिलियन डालर की रकम जमा मिली। सुसान शील्ड्स वही हैं जिन्होंने मदर टेरेसा के साथ सहायक के रूप में नौ साल तक काम किया। सुसान ही चैरिटी में आये हुए दान और चेकों का हिसाब-किताब रखती थी। जो लाखों रुपया गरीबों और दीन-हीनों की सेवा में लगाया जाना था। वह न्यूयॉर्क के बैंक में यूँ ही फ़ालतू पड़ा था[viii]?



दान से मिलने वाले पैसे का प्रयोग सेवा कार्य में शायद ही होता होगा इसे कोलकाता में रहने वाले अरूप चटर्जी ने अपनी पुस्तक "द फाइनल वर्डिक्ट" पढ़िए[ix]। लेखक लिखते हैं ब्रिटेन की प्रसिद्ध मेडिकल पत्रिका Lancet के सम्पादक डॉ.रॉबिन फ़ॉक्स ने 1991 में एक बार मदर के कलकत्ता स्थित चैरिटी अस्पतालों का दौरा किया था। उन्होंने पाया कि बच्चों के लिये साधारण “अनल्जेसिक दवाईयाँ” तक वहाँ उपलब्ध नहीं थी और न ही “स्टर्लाइज्ड सिरिंज” का उपयोग हो रहा था। जब इस बारे में मदर से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि “ये बच्चे सिर्फ़ मेरी प्रार्थना से ही ठीक हो जायेंगे"। मिशनरी में भर्ती हुए आश्रितों की हालत भी इतने धन मिलने के उपरांत भी उनकी स्थिति कोई बेहतर नहीं थी। मिशनरी की नन दूसरो के लिए दवा से अधिक प्रार्थना में विश्वास रखती थी। जबकि खुद कोलकाता के महंगे से महंगे अस्पताल में कराती थी। मिशनरी की एम्बुलेंस मरीजों से अधिक नन आदि को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने का कार्य करती थी। यही कारण था की मदर टेरेसा की मृत्यु के समय कोलकाता निवासी उनकी शवयात्रा में न के बराबर शामिल हुए थे।



मदर टेरेसा अपने रूढ़िवादी विचारों के लिए सदा चर्चित रही। बांग्लादेश युद्ध के दौरान लगभग साढ़े चार लाख महिलायें बेघर हुई और भागकर कोलकाता आईं। उनमें से अधिकतर के साथ बलात्कार हुआ था जिसके कारण वह गर्भवती थी। मदर टेरेसा ने उन महिलाओं के गर्भपात का विरोध किया और कहा था कि “गर्भपात कैथोलिक परम्पराओं के विरुद्ध है और इन औरतों की प्रेग्नेन्सी एक “पवित्र आशीर्वाद” है। मदर टेरेसा की इस कारण जमकर आलोचना हुई थी[x]

मदर टेरेसा ने इन्दिरा गाँधी की आपातकाल लगाने के लिये तारीफ़ की थी और कहा कि “आपातकाल लगाने से लोग खुश हो गये हैं और बेरोजगारी की समस्या हल हो गई है”[xi]। गाँधी परिवार ने उन्हें इस बड़ाई के लिए “भारत रत्न” का सम्मान देकर उनका “ऋण” उतारा। भोपाल गैस त्रासदी भारत की सबसे बड़ी औद्योगिक दुर्घटना है, जिसमें सरकारी तौर पर 4000 से अधिक लोग मारे गये और लाखों लोग अन्य बीमारियों से प्रभावित हुए। उस वक्त मदर टेरेसा ताबड़तोड़ कलकत्ता से भोपाल आईं, किसलिये? क्या प्रभावितों की मदद करने? जी नहीं, बल्कि यह अनुरोध करने कि यूनियन कार्बाईड के मैनेजमेंट को माफ़ कर दिया जाना चाहिये[xii]। और अन्ततः वही हुआ भी, वारेन एंडरसन ने अपनी बाकी की जिन्दगी अमेरिका में आराम से बिताई। भारत सरकार हमेशा की तरह किसी को सजा दिलवा पाना तो दूर, ठीक से मुकदमा तक नहीं कायम कर पाई।



अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त पत्रकार क्रिस्टोफ़र हिचेन्स ने 1994 में एक डॉक्यूमेंट्री बनाई थी, जिसमें मदर टेरेसा के सभी क्रियाकलापों पर विस्तार से रोशनी डाली गई थी। बाद में यह फ़िल्म ब्रिटेन के चैनल-फ़ोर पर प्रदर्शित हुई और इसने काफ़ी लोकप्रियता अर्जित की। बाद में अपने कोलकाता प्रवास के अनुभव पर उन्होंने एक किताब भी लिखी “हैल्स एन्जेल” (नर्क की परी)। इसमें उन्होंने कहा है कि “कैथोलिक समुदाय विश्व का सबसे ताकतवर समुदाय है। जिन्हें पोप नियंत्रित करते हैं, चैरिटी चलाना, मिशनरियाँ चलाना, धर्म परिवर्तन आदि इनके मुख्य काम है। जाहिर है कि मदर टेरेसा को टेम्पलटन सम्मान, नोबल सम्मान, मानद अमेरिकी नागरिकता जैसे कई सम्मान इसी कारण से मिले[xiii]

ईसाईयों के लिए यही मदर टेरेसा दिल्ली में 1994 में दलित ईसाईयों के आरक्षण की हिमायत करने के लिए धरने पर बैठी थी। तब तत्कालीन मंत्री सुषमा स्वराज ने उनसें पूछा था की क्या मदर दलित ईसाई जैसे उद्बोधनों के रूप में चर्च में जातिवाद का प्रवेश करवाना चाहती है[xiv]। महाराष्ट्र में 1947 में देश आज़ाद होते समय अनेक मिशन के चर्चों को आर्यसमाज ने खरीद लिया क्यूंकि उनका सञ्चालन करने वाले ईसाई इंग्लैंड लौट गए थे। कुछ दशकों के पश्चात ईसाईयों ने उस संपत्ति को दोबारा से आर्यसमाज से ख़रीदने का दबाव बनाया। आर्यसमाज के अधिकारीयों द्वारा मना करने पर मदर टेरेसा द्वारा आर्यसमाज के पदाधिकारियों को देख लेने की धमकी दी गई थी। कमाल की संत? थी[xv]

मदर टेरेसा जब कभी बीमार हुईं तो उन्हें बेहतरीन से बेहतरीन कार्पोरेट अस्पताल में भर्ती किया गया। उन्हें हमेशा महंगा से महंगा इलाज उपलब्ध करवाया गया। यही उपचार यदि वे अनाथ और गरीब बच्चों (जिनके नाम पर उन्हें लाखों डालर का चन्दा मिलता रहा) को भी दिलवाती तो कोई बात होती, लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ। एक बार कैंसर से कराहते एक मरीज से उन्होंने कहा कि “तुम्हारा दर्द ठीक वैसा ही है जैसा ईसा मसीह को सूली पर हुआ था, शायद महान मसीह तुम्हें चूम रहे हैं। तब मरीज ने कहा कि “प्रार्थना कीजिये कि जल्दी से ईसा मुझे चूमना बन्द करे”।



मदर टेरेसा की मृत्यु के पश्चात भी चंदा उगाही का कार्य चलता रहे और धर्मान्तरण करने में सहायता मिले इसके लिए एक नया ड्रामा रचा गया। पोप जॉन पॉल को मदर को “सन्त” घोषित करने में जल्दबाजी की गई। सामान्य रूप से संत घोषित करने के लिये जो पाँच वर्ष का समय (चमत्कार और पवित्र असर के लिये) दरकार होता है, पोप ने उसमें भी ढील दे दी। पश्चिम बंगाल की एक क्रिश्चियन आदिवासी महिला जिसका नाम मोनिका बेसरा था।उसे टीबी और पेट में ट्यूमर हो गया था। बेलूरघाट के सरकारी अस्पताल के डॉ. रंजन मुस्ताफ़ उसका इलाज कर रहे थे। उनके इलाज से मोनिका को काफ़ी फ़ायदा हो रहा था और एक बीमारी लगभग ठीक हो गई थी। अचानक एक दिन मोनिका बेसरा ने अपने लॉकेट में मदर टेरेसा की तस्वीर देखी और उसका ट्यूमर पूरी तरह से ठीक हो गया। मिशनरी द्वारा मोनिका बेसरा के ठीक होने को चमत्कार एवं मदर टेरेसा को संत के रूप में प्रचारित करने का बहाना मिल गया। यह चमत्कार का दावा हमारी समझ से परे है। जिन मदर टेरेसा को जीवन में अनेक बार चिकित्सकों की आवश्यकता पड़ी थी। उन्हीं मदर टेरेसा की कृपा से ईसाई समाज उनके नाम से प्रार्थना करने वालो को बिना दवा केवल दुआ से, चमत्कार से ठीक होने का दावा करता होना मानता है। अगर कोई हिन्दू बाबा चमत्कार द्वारा किसी रोगी के ठीक होने का दावा करता है तो सेक्युलर लेखक उस पर खूब चुस्कियां लेते है। मगर जब पढ़ा लिखा ईसाई समाज ईसा मसीह से लेकर अन्य ईसाई मिशनरियों द्वारा चमत्कार होने एवं उससे सम्बंधित मिशनरी को संत घोषित करने का महिमा मंडन करता है तो उसे कोई भी सेक्युलर लेखक दबी जुबान में भी इस तमाशे को अन्धविश्वास नहीं कहता[xvi]



जब मोरारजी देसाई की सरकार में सांसद ओमप्रकाश त्यागी द्वारा धर्म स्वातंत्रय विधेयक के रूप में धर्मान्तरण के विरुद्ध बिल पेश हुआ[xvii]। तो इन्ही मदर टेरेसा ने प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर इस विधेयक का विरोध किया और कहाँ था की ईसाई समाज सभी समाज सेवा की गतिविधिया जैसे की शिक्षा, रोजगार, अनाथालय आदि को बंद कर देगा। अगर उन्हें अपने ईसाई मत का प्रचार करने से रोका जायेगा। तब प्रधान मंत्री देसाई ने कहाँ था इसका अर्थ क्या यह समझा जाये की ईसाईयों द्वारा की जा रही समाज सेवा एक दिखावा मात्र है। उनका असली प्रयोजन तो धर्मान्तरण हैं। देश के तत्कालीन प्रधान मंत्री का उत्तर ईसाई समाज की सेवा के आड़ में किये जा रहे धर्मान्तरण को उजागर करता है[xviii]

 इस लेख को पढ़कर हिन्दुओं का धर्मान्तरण करने वाली मदर टेरेसा को कितने लोग संत मानना चाहेंगे?

डॉ विवेक आर्य






[i] Skopje is the capital of the Republic of Macedonia.


[ii] Interview by Hemley Gonzalez, founder of: STOP The Missionaries of Charity


[iii] The Missionary Position: Mother Teresa in Theory and Practice by Christopher Hitchens


[iv] Ref.-The interview with Sally Warner


[v] क्योंकि हिन्दू संगठन जो भी बोलते या लिखते हैं, उसे तत्काल सांप्रदायिक ठहरा दिये जाने का “फैशन” है


[vi] Chap 2,The Missionary Position: Mother Teresa in Theory and Practice by Christopher Hitchens


[vii] Ibid


[viii] Mother Teresa: Where Are Her Millions? By Walter Wuellenweber


[ix] Mother Teresa: The Final Verdict By Aroup Chatterjee


[x] Picking Up the Pieces: 1971 War Babies’ Odyssey from Bangladesh to Canada

By Mustafa Chowdhury


[xi] Mother Teresa (The Centenary Edition) By Chawla, Navin


[xii] The Saint & The Sceptic Is ‘research’ enough to bust the Mother Teresa ‘myth’? By Dola Mitra, Article in Outlook Magazine March, 2013 Edition.


[xiii] Christopher Hitchens and his book The Missionary Position remain the original blasters of the Mother Teresa ‘myth’, asserting hers was an image created assiduously in the eyes of the media.


[xiv] Mother Teresa: The Final Verdict By Aroup Chatterjee


[xv] बागी दयानंद: स्वामी विद्यानंद


[xvi] Mother Teresa: The Final Verdict By Aroup Chatterjee


[xvii] The freedom of Religion Bill 1978 by Om Prakash Tyagi


[xviii] Vindicated by Time: The Niyogi Committee Report on Christian Missionary Activities, Chap 2



Monday, September 28, 2015

भारत में ईसाई मत के कारनामे



भारत में ईसाई मत के कारनामे




भारत देश में ईसाई मत का आगमन कब हुआ। यह कुछ निश्चित नहीं हैं। एक मान्यता के अनुसार 52 AD में संत थॉमस का आगमन दक्षिण भारत में हुआ। उनके प्रभाव से ईसाई बने भारतीय अपने आपको सीरियन ईसाई कहते हैं। ईसाई इतिहासकारों की इस मान्यता में अनेक कल्पनायें समाहित हैं।[i] वास्को दे गामा के 1498 में भारत आगमन के साथ ईसाई व्यापारी के रूप में भारत आने लगे। भारत में ईसाईयों के इतिहास में दो हस्तियों के कारनामे सबसे अधिक प्रसिद्द हैं। पहले फ्रांसिस ज़ेवियर और दूसरे रोबर्ट दी नोबिली। पुर्तग़ालियों के भारत आने और गोवा में जम जाने के बाद ईसाई पादरियों ने भारतीयों का बलात् धर्म-परिवर्तन करना शुरू कर दिया[ii]। इस अत्याचार को आरम्भ करने वाले ईसाई पादरी का नाम फ्रांसिस ज़ेवियर (Francis Xavier, 7 April 1506–3 December 1552) था। फ्रांसिस ज़ेवियर ने हिन्दुओं को धर्मान्तरित करने का भरसक प्रयास किया मगर उसे आरम्भ में विशेष सफलता नहीं मिली। उसने देखा की उसके और ईसा मसीह की भेड़ों की संख्या में वृद्धि करने के मध्य हिन्दू ब्राह्मण सबसे अधिक बाधक हैं। फ्रांसिस जेविअर के अपने ही शब्दों में ब्रह्माण उसके सबसे बड़े शत्रु थे क्यूंकि वे उन्हें धर्मांतरण करने में सबसे बड़ी रुकावट थे। फ्रांसिस ज़ेवियर ने इस समस्या के समाधान के लिए ईसाई शासन का आश्रय लिया। वाइसराय द्वारा यह आदेश लागू किया गया कि सभी ब्राह्मणों को पुर्तगाली शासन की सीमा से बाहर कर दिया जाये । गोवा में किसी भी स्थान पर नए मंदिर के निर्माण एवं पुराने मंदिर की मरमत करने की कोई इजाज़त नहीं होगी[iii]। इस पर भी असर न देख अगला आदेश लागू किया गया की जो भी हिन्दू ईसाई शासन के मार्ग में बाधक बनेगा उसकी सम्पति जप्त कर ली जाएगी। इससे भी सफलता न मिलने अधिक कठोरता से अगला आदेश लागू किया गया। राज्य के सभी ब्राह्मणों को धर्म परिवर्तन कर ईसाई बनने का अथवा देश छोड़ने का फरमान जारी हुआ। इस आदेश के साथ हिन्दुओं विशेष रूप से ब्राह्मणों पर भयंकर अत्याचार आरम्भ हो गये। हिन्दू पंडित और वैद्य पालकी पर सवारी नहीं कर सकता था। ऐसा करने वालो को दण्डित किया जाता था। यहाँ तक जेल में भी ठूस दिया जाता था[iv]। हिन्दुओं को ईसाई बनने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था। ईसाई बनने पर राज संरक्षण की प्राप्ति होना एवं हिन्दू बने रहने पर प्रताड़ित होने के चलते हजारों हिन्दू ईसाई बन गए[v]। हिन्दुओं को विवाह आदि पर उत्सव करने की मनाही करी गई। ईसाई शासन के अत्याचारों के चलते हिन्दू बड़ी संख्या में पलायन के लिए विवश हुए[vi]। फ्रांसिस ज़ेवियर के शब्दों में परिवर्तित हुए हिन्दुओं को ईसाई बनाते समय उनके पूजा स्थलों को,उनकी मूर्तियों को उन्हें तोड़ने देख उसे अत्यंत प्रसन्नता होती थी। हजारों हिन्दुओं को डरा धमका कर, अनेकों को मार कर, अनेकों को जिन्दा जला कर, अनेकों की संपत्ति जब्त कर, अनेकों को राज्य से निष्कासित कर अथवा जेलों में डाल कर ईसाई मत ने अपने आपको शांतिप्रिय एवं न्यायप्रिय सिद्ध किया[vii]। हिन्दुओं पर हुए अत्याचार का वर्णन करने भर में लेखनी कांप उठती है। गौरी और गजनी का अत्याचारी इतिहास फिर से सजीव हो उठा था[viii]। विडंबना देखिये की ईसा मसीह के लिए भेड़ों की संख्या में वृद्धि के बदले फ्रांसिस जेविअर को ईसाई समाज ने संत की उपाधि से नवाजा गया। गोवा प्रान्त में एक गिरिजाघर में फ्रांसिस ज़ेवियर की अस्थिया सुरक्षित रखी गई है। हर वर्ष कुछ दिनों के लिए इन्हें दर्शनार्थ रखा जाता है। सबसे बड़ी विडंबना देखिये इनके दर्शन एवं सम्मान करने गोवा के वो ईसाई आते है जिनके पूर्वज कभी हिन्दू थे एवं उन्हें इसी ज़ेवियर ने कभी बलात ईसाई बनाया गया था।

रोबर्ट दी नोबिली नामक ईसाई का आगमन 1606 में मदुरै, दक्षिण भारत में हुआ। उसने पाया की वहां पर हिन्दुओं को धर्मान्तरित करना लगभग असंभव ही है। उसने देखा की हिन्दू समाज में ब्राह्मणों की विशेष रूप से प्रतिष्ठा हैं। इसलिए उसने धूर्तता करने की सोची। उसने पारम्परिक धोती पहन कर एक ब्राह्मण का वेश धरा। जनेऊ, शिखा रख कर शाकाहारी भोजन करना आरम्भ कर दिया। उसने यह प्रचलित कर दिया की वह सुदूर रोम से आया हुआ ब्राह्मण है। उसके पूर्वज भारत से रोम गए थे। उसने तमिल और संस्कृत भाषा में ग्रन्थ रचना करने का नया प्रपंच भी किया। इस ग्रन्थ को उसने "वेद" का नाम दिया। ब्राह्मण वेश धरकर नोबिली ने सत्संग करना आरम्भ कर दिया। उसके सत्संग में कुछ हिन्दू आने लग गए। धीरे धीरे उसने सत्संग में ईसाई प्रार्थनों का समावेश कर दिया। उसके प्रभाव से अनेक हिन्दू ईसाई बन गए[ix]। कालांतर में मैक्समूलर ने नोबिली के छदम "वेद" का रहस्य उजागर कर दिया। पाठक सोच रहे होंगे की मैक्समूलर ने ऐसा क्यों किया। जबकि दोनों ईसाई थे। उत्तर सुनकर रोंगटे खड़े हो जायेगे। नोबिली ईसाइयत के एक सम्प्रदाय रोमन कैथोलिक से सम्बंधित था जबकि मैक्समूलर प्रोटोस्टेंट सम्प्रदाय से सम्बंधित था। दोनों के आपसी जलन और फुट ने इस भेद का भंडाफोड़ कर दिया। जहाँ पर धर्म का स्थान मज़हब/मत मतान्तर ले लेते हैं। वहां पर ऐसा ही होता है।

नोबिली को ईसाई समाज में दक्षिण भारत में धर्मान्तरण के लिए बड़े सम्मान से देखा जाता है। पाठक स्वयं विचार करे। वेश बदल कर धोखा देने वाला नकल करने वाला सम्मान के योग्य है अथवा तिरस्कार के योग्य है? प्रसिद्द राष्ट्रवादी लेखक सीता राम गोयल द्वारा ईसाई समाज द्वारा हिन्दू वेश धारण करने, हिन्दू मंदिरों के समान गिरिजाघर बनाने, हिन्दू धर्मग्रंथों के समान ईसाई भजन एवं मंत्र बनाने, हिन्दू देवी देवताओं के समान ईसा मसीह एवं मरियम की मूर्तियां बनाने, ईसाई शिक्षण संस्थान को गुरुकुल की भाँति नकल करने की अपने ग्रंथों में भरपूर आलोचना करी है[x]। विचार करे क्या ईसाईयों को अपने धर्म ग्रंथों एवं सिद्धांतों पर इतना अविश्वास है की उन्हें नकल का सहारा लेकर अपने मत का प्रचार करना पड़ता है। धर्म की मूल सत्यता पर टीकी है। न की जूठ,फरेब, नकल और धोखे पर टिकी हैं।

भारत देश के विशाल इतिहास के ईसाईयों के अत्याचार, जूठ, धोखे से सम्बंधित दो कारनामों का सत्य इतिहास मैंने अपने समक्ष रखा हैं। यह इतिहास उस काल का है जब भारत में अंग्रेजी हुकूमत की स्थापना नहीं हुई थी। पाठक कल्पना करे अंग्रेजों के संरक्षण में ईसाईयों ने कैसे कैसे कारनामे करे होगे।



डॉ विवेक आर्य


[i] The myth of Saint Thomas and the Mylapore Shiva Temple by Ishwar Sharan, Voice of India, New Delhi, 1991


[ii] Alfredo DeMello, “The Portuguese Inquisition in Goa”


[iii] Viceroy António de Noronha issued in 1566, an order applicable to the entire area under Portuguese rule:

“I hereby order that in any area owned by my master, the king, nobody should construct a Hindu temple and such temples already constructed should not be repaired without my permission. If this order is transgressed, such temples shall be, destroyed and the goods in them shall be used to meet expenses of holy deeds, as punishment of such transgression.”


[iv] Priolkar, A. K. The Goa Inquisition. (Bombay, 1961)


[v] Shirodhkar, P. P., Socio-Cultural life in Goa during the 16th century, p. 35


[vi] Shirodhkar, P. P., Socio-Cultural life in Goa during the 16th century, p. 35


[vii] Charles Dellon ,L'Inquisition de Goa (The Inquisition of Goa)


[viii] The words Auto da fé reverberated throughout Goa, reminiscent of the furies of Hell, which concept, incidentally does not exist in the Hindu pantheon. On April 1st 1650 for instance, four people were burnt to death, the next auto da fé was on December 14, 1653, when 18 were put to the flames, accused of the crime of heresy. And from the 8th April 1666 until the end of 1679 – during which period Dellon was tried – there were eight autos da fé, inwhich 1208 victims were sentenced. In November 22, 1711 another auto da fé took place involving 41 persons. Another milestone was on December 20, 1736, when the Inquisition burnt an entire family of Raaim, Salcete, destroying their house, putting salt on their land, and placing a stone padrao, which still existed in the place (at least in 1866)-Alfredo De Mello (‘Memoirs of Goa’ Chapter 21)


[ix] History of Hindu Christian encounters by Sita Ram Goel, Chap 4


[x] The masquerade of Robert Di Nobili has been described in detail in Sita Ram Goel, Catholic Ashrams: Sannyasins or Swindlers?, Voice of India, New Delhi, 1995.

Saturday, September 26, 2015

Double standard Secularism




Double standard Secularism

Allegation- Outcry against animal sacrifice in Hindu temple in Nepal
Counter Allegation-No comments on animal sacrifice on ‘Eid’.

Allegation- Outcry against beef ban on Jain festival in Mumbai
Counter Allegation-No comments when Muslims denied singing of Vande Mataram and Surya Namaskar.

Allegation- Outcry against ban on plays like “Mujjfarnagar abhi baki hein”
Counter Allegation-No comments on fatwa against A.R.Rahman for giving music in Iranian film on Prophet.

Allegation- Outcry against school for restricting head scarf for a Muslim girl in Karnataka.
Counter Allegation-No comments when Hindu kids were not given mid-day meal in month of Ramadan in Kerala

Allegation-Outcry against Nationalist organization for promoting patriotism.
Counter Allegation-No comments on ISIS recruiting Muslims youths through Social media.

Allegation-Outcry on change of name of Aurangzeb road to Kalam Road in Delhi.
Counter Allegation-Consider discussing Islamic atrocities and plundering of Hindu temples by invaders as outdated and irrelevant.

Allegation- Outcry against social media on exposing double standards and naming them ‘Bhakts’
Counter Allegation-Prefers to keep mum on Love Jihad and conversion of Hindu Girls to Islam.

Allegation- Outcry against Hindu to celebrate festival like Diwali & Holi as noise, air and water pollution.
Counter Allegation- No comments on widespread pollution by animal sacrifice on ‘Eid.

Allegation- Kedarnath Tragedy was due to poor management by Hindu management of temple. Temples must be handed over to government.
Counter Allegation- Mecca tragedy was will of Allah. Peace for all poor souls.

Allegation- Cure due to miracle claimed by any Hindu Baba is pure superstition.
Counter Allegation-Cure by praying to Christian Saints is gift of God.

Any concept associated with pride and culture of our country is considered as inferior, impractical, unfeasible, unworldly and unsophisticated by this secularist class.
I consider this class as most dangerous and hidden enemy for our nation.

Dr Vivek Arya


#DownwithSecularism

Thursday, September 24, 2015

वेद और देव



वेद और देव

वेदों में देव विषय को लेकर अनेक भ्रांतियां हैं।

शंका  1- देव शब्द से क्या अभिप्राय समझते हैं ?

समाधान- निरुक्त 7/15 में यास्काचार्य के अनुसार देव शब्द दा, द्युत और दिवु इस धातु से बनता हैं। इसके अनुसार ज्ञान,प्रकाश, शांति, आनंद तथा सुख देने वाली सब वस्तुओं को देव कहा जा सकता हैं। यजुर्वेद[14/20] में अग्नि, वायु, सूर्य, चन्द्र वसु, रूद्र, आदित्य, इंद्र इत्यादि को देव के नाम से पुकारा गया हैं। परन्तु वेदों [ऋग्वेद 6/55/16, ऋग्वेद 6/22/1, ऋग्वेद 8/1/1, अथर्ववेद 2/2/1]  में तो पूजा के योग्य केवल एक सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, भगवान ही हैं।
देव शब्द का प्रयोग सत्यविद्या का प्रकाश करनेवाले सत्यनिष्ठ विद्वानों के लिए भी होता हैं क्यूंकि वे ज्ञान का दान करते हैं और वस्तुओं के यथार्थ स्वरुप को प्रकाशित करते हैं [शतपथ 3/7/3/10, शतपथ 2/2/2/6, शतपथ 4/3/44/4, शतपथ 2/1/3/4, गोपथ 1/6] । देव का प्रयोग जीतने की इच्छा रखनेवाले व्यक्तियों विशेषत: वीर, क्षत्रियों, परमेश्वर की स्तुति करनेवाले तथा पदार्थों का यथार्थ रूप से वर्णन करनेवाले विद्वानों, ज्ञान देकर मनुष्यों को आनंदित करनेवाले सच्चे ब्राह्मणों, प्रकाशक, सूर्य,चन्द्र, अग्नि, सत्य व्यवहार करने वाले वैश्यों के लिए भी होता हैं [शतपथ 6/3/1/15,शतपथ 7/5/1/21, शतपथ 7/2/4/26, गोपथ 2/10]

शंका  2- वेदों में 33 देवों होने से क्या अभिप्राय हैं?

समाधान- वेदों एवं ब्राह्मण आदि ग्रंथों में 33 देवों का वर्णन मिलता हैं। 33 देवों के आधार पर यह निष्कर्ष प्राय: निकाला जाता हैं की वेद अनेकेश्वरवादी अर्थात एक से अधिक ईश्वर की सत्ता में विश्वास रखते हैं। वेदों में अनेक स्थानों पर 33 देवों का वर्णन मिलता हैं [अथर्ववेद 10/7/13,अथर्ववेद 10/7/27, ऋग्वेद 1/45/27, ऋग्वेद 8/28/1, यजुर्वेद 20/36] ईश्वर और देव में अंतर स्पष्ट होने से एक ही उपासना करने योग्य ईश्वर एवं कल्याणकारी अनेक देवों में सम्बन्ध स्पष्ट होता हैं।
शतपथ ब्राह्मण [4/5/7/2] के अनुसार 33 देवता हैं 8 वसु, 11 रूद्र, 12 आदित्य, द्यावा और पृथ्वी और 34 वां प्रजापति परमेश्वर हैं। इसी बात को ताण्ड्य महाब्राह्मण[6/2/5] और ऐतरेय ब्राह्मण[2/18/37] में भी कहा गया है।
शतपथ के अनुसार 8 वसु हैं अग्नि, पृथ्वी, वायु, आकाश, अंतरिक्ष, सूर्य, चन्द्रमा और नक्षत्र क्यूंकि यह जगत को बसाने वाले हैं। 11 रुद्रों से तात्पर्य 10 प्राण एवं 11 वें आत्मा से है क्यूंकि ये शरीर से निकलते हुए प्राणियों को रुलाते है। 12 आदित्य से तात्पर्य वर्ष के 12 मासों से हैं क्यूंकि ये हमारी आयु को मानो प्रतिदिन ले जा रहे हैं। 32 वां इंद्र अथवा बिजली हैं एवं 33 वां प्रजापति अथवा यज्ञ है।

शंका  3- परमेश्वर और 33 देवों में क्या सम्बन्ध हैं?

 परमेश्वर और 33 देवों के मध्य सम्बन्ध का वर्णन करते हुए कहा गया है कि ये 33 देव जिसके अंग में समाये हुए हैं उसे स्कम्भ (सर्वाधार परमेश्वर) कहो। वही सबसे अधिक सुखदाता है। ये 33 देव जिसकी निधि की रक्षा करते है, उस निधि को कौन जानता है? ये देव जिस विराट शरीर में अंग के समान बने हैं, उन 33 देवों को ब्रह्मज्ञानी ही ठीक ठीक जानते हैं, अन्य नहीं ,इत्यादि। इन सभी में पूजनीय तो वह एकमात्र देवों का अधिदेव और प्राणस्वरूप परमेश्वर ही है। 

वेद में अनेक मन्त्रों के माध्यम से ईश्वर को देवों का पिता, मित्र, आत्मा, जनिता अर्थात उत्पादक, अंतर्यामी, अमरता को प्रदान करने वाला, कष्टों से बचानेवाला, जीवनाधारदेवों अर्थात सत्यनिष्ठ विद्वान का मित्र आदि के रूप में कहा गया हैं। जैसे
1. जो श्रद्धा से देवों के पिता वा पालक उस ज्ञान के स्वामी परमेश्वर की उपासना करता हैं उसका जन्म सफल हो जाता है [ऋग्वेद 2/26/3  ]
2. परमेश्वर सत्यनिष्ठ विद्वानों (देव) का कल्याणकारी मित्र है[ऋग्वेद 1/31/1]
3. परमेश्वर देवों का आत्मा है [ऋग्वेद 4/3/7
4. परमेश्वर सब देवों का अंतर्यामी आत्मा है [ऋग्वेद 10/168/4]
5. परमेश्वर सब देवों का अधिष्ठाता देव है [ ऋग्वेद 10/121/8]
6. परमेश्वर सब देवों में बड़ा देव है [ऋग्वेद 1/50/9]
7. वह परमेश्वर हमारा बंधु है [यजुर्वेद 32/10]
8. जैसे वृक्ष के तने के आश्रित सब शाखाएं होती हैं, वैसे ही उस परम देव के आश्रय में अन्य सब देव रहते हैं [अथवर्वेद 10/7/38]


शंका  4- स्वामी दयानंद के अनुसार देवता शब्द का क्या अभिप्राय हैं ?

स्वामी दयानंद देव शब्द पर विचार करते हुए ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका वेदविषयविचार अध्याय 4 में लिखते है कि दान देने से देव नाम पड़ता है और दान कहते है अपनी चीज दूसरे के अर्थ दे देना। दीपन कहते है प्रकाश करने को, द्योतन कहते है सत्योपदेश को, इनमें से दान का दाता मुख्य एक ईश्वर ही है, जिसने जगत को सब पदार्थ दे रखे है तथा विद्वान मनुष्य भी विद्यादि पदार्थों के देनेवाले होने से देव कहाते हैं। दीपन अर्थात सब मूर्तिमान द्रव्यों का प्रकाश करने से सूर्यादि लोकों का नाम भी देव हैं। तथा माता-पिता, आचार्य और अतिथि भी पालन, विद्या और सत्योपदेशादी के करने से देव कहाते हैं। वैसे ही सूर्यादि लोकों का भी जो प्रकाश करनेवाला हैं, सो ही ईश्वर सब मनुष्यों को उपासना करने के योग्य इष्टदेव हैं, अन्य कोई नहीं।

कठोपनिषद [5/15] का भी प्रमाण हैं की सूर्य, चन्द्रमा, तारे, बिजली और अग्नि ये सब परमेश्वर में प्रकाश नहीं कर सकते, किन्तु इस सबका प्रकाश करनेवाला एक वही है, क्यूंकि परमेश्वर के प्रकाश से ही सूर्य आदि सब जगत प्रकाशित हो रहा हैं। इसमें यह जानना चाहिये की ईश्वर से भिन्न कोई पदार्थ स्वतन्त्र प्रकाश करनेवाला नहीं हैं , इससे एक परमेश्वर ही मुख्य देव हैं।

शंका  5- वेदों में एकेश्वरवाद अर्थात ईश्वर के एक होने के क्या प्रमाण हैं?

समाधान- पश्चिमी विद्वान वेदों में बहुदेवतावाद या अनेकेश्वरवाद मानते हैं। जब उन्हें वेदों में उन्होंने यहाँ तक कह डाला की वेदों ने प्रारम्भिक से अनेकेश्वरवाद के क्रमबद्ध तत्वज्ञान का विकास प्राकृतिक, एकेश्वरवाद और अद्वैतवाद की मंजिलों से गुजरते हुए किया [1]। यह एक कल्पना मात्र हैं क्यूंकि निष्पक्ष रूप से पढ़ने ज्ञात होता हैं की वेदों में अनेक देवताओं का वर्णन मिलता हैं मगर पूजा का विधान केवल देवाधिदेव सभी देवों के अधिष्ठाता एक ईश्वर की ही बताई गई हैं। इंद्र, मित्र, वरुण, अग्नि, यम, मातरिश्वा, वायु, सूर्य, सविता आदि प्रधानतया उस एक परमेश्वर के ही भिन्न-भिन्न गुणों को सुचित करने वाले नाम हैं। 

   वेदमंत्रों में ईश्वर के एक होने के अनेक प्रमाण हैं। जैसे 

ऋग्वेद

1. जो एक ही सब मनुष्यों का और वसुओ का ईश्वर है [ऋग्वेद 1/7/9]
2. जो एक ही हैं और दानी मनुष्य को धन प्रदान करता है [ऋग्वेद 1/84/6]
3. जो एक ही हैं और मनुष्यों से पुकारने योग्य है [ ऋग्वेद 6/22/1]
4. हे परमेश्वर (इन्द्र), तू सब जनों का एक अद्वितीय स्वामी हैं, तू अकेला समस्त जगत का राजा है [ऋग्वेद 6/36/4]
5. हे मनुष्य, जो परमेश्वर एक ही हैं उसी की तू स्तुति कर, वह सब मनुष्यों का द्रष्टा है [ऋग्वेद 6/45/16]
6. तो एक ही अपने पराकर्म से सबका इश्वर बना हुआ है [ऋग्वेद 8/6/41]
7. विश्व को रचने वाला एक ही देव हैं, जिसने आकाश और भूमि को जन्म दिया है [ऋग्वेद 10/81/3]
 8. हे दुस्तो को दंड देने वाले परमेश्वर, तुझ से अधिक उत्कृष्ट और तुझ से बड़ा संसार में कोई नहीं हैं, न ही तेरी बराबरी का अन्य कोई नहीं हैं [ऋग्वेद 4/30/1]
9. एक सतस्वरूप परमेश्वर को बुद्धिमान ज्ञानी लोग अनेक नामों से पुकारते हैं। उसी को वे अग्नि, यम, मातरिश्वा,इंद्र, मित्र, वरुण, दिव्य, सुपर्ण इत्यादि नामों से याद करते है [ऋग्वेद 1/164/46]
10. जो ईश्वर एक ही है, हे मनुष्य!  तू उसी की स्तुति कर[ऋग्वेद 5/51/16]
11. ऋग्वेद के 10/121 के हिरण्यगर्भ सूक्त में प्रजापति के नाम से भगवान का स्मरण करते हुए परमेश्वर को चार बार "एक" शब्द का प्रयोग हुआ हैं। इस सूक्त में एकेश्वरवाद का इन स्पष्ट शब्दों में प्रतिपादन हैं की न चाहते हुए भी मैक्समूलर महोदय ने लिखते है "मैं एक और सूक्त ऋग्वेद 10/121 को जोड़ना चाहता हूँ, जिसमें एक ईश्वर का विचार इतनी प्रबलता और निश्चय के साथ प्रकट किया गया हैं की हमें आर्यों के नैसर्गिक एकेश्वरवादी होने से इंकार करते हुए बहुत अधिक संकोच करना पड़ेगा।[2]"
ईसाई मत के पूर्वाग्रह से ग्रसित होने के कारण मैक्समूलर महोदय ने एक नई तरकीब निकाली एकेश्वरवाद को सिद्ध करने वाले मन्त्रों को नवीन सिद्ध करने का प्रयास किया[3]

यजुर्वेद
1. वह ईश्वर अचल है, एक है, मन से भी अधिक वेगवान है [यजुर्वेद 40/4]

अथवर्वेद
1. पृथ्वी आदि लोकों का धारण करने वाला ईश्वर हमें सुख देवे,जो जगत का स्वामी है, एक ही है, नमस्कार करने योग्य है, बहुत सुख देने वाला है [अथवर्वेद 2/2/2]
2. आओ, सब मिलकर स्तुति वचनों से इस परमात्मा की पूजा करो, जो आकाश का स्वामी है, एक है, व्यापक है और हम मनुष्यों का अतिथि है [अथवर्वेद 6/21/1]
3. वह परमेश्वर एक है, एक है, एक ही है, उसके मुकाबले में कोई दूसरा , तीसरा, चौथा परमेश्वर नहीं है, पांचवां, छठा , सातवाँ नहीं है, आठवां, नौवां, दसवां नहीं है, वही एक परमेश्वर चेतन- अचेतन सबको देख रहा है [अथवर्वेद 16/4/16-20]

इस प्रकार वेदों में दिए गए मंत्रो से यह सिद्ध होता है कि परमेश्वर एक है।

शंका  6- मैक्समूलर द्वारा प्रचारित (Henotheism) हीनोथीइज़्म में क्या कमी है?

समाधान- मैक्समूलर महोदय द्वारा प्रचारित हीनोथीइज़्म [4] के अनुसार प्रत्येक वैदिक कवि वा ऋषि जब जिस देवता की स्तुति करने लगता है, तब उसी को सर्वोत्कृष्ट बताने और उसके अंदर सर्वोत्कृष्टता के सब गुणों को समाविष्ट करने का प्रयत्न करता है। वेद के अनेक ऐसे सूक्तों को पाना बहुत सुगम है, जिनमें प्राय: प्रत्येक देवता को सबसे ऊँचा और पूर्ण बताया गया है। ऋग्वेद के द्वितीय मंडल के प्रथम सूक्त में अग्नि को सब मनुष्यों का बुद्धिमान राजा, संसार का स्वामी और शासक, मनुष्यों का पिता, भाई, पुत्र और मित्र कहा गया है और दूसरे देवों की सब शक्तियां और नाम स्पष्टया उसकी मानी गई है।

 मैक्समूलर महोदय वेदों के अटल सिद्धांत को समझ नहीं पाये। वेद के ही अनुसार ईश्वर को इंद्र, विष्णु, ब्रह्मा, ब्राह्मणस्पति, वरुण,मित्र, अर्यमा, रूद्र, पूषा, द्रविणोदा, सवितादेव और भग कहा गया हैं और ये सब नाम प्रधानतया उस एक अग्निपद्वाच्य सर्वज्ञ परमेश्वर के है और उन्हीं के गुणों को सूचित करते हैं [ऋग्वेद 2/1/3-7]। जैसे कि परिवार में एक ही व्यक्ति को अनेक संबंधों के कारण भिन्न भिन्न व्यक्ति पिता, चाचा, दादा, भाई,मामा आदि नामों से पुकारते है, वैसे ही एक परमात्मा के अनंत गुणों को सूचित करने के लिए अनेक नाम प्रयुक्त किये जाते है। जब ज्ञानस्वरूप के रूप में उसका स्मरण किया जाता है तो उसे अग्नि कहा जाता है, उसकी परमैश्वर्य सम्पन्नता दिखाने के लिए ब्रह्मा, ज्ञान का अधिपतितत्व दिखाने के लिए ब्राह्मणस्पति, सर्वोत्तमता और पापनिवारकता सूचित करने के लिए वरुण, सबके साथ प्रेम दर्शाने के लिए मित्र, न्यायकारिता के लिए अर्यमा, दुष्टों को रुलाने के लिए  रूद्र, ज्ञानादि देने के लिए द्रविणोदा, प्रकाशस्वरूप होने के लिए सविता आदि कहते हैं। अर्थात यह सभी नाम एक ही ईश्वर के है जोकि उनके विभिन्न गुणों को दर्शाते हैं।

वेदों में एक ईश्वर के विभिन्न नाम होने की साक्षी भी दी गयी है जैसे-

1. परमेश्वर एक ही है, ज्ञानी लोग उसे विभिन्न नामो से पुकारते है, उसे इन्द्र कहते है, मित्र कहते है, वरुण कहते है, अग्नि कहते है, और वही दिव्या सुपर्ण और गरुत्मान भी है, उसे ही वे यम और मातरिश्वा भी कहते है [ऋग्वेद 1/164/46]
2. एक होते हुए भी उस सुपर्ण परमेश्वर को ज्ञानी कविजन बहुत नामो से कल्पित कर लेते है[ ऋग्वेद 10/114/5]
3. यही भाव ऋग्वेद 3/26/7, ऋग्वेद 10/82/3, यजुर्वेद 32/1, अथर्वेद 13/4 में भी कहाँ गया है।

उदहारण के लिए जिस प्रकार बाईबिल में ईश्वर को God, Almighty, Lord आदि अनेको नाम से पुकारा गया है, उसी प्रकार वेदों में ईश्वर को भी विभिन्न नाम से पुकारा गया है।
 
श्री अरविन्द घोष ने मैक्समूलर के हीनोथीइज़्म की कथित आलोचना अपने ग्रंथों में की है [5]। 

मैक्समूलर की यह कल्पना वेदों में एकेश्वरवाद को असफल रूप से सिद्ध करने के प्रयासों की एक 
कड़ी मात्र हैं। इस प्रकार से यह सिद्ध होता हैं की वैदिक ईश्वर एक हैं एवं वेद विशुद्ध एकेश्वरवाद का सन्देश देते है। वेदों में बहुदेवतावाद एक भ्रान्ति मात्र है और देव आदि शब्द कल्याणकारी शक्तियों से लेकर श्रेष्ठ मानव आदि के लिए प्रयोग हुआ है एवं उपासना के योग्य केवल एक ईश्वर है। ईश्वर के भी विभिन्न गुणों के कारण अनेक नाम हो सकते है एवं अनेक नाम देवों के भी हो सकते हैं।




[i]It has been generally held that the Rigvedic Religion is essentially poly-theistic one, taking on a pantheistic coloring only in a few of its latest hymns. Yet a deeply abstract philosophizing crops up unexpectedly in some hymns as a reminder of the long journey made from primitive polytheism to systematic philosophy, through the stages of Naturalistic poly-theism, monotheism and monism.p.37, Vedic Age
[2] I add only one more Hymn (Rig. 10-121) in which the idea of one God is expressed with such power and decision, that it will make us hesitate before we deny to the Aryans an instinctive Mono-theism. P.578, History on Ancient Sanskrit Literature by Maxmuller.
[3] This is one of the Hymns which have always been suspected as modern by European interpreters. P.3, Vedic hymns by Maxmuller
[4] Ancient Sanskrit Literature. p.353-35. Prof. Maxmuller
[5] Dayanand Bankim Tilak, P.17-18 by Shri Arvind