Monday, July 31, 2017

ब्रह्म मुहूर्त में उठने की परंपरा क्यों ?



*ब्रह्म मुहूर्त में उठने की परंपरा क्यों ?*

रात्रि के अंतिम प्रहर को ब्रह्म मुहूर्त कहते हैं। हमारे ऋषि मुनियों ने इस मुहूर्त का विशेष महत्व बताया है। उनके अनुसार यह समय निद्रा त्याग के लिए सर्वोत्तम है। ब्रह्म मुहूर्त में उठने से सौंदर्य, बल, विद्या, बुद्धि और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। सूर्योदय से चार घड़ी (लगभग डेढ़ घण्टे) पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में ही जग जाना चाहिये। इस समय सोना शास्त्र निषिद्ध है।

*ब्रह्म का मतलब परम तत्व या परमात्मा। मुहूर्त यानी अनुकूल समय। रात्रि का अंतिम प्रहर अर्थात प्रात: 4 से 5.30 बजे का समय ब्रह्म मुहूर्त कहा गया है।*

*“ब्रह्ममुहूर्ते या निद्रा सा पुण्यक्षयकारिणी”।*
(ब्रह्ममुहूर्त की निद्रा पुण्य का नाश करने वाली होती है।)

सिख धर्म में इस समय के लिए बेहद सुन्दर नाम है--*"अमृत वेला"*, जिसके द्वारा इस समय का महत्व स्वयं ही साबित हो जाता है। ईश्वर भक्ति के लिए यह महत्व स्वयं ही साबित हो जाता है। ईवर भक्ति के लिए यह सर्वश्रेष्ठ समय है। इस समय उठने से मनुष्य को सौंदर्य, लक्ष्मी, बुद्धि, स्वास्थ्य आदि की प्राप्ति होती है। उसका मन शांत और तन पवित्र होता है।

*ब्रह्म मुहूर्त* में उठना हमारे जीवन के लिए बहुत लाभकारी है। इससे हमारा शरीर स्वस्थ होता है और दिनभर स्फूर्ति बनी रहती है। स्वस्थ रहने और सफल होने का यह ऐसा फार्मूला है जिसमें खर्च कुछ नहीं होता। केवल आलस्य छोड़ने की जरूरत है।

*पौराणिक महत्व* -- वाल्मीकि रामायण के मुताबिक माता सीता को ढूंढते हुए श्रीहनुमान ब्रह्ममुहूर्त में ही अशोक वाटिका पहुंचे। जहां उन्होंने वेद व यज्ञ के ज्ञाताओं के मंत्र उच्चारण की आवाज सुनी।

शास्त्रों में भी इसका उल्लेख है--

*वर्णं कीर्तिं मतिं लक्ष्मीं स्वास्थ्यमायुश्च विदन्ति।*
*ब्राह्मे मुहूर्ते संजाग्रच्छि वा पंकज यथा॥*

अर्थात- ब्रह्म मुहूर्त में उठने से व्यक्ति को सुंदरता, लक्ष्मी, बुद्धि, स्वास्थ्य, आयु आदि की प्राप्ति होती है। ऐसा करने से शरीर कमल की तरह सुंदर हो जाता हे।

*ब्रह्म मुहूर्त और प्रकृति :--*

ब्रह्म मुहूर्त और प्रकृति का गहरा नाता है। इस समय में पशु-पक्षी जाग जाते हैं। उनका मधुर कलरव शुरू हो जाता है। कमल का फूल भी खिल उठता है। मुर्गे बांग देने लगते हैं। एक तरह से प्रकृति भी ब्रह्म मुहूर्त में चैतन्य हो जाती है। यह प्रतीक है उठने, जागने का। प्रकृति हमें संदेश देती है ब्रह्म मुहूर्त में उठने के लिए।

*इसलिए मिलती है सफलता व समृद्धि*

आयुर्वेद के अनुसार ब्रह्म मुहूर्त में उठकर टहलने से शरीर में संजीवनी शक्ति का संचार होता है। यही कारण है कि इस समय बहने वाली वायु को अमृततुल्य कहा गया है। इसके अलावा यह समय अध्ययन के लिए भी सर्वोत्तम बताया गया है क्योंकि रात को आराम करने के बाद सुबह जब हम उठते हैं तो शरीर तथा मस्तिष्क में भी स्फूर्ति व ताजगी बनी रहती है। प्रमुख मंदिरों के पट भी ब्रह्म मुहूर्त में खोल दिए जाते हैं तथा भगवान का श्रृंगार व पूजन भी ब्रह्म मुहूर्त में किए जाने का विधान है।

*ब्रह्ममुहूर्त के धार्मिक, पौराणिक व व्यावहारिक पहलुओं और लाभ को जानकर हर रोज इस शुभ घड़ी में जागना शुरू करें तो बेहतर नतीजे मिलेंगे।*

ब्रह्म मुहूर्त में उठने वाला व्यक्ति सफल, सुखी और समृद्ध होता है, क्यों? क्योंकि जल्दी उठने से दिनभर के कार्यों और योजनाओं को बनाने के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है। इसलिए न केवल जीवन सफल होता है। शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहने वाला हर व्यक्ति सुखी और समृद्ध हो सकता है। कारण वह जो काम करता है उसमें उसकी प्रगति होती है। विद्यार्थी परीक्षा में सफल रहता है। जॉब (नौकरी) करने वाले से बॉस खुश रहता है। बिजनेसमैन अच्छी कमाई कर सकता है। बीमार आदमी की आय तो प्रभावित होती ही है, उल्टे खर्च बढऩे लगता है। सफलता उसी के कदम चूमती है जो समय का सदुपयोग करे और स्वस्थ रहे। अत: स्वस्थ और सफल रहना है तो ब्रह्म मुहूर्त में उठें।

*वेदों में भी ब्रह्म मुहूर्त में उठने का महत्व और उससे होने वाले लाभ का उल्लेख किया गया है।*

प्रातारत्नं प्रातरिष्वा दधाति तं चिकित्वा प्रतिगृह्यनिधत्तो।
तेन प्रजां वर्धयमान आयू रायस्पोषेण सचेत सुवीर:॥ - ऋग्वेद-1/125/1

अर्थात- सुबह सूर्य उदय होने से पहले उठने वाले व्यक्ति का स्वास्थ्य अच्छा रहता है। इसीलिए बुद्धिमान लोग इस समय को व्यर्थ नहीं गंवाते। सुबह जल्दी उठने वाला व्यक्ति स्वस्थ, सुखी, ताकतवाला और दीर्घायु होता है।

यद्य सूर उदितोऽनागा मित्रोऽर्यमा। सुवाति सविता भग:॥ - सामवेद-35

अर्थात- व्यक्ति को सुबह सूर्योदय से पहले शौच व स्नान कर लेना चाहिए। इसके बाद भगवान की पूजा-अर्चना करना चाहिए। इस समय की शुद्ध व निर्मल हवा से स्वास्थ्य और संपत्ति की वृद्धि होती है।

उद्यन्त्सूर्यं इव सुप्तानां द्विषतां वर्च आददे।

अथर्ववेद- 7/16/२

अर्थात- सूरज उगने के बाद भी जो नहीं उठते या जागते उनका तेज खत्म हो जाता है।

व्यावहारिक महत्व - व्यावहारिक रूप से अच्छी सेहत, ताजगी और ऊर्जा पाने के लिए ब्रह्ममुहूर्त बेहतर समय है। क्योंकि रात की नींद के बाद पिछले दिन की शारीरिक और मानसिक थकान उतर जाने पर दिमाग शांत और स्थिर रहता है। वातावरण और हवा भी स्वच्छ होती है। ऐसे में देव उपासना, ध्यान, योग, पूजा तन, मन और बुद्धि को पुष्ट करते हैं।

*जैविक घड़ी पर आधारित शरीर की दिनचर्या*:--

प्रातः 3 से 5 – इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से फेफड़ों में होती है। थोड़ा गुनगुना पानी पीकर खुली हवा में घूमना एवं प्राणायाम करना । इस समय दीर्घ श्वसन करने से फेफड़ों की कार्यक्षमता खूब विकसित होती है। उन्हें शुद्ध वायु (आक्सीजन) और ऋण आयन विपुल मात्रा में मिलने से शरीर स्वस्थ व स्फूर्तिमान होता है। ब्रह्म मुहूर्त में उठने वाले लोग बुद्धिमान व उत्साही होते है, और सोते रहने वालों का जीवन निस्तेज हो जाता है ।

प्रातः 5 से 7 – इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से आंत में होती है। प्रातः जागरण से लेकर सुबह 7 बजे के बीच मल-त्याग एवं स्नान का लेना चाहिए । सुबह 7 के बाद जो मल-त्याग करते है उनकी आँतें मल में से त्याज्य द्रवांश का शोषण कर मल को सुखा देती हैं। इससे कब्ज तथा कई अन्य रोग उत्पन्न होते हैं।

प्रातः 7 से 9 – इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से आमाशय में होती है। यह समय भोजन के लिए उपर्युक्त है । इस समय पाचक रस अधिक बनते हैं। भोजन के बीच-बीच में गुनगुना पानी (अनुकूलता अनुसार) घूँट-घूँट पिये।

प्रातः 11 से 1 – इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से हृदय में होती है।

दोपहर 12 बजे के आस–पास मध्याह्न – संध्या (आराम) करने की हमारी संस्कृति में विधान है। इसी लिए भोजन वर्जित है । इस समय तरल पदार्थ ले सकते है। जैसे मट्ठा पी सकते है। दही खा सकते है ।

दोपहर 1 से 3 -- इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से छोटी आंत में होती है। इसका कार्य आहार से मिले पोषक तत्त्वों का अवशोषण व व्यर्थ पदार्थों को बड़ी आँत की ओर धकेलना है। भोजन के बाद प्यास अनुरूप पानी पीना चाहिए । इस समय भोजन करने अथवा सोने से पोषक आहार-रस के शोषण में अवरोध उत्पन्न होता है व शरीर रोगी तथा दुर्बल हो जाता है ।

दोपहर 3 से 5 -- इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से मूत्राशय में होती है। 2-4 घंटे पहले पिये पानी से इस समय मूत्र-त्याग की प्रवृति होती है।

शाम 5 से 7 -- इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से गुर्दे में होती है । इस समय हल्का भोजन कर लेना चाहिए । शाम को सूर्यास्त से 40 मिनट पहले भोजन कर लेना उत्तम रहेगा। सूर्यास्त के 10 मिनट पहले से 10 मिनट बाद तक (संध्याकाल) भोजन न करे। शाम को भोजन के तीन घंटे बाद दूध पी सकते है । देर रात को किया गया भोजन सुस्ती लाता है यह अनुभवगम्य है।

रात्री 7 से 9 -- इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से मस्तिष्क में होती है। इस समय मस्तिष्क विशेष रूप से सक्रिय रहता है । अतः प्रातःकाल के अलावा इस काल में पढ़ा हुआ पाठ जल्दी याद रह जाता है । आधुनिक अन्वेषण से भी इसकी पुष्टी हुई है।

रात्री 9 से 11 -- इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से रीढ़ की हड्डी में स्थित मेरुरज्जु में होती है। इस समय पीठ के बल या बायीं करवट लेकर विश्राम करने से मेरूरज्जु को प्राप्त शक्ति को ग्रहण करने में मदद मिलती है। इस समय की नींद सर्वाधिक विश्रांति प्रदान करती है । इस समय का जागरण शरीर व बुद्धि को थका देता है । यदि इस समय भोजन किया जाय तो वह सुबह तक जठर में पड़ा रहता है, पचता नहीं और उसके सड़ने से हानिकारक द्रव्य पैदा होते हैं जो अम्ल (एसिड) के साथ आँतों में जाने से रोग उत्पन्न करते हैं। इसलिए इस समय भोजन करना खतरनाक है।

रात्री 11 से 1 -- इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से पित्ताशय में होती है । इस समय का जागरण पित्त-विकार, अनिद्रा , नेत्ररोग उत्पन्न करता है व बुढ़ापा जल्दी लाता है । इस समय नई कोशिकाएं बनती है ।

रात्री 1 से 3 -- इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से लीवर में होती है । अन्न का सूक्ष्म पाचन करना यह यकृत का कार्य है। इस समय का जागरण यकृत (लीवर) व पाचन-तंत्र को बिगाड़ देता है । इस समय यदि जागते रहे तो शरीर नींद के वशीभूत होने लगता है, दृष्टि मंद होती है और शरीर की प्रतिक्रियाएं मंद होती हैं। अतः इस समय सड़क दुर्घटनाएँ अधिक होती हैं।

नोट :-ऋषियों व आयुर्वेदाचार्यों ने बिना भूख लगे भोजन करना वर्जित बताया है। अतः प्रातः एवं शाम के भोजन की मात्रा ऐसी रखे, जिससे ऊपर बताए भोजन के समय में खुलकर भूख लगे। जमीन पर कुछ बिछाकर सुखासन में बैठकर ही भोजन करें। इस आसन में मूलाधार चक्र सक्रिय होने से जठराग्नि प्रदीप्त रहती है। कुर्सी पर बैठकर भोजन करने में पाचनशक्ति कमजोर तथा खड़े होकर भोजन करने से तो बिल्कुल नहींवत् हो जाती है। इसलिए ʹबुफे डिनरʹ से बचना चाहिए।
पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का लाभ लेने हेतु सिर पूर्व या दक्षिण दिशा में करके ही सोयें, अन्यथा अनिद्रा जैसी तकलीफें होती हैं।

शरीर की जैविक घड़ी को ठीक ढंग से चलाने हेतु रात्रि को बत्ती बंद करके सोयें। इस संदर्भ में हुए शोध चौंकाने वाले हैं। देर रात तक कार्य या अध्ययन करने से और बत्ती चालू रख के सोने से जैविक घड़ी निष्क्रिय होकर भयंकर स्वास्थ्य-संबंधी हानियाँ होती हैं। अँधेरे में सोने से यह जैविक घड़ी ठीक ढंग से चलती है।

आजकल पाये जाने वाले अधिकांश रोगों का कारण अस्त-व्यस्त दिनचर्या व विपरीत आहार ही है। हम अपनी दिनचर्या शरीर की जैविक घड़ी के अनुरूप बनाये रखें तो शरीर के विभिन्न अंगों की सक्रियता का हमें अनायास ही लाभ।। मिलेगा। इस प्रकार थोड़ी-सी सजगता हमें स्वस्थ जीवन की प्राप्ति करा देगी।
सब सुखी और निरोगी हों !!

जीवन का एक रहस्य



🌸🌸जीवन का एक रहस्य .....🌸🌸

एक औरत बहुत महँगे कपड़ो में अपने मनोचिकित्सक के पास जाती है और उसे कहती है कि उसे लगता है कि उसका पूरा जीवन बेकार है, उसका कोई अर्थ नहीं है। वे उसकी खुशियाँ ढूँढने में मदद करें।
मनोचिकित्सक ने एक बूढ़ी औरत को बुलाया जो वहाँ साफ़-सफाई का काम करती थी और उस अमीर औरत से बोला - "मैं मैरी से तुम्हें यह बताने के लिए कहूँगा कि कैसे उसने अपने जीवन में खुशियाँ ढूँढी। मैं चाहता हूँ कि आप उसे ध्यान से सुनें।"
तब उस बूढ़ी औरत ने अपना झाड़ू नीचे रखा, कुर्सी पर बैठ गई और बताने लगी - "मेरे पति की मलेरिया से मृत्यु हो गई और उसके 3 महीने बाद ही मेरे बेटे की भी सड़क हादसेमें मौत हो गई। मेरे पास कोई नहीं था। मेरे जीवन में कुछ नहीं बचा था। मैं सो नहीं पाती थी, खा नहीं पाती थी, मैंने मुस्कुराना बंद कर दिया था।
मैं खुद का जीवन लेने की तरकीबें सोचने लगी थी। तब एक दिन, एक छोटा बिल्ली का बच्चा मेरे पीछे लग गया जब मैं काम से घर आ रही थी। बाहर बहुत ठंड थी इसलिए मैंने उस बच्चे को अंदर आने दिया। उस बिल्ली के बच्चे के लिए थोड़े से दूध का इंतजाम किया और वह सारी प्लेट सफाचट कर गया। फिर वह मेरे पैरों से लिपट गया और चाटने लगा।
उस दिन बहुत महीनों बाद मैं मुस्कुराई । तब मैंने सोचा अगर इस बिल्ली के बच्चे की सहायता करना मुझे ख़ुशी दे सकता है, तो हो सकता है दूसरों के लिए कुछ करके मुझे और भी ख़ुशी मिले। इसलिए अगले दिन मैं अपने पड़ोसी, जो कि बीमार था, उसके लिए कुछ बिस्किट्स बना कर ले गई।
हर दिन मैं कुछ नया और कुछ ऐसा करती थी जिससे दूसरों को ख़ुशी मिले और उन्हें खुश देख कर मुझे ख़ुशी मिलती थी। आज, मैं किसी को नहीं जानती जो मुझसे बेहतर खाता-पीता हो और चैन से सोता हो। मैंने खुशियाँ ढूँढी हैं, दूसरों को ख़ुशी देकर।
यह सब सुन कर वह अमीर औरत रोने लगी। उसके पास वह सब था जो वह पैसे से खरीद सकती थी पर उसने वह चीज खो दी थी जो पैसे से नहीं खरीदी जा सकती।
हमारा जीवन इस बात पर निर्भर नहीं करता कि हम कितने खुश हैं अपितु इस बात पर निर्भर करता है कि हमारी वजह से कितने लोग खुश हैं।
ख़ुशी मंजिल नहीं, यात्रा है..,वह कल नहीं, आज है..
निर्भरता नहीं, निर्णय है..,यह नहीं कि हम कौन है,

अपितु हमारे पास क्या है।🌸🌸🌸🌸

सत्य सनातन वैदिक धर्म प्रश्नोत्तरी



सत्य सनातन वैदिक धर्म प्रश्नोत्तरी
प्र.1 वेद किसे कहते है ?
उत्तर- ईश्वरीय ज्ञान की पुस्तक को वेद कहते है।
प्र.2 वेद-ज्ञान किसने दिया ?
उत्तर- ईश्वर ने दिया।
प्र.3 ईश्वर ने वेद-ज्ञान कब दिया ?
उत्तर- ईश्वर ने सृष्टि के आरंभ में वेद-ज्ञान दिया।
प्र.4 ईश्वर ने वेद ज्ञान क्यों दिया ?
उत्तर- मनुष्य-मात्र के कल्याण के लिए।
प्र.5 वेद कितने है ?
उत्तर- चार।
प्र.6 वेदों का ज्ञान ईश्वर ने किन को दिया ?
उत्तर- चार ऋषियों को।
प्र.7 वेदों का ज्ञान ईश्वर ने ऋषियों को कैसे दिया ?
उत्तर- समाधि की अवस्था में।
प्र.8 वेदों में कैसे ज्ञान है ?
उत्तर- सब सत्य विद्याओं का ज्ञान-विज्ञान।
प्र.9 वेद कौन-कौन से हैं और किस ऋषि द्वारा ज्ञान प्राप्त हुआ ?
उत्तर-
वेद------ऋषि ------विषय
ऋग्वेद ---अग्नि -----ज्ञान
यजुर्वेद ---वायु -------कर्म
सामवेद --आदित्य --उपासना
अथर्ववेद -अंगिरा ---विज्ञान
प्र.10 वेद पढ़ने का अधिकार किसको है ?
उत्तर- मनुष्य-मात्र को वेद पढ़ने का अधिकार है।
प्र.11 क्या वेदों में मूर्तिपूजा का विधान है ?
उत्तर- बिलकुल भी नहीं।
प्र.12 क्या वेदों में अवतारवाद का प्रमाण है ?
उत्तर- नहीं।
प्र.13 सबसे बड़ा वेद कौन-सा है ?
उत्तर- ऋग्वेद।
प्र.14 वेदों की रचना कब हुई ?
उत्तर- आज से लगभग 1 अरब 96 करोड़ वर्ष पूर्व।
प्र.15 वेद-ज्ञान के सहायक दर्शन-शास्त्र कितने हैं और उनके लेखकों का क्या नाम है ?
उत्तर- न्याय दर्शन गौतम मुनि
वैशेषिक दर्शन कणाद मुनि
योगदर्शन पतंजलि मुनि
मीमांसा दर्शन जैमिनी मुनि
सांख्य दर्शन कपिल मुनि
वेदांत दर्शन व्यास मुनि
प्र.16 शास्त्रों के विषय क्या है ?
उत्तर- आत्मा, परमात्मा, प्रकृति, जगत की उत्पत्ति, मुक्ति अर्थात सब प्रकार का भौतिक व आध्यात्मिक ज्ञान-विज्ञान आदि।
प्र.17 प्रामाणिक उपनिषदे कितनी है ?
उत्तर- केवल ग्यारह।
प्र.18 उपनिषदों के नाम बतावे ?
उत्तर- ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुंडक, माण्डूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, छंदोग्य, वृहदारण्यक और श्वेतश्वतर ।
प्र.19 उपनिषदों के विषय कहाँ से लिए गए है ?
उत्तर- वेदों से।

DALIT UPLIFTMENT WORK OF ARYA SAMAJ



PIONEERING DALIT UPLIFTMENT WORK OF ARYA SAMAJ INITIATED BY MAHARISHI DAYANAND SARASWATI AND ITS IMPACT ON SUBSEQUENT MOVEMENT OF DR.B.R. AMBEDKAR - THE DIFFERENCE IN APPROACH

Welfare of the downtrodden classes has been a priority programme of Arya Samaj - a progressive Vedic movement to preserve and propagate the Vedic knowledge in its prestine form. The general view that Dr. B.R. Ambedkar became a Buddhist only for reasons of its having a rational outlook needs to be given a second thought. If rationality was the only consideration, in that case other options like joining the fold of Arya Samaj or Sikhism were also open to Dr.Ambedkar. Arya Samaj having a rational outlook was actively engaged in the Dalit upliftment programme much before Dr.Ambedkar appeared on the scene. As would be evident from the following narrative, Arya Samaj movement also contributed in shaping Dr.Ambedkar's career since his student days.
Of course, Dr.Ambedkar was a prominent personality, a legal luminary and a literary figure. However, as far as Vedic studies are concerned, it seems that like many other contemporary writers he too based his comments primarily on common anarsha granthas, literature with several interpolations written mainly by medieval masters during India's period of decadence. His impressions are apparently not based upon study of texts free of interpolations representing the true Vedic tradition in a holistic manner. Had he also studied the rational arsha vedic exegesis and uninterpolated writings of the ancient sages perhaps his views like that of Swami Dayanand Saraswati would have been different and he would have found satisfactory explanations to certain riddles/enigmatic points/secrets of the symbolic Vedic language in our ancient texts.
Rationality is the basis of Vedic lore. As per Nirukta of Acharya Yaska, Logic has been described as one of the rishis - Tarkoo vai rishi. Manu Smriti(12-106) says Yasterkenanusandhatey sa dharma ved netra,i.e., one who investigates the truth with logic and reason he alone can comprehend the truth. There are hundreds of Vedic hymns where prayers have been made to God for medha budhi which is capable of rational thinking. Even in the Gayatri mantra a devotee prays for intellect which the Vedic people regard as basic for developing a rational outlook. In the Vaishishka Darshan(6.1.1), it is said that Vedic knowledge should be understood with reasoning and objectivity or else it will look absurd - Budhipurva vakyakritivrdey.
It is also a historical fact that the proper study of Vedas had fallen into disuse and misuse much before the advent of Jainism and Buddhism and clues to properly understand Vedic Samhitas almost remained sealed for centuries leading to animal sacrifices in Yajnas and other obnoxious practices. The ancient methodology as propounded in Brahman Granthas, Nirukta of Yaskacharya and some other texts to rationally interpret the Vedas had been forgotten. It was Maharishi Dayanand Saraswati (1824-1883) who in recent times revived that methodology and made a serious attempt to put Vedic studies in their right perspective. That is why Sri Aurobindo says "In the matter of Vedic interpretation, I am convinced that whatever may be the final interpretation, Dayananda will be honoured as the first discoverer of the right clues. Amidst the chaos and obscurity of old ignorance and age-long misunderstanding his was the eye of direct vision that pierced to the truth and fastened on that which was essential. He has found the keys of the doors that time had closed and rent asunder the seals of the imprisoned fountains." (Source: Bankim-Tilak-Dayananda by Sri Aurobindo, pub.by Sri Aurobindo Ashram, Pondicherry, Ist Ed.1940).
It is quite unlikely that a well read person like Dr.Ambedkar was not aware of the works of Swami Dayanand Saraswati and his rational views which had influenced even his sponsors i.e., Maharaja of Baroda and Maharaja of Kolhapur who supported his education. Dr.Kushal Dev Shastri in his book "Arya Samaj aur Dr.Ambedkar" writes that apart from Maharaja Sayaji Rao of Baroda Estate and Maharaja of Kolhapur- Rajrishi Sahuji who too had leanings towards Arya Samaj contributed financially for the education of Dr.B.R. Ambedkar and he was sent on a scholarship abroad for higher studies. Incidentally this happened when the educational and social services for upliftment of downtrodden classes in Baroda were being looked after by stalwarts like Pt.(Master) Atma Ram Amritsari an Activist of Arya Samaj who moved from Punjab to Baroda in 1908 to help Maharaja in his great mission. In removal of untouchability and upliftment of depressed classes, Pandit Atma Ram Amritsari, Inspector of Schools at Baroda initially faced lot of challenges and difficulties like many other Arya Samajists who despite all odds were engaged in similar missions in other parts of the country. Taking cue from the life and teachings of Swami Dayanand, Arya Samaj was quite active in raising the social and educational level of Dalits since 1885 especially in North India. So much so Mahashya Ram Chand Mahajan who was actively associated with removal of untouchability programme of Arya Samaj in Jammu region was severely beaten by Rajputs and he succumbed to his injuries resulting into his death on 20th June, 1923. In Sialkot Maghodar Sabha was formed in 1903 and Pandit Ganga Ram successfully carried on his reform programme and got a large number of meghas (considered to be low caste) admitted in Arya Gurukuls and other educational institutions. From 1903 onwards many dalitodhar/Achhutodhr sabhas were established at Sialkot, Lahore, Amritsar, Allahabad, Delhi, etc. which took up constructive programmes for the welfare of Dalits. In fact this word 'Dalit' was also coined for the first time by Arya Samaj as is apparent from names of various Sabhas like All India Shradhanand Dalitodhar Sabha which was established in 1921 and Dayanand Dalitodhar Sabha established in Lahore on 11 May, 1930. After his return from U.S.A., Dr.Ambedkar wrote to Pt.Atma Ram that due to his poor legal practice he was not in a position to immediately clear the educational loan taken from Maharaja Baroda. Panditji who had close contact with Dr.Ambedkar took up the matter with Maharaja and got the loan waived off completely. Many Dalit students of Pt.Atma Ram Amritsari in those days became Mechanical Engineers. Panditji's family members including his daughter Sushila Kumari remained closely associated with the work relating to dalit welfare.
There is no chance that all such massive dalit welfare programmes/removal of untouchability and other attempts made by Arya Samaj in breaking the birth based caste barriers could have escaped the attention of Dr.Ambedkar. It was especially, with the efforts of Shri Ghansham Singh Gupta, President, Madhya Pradesh Arya Pratinidhi Sabha, in 1937 an Act was passed for validation of Inter-caste marriages amongst Hindus. An important question ,therefore, arises here as to why Dr.Ambedkar did not join the rational Arya Samaj which repudiated 'caste' based on birth and his choice fell for Buddhism which in those days was hardly doing any ground work? Dr.Ambedkar has admitted in his book 'Annihilation of Caste' "I must admit that the Vedic theory of Varna as interpreted by Swami Dayanand and some others is a sensible and an inoffensive thing. It did not admit birth as a determining factor in fixing the place of an individual in society. It only recognized worth. The Mahatma's (Mahatma Gandhi) view of Varna not only makes nonsense of the Vedic Varna but it makes it an abominable thing. Varna and Caste are two very different concepts".
To my mind Dr.Ambedkar ignored Arya Samaj and embraced Buddhism because of his misconceptions and misgivings about the Vedic texts. He outrightly rejected the authority of Vedas and Shastras primarily because of the influence of the distorted writings of orthodoxy as well as the imperial scholars. Dr.Ambedkar writes "You must take the stand which Guru Nanak took. You must not only discard the Shastras, you must deny their authority, as did Buddha and Nanak. You must have the courage to tell the Hindus, that what is wrong with them is their religion-the religion which has produced in them this notion of the sacredness of caste." (Source: Annihilation of Caste, by Dr.B.R. Ambedkar, pub.by Anand Sahitya Sadan, Aligarh). Here I think Dr.Ambedkar was mistaken and he missed some of the important points . No doubt Guru Nanak was opposed to the evil practices prevalent in those days amongst Hindus, but his role was that of a good Doctor who does not pluck the eye in order to treat some eye ailment. The root of Adi Granth (Guru Granth Sahib) is in the Vedas and Guru Nanak says "Asankh Granth Mukh Ved Path" i..e, there are innumerable scriptures but the main amongst them are the Vedas. At another place he says Guru Nanak clearly says as the lamp is lit darkness is removed. Similarly by study of the Vedas, evil thoughts-paaps are destroyed - Diva baley andhera jai, Ved path mati papa khai(Adi Granth - page 791).
Similarly we find that Pt.Dharma Deva Vidya Martanda, an eminent scholar from Arya Samaj in his book "Mahatma Budha an Arya Reformer (1957 Ed.) while quoting some references from a Buddhist text, 'Sutta Nipata' has proved Mahatma Buddha's belief in the authority of the Vedas and says "It is generally believed that Buddha was opposed to the Vedas altogether and he revolted against their authority. But on an impartial study of the Buddhist scriptures, containing Buddha's discourses we find that there is no truth in this common belief. Certainly as we have shown above, he had no regard for those people who were well versed in the Vedas, but were not leading pure and noble lives according to the Vedic teachings." In a meeting with Pt.Dharam Devji, Dr.Ambedkar said that you have explained to me about the ancient Vedic religion like parents teaching a child, but to me it appears that mindset of the orthodoxy does not seem to be changing.
However, I think there was a fundamental difference between the approach of Dr.Ambedkar and Arya Samaj. Dr.Ambedkar wanted to completely annihilate the caste system while the majority of leaders of Arya Samaj were keen to revive the ancient Vedic System of Varna based on qualities and actions of an individual, i.e., the karmana system. 'Jat-Pat-Todak Mandal' of Lahore whose members were overwhelmingly Arya Samajists who played a very active role in removal of untouchability and breaking the caste barriers invited Dr.Ambedkar to preside over their conference in 1936. However, the Conference had to be cancelled because Dr.Ambedkar was not willing to expunge his derogatory remarks about the Vedic texts from his address. Mr.Sant Ram, Secretary of the above Mandal in a letter sent to the Harijan mentioned that in the supplementary portion of his written speech, Dr.Ambedkar also insisted that this was his last address as a Hindu. According to Dr.Mahendradas Thakur, Dr.Ambedkar had at one point made up his mind to join Arya Samaj along with persons of Dalit community, but due to proximity of Arya Samaj and Hindu Mahasabha, he instead decided to embrace Buddhism (Source: Arya Samaj aur Dr.Ambedkar by Dr.Kushal Dev Shastri, 2008 Ed.pub.by Shri Ghudmal Prahladkumar Arya Dharmarth Nyas, Hindon City, Raj).
( Y.K. Wadhwa )

डाकू का संकल्प



डाकू का संकल्प
आर्य मुसाफिर पंडित लेखराम लाहौर के पास एक गांव में आर्य समाज के एक समारोह में प्रवचन कर रहे थे। उन्होंने वैदिक धर्म और कर्म के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा, 'जो भी शुभ या अशुभ कर्म मनुष्य करता है, उसका फल उसे अवश्य मिलता है। चोरी, हत्या, हिंसा आदि पाप कर्म करने वालों को किए का दंड अवश्य भोगना पड़ता है। कोई भी उसे बचा नहीं सकता।'
पंडित जी के प्रभावशाली प्रवचन को सुनने वालों में उस क्षेत्र का कुख्यात अपराधी डाकू मुगला भी था। पंडित जी की इस चेतावनी ने उसका हृदय झकझोर डाला। मुगला ने प्रवचन के बाद उन्हें प्रणाम किया और बोला, 'मैं आपसे एकांत में कुछ बातें करना चाहता हूं। आप कहां ठहरे हुए हैं?' पंडित जी ने बताया, 'आर्य समाज मंदिर में ठहरा हुआ हूं। वहां आकर मिल सकते हो।'
मुगला रात को पंडित जी के बताए हुए पते पर पहुंचा। वहां उपस्थित लोग उसे देखते ही कांपने लगे। वे एक-एक कर खिसकने लगे। पर इन सबसे अविचलित मुगला ने श्रद्धापूर्वक पंडित जी के चरण स्पर्श किए और कहा,'महाराज, मैं वर्षों से डाके डालता रहा हूं। कई हत्याएं कर चुका हूं। आपने प्रवचन में कहा कि हर आदमी को अपने पाप कर्म का फल भोगना ही पड़ता है। मुझे अपने पापों की माफी का रास्ता दिखाइए।'
पंडित जी ने समझाया, 'यदि अपराध करना आज से ही छोड़ दो, लोगों की सेवा, हर मौके पर उनकी सहायता करने और बाकी का जीवन भगवान की उपासना में लगाने का संकल्प ले लो, तो तुम अपने पापों से मुक्ति पा सकते हो।' पंडित जी की बात मुगला को समझ में आ गई। उसने उसी समय पंडित लेखराम जी के बताए मार्ग पर चलने का दृढ़ संकल्प ले लिया। कुछ ही दिनों में सत्संग ने उसे अपराधी की जगह भगत और भले आदमी के रूप में ख्याति दिला दी।

विश्व के पुस्तकालयों में सबसे प्राचीन ग्रंथ वेद है



विश्व के पुस्तकालयों में सबसे प्राचीन ग्रंथ वेद है । वैदिक परम्परा के अनुसार आज से लगभग १ अरब , ९६ करोड़ , ८ लाख , ५३ हज़ार पूर्व जब इस पृथ्वी पर मनुष्य की सर्वप्रथम उत्पत्ति हुई तब ईश्वर ने चार ऋषियों अग्नि ,वायु , आदित्य और अंगिरा को क्रमशः ऋग्वेद , यजुर्वेद , सामवेद तथा अथर्ववेद का ज्ञान प्रदान किया । इनहि ऋषियों ने अन्य मनुष्यों को इन वेदों का ज्ञान दिया और तब से आज तक गुरु परम्परा से इन वेदों का आदान-प्रदान चलता चला आ रहा है । बहुत लम्बे काल तब वेद श्रवण द्वारा ही ग्रहण किए जाते रहे इस कारण इनका एक नाम श्रुतिभी है ; बाद में इन्हें पुस्तक रूप में भी लिख लिया गया ।
ऋग्वेद का मुख्य विषय पदार्थज्ञानहै । अर्थात इसमें मुख्य रूप से संसार में विद्यमान पदार्थो का स्वरूप बताया गया है । यजुर्वेद में कर्मों के अनुष्ठान को , सामवेद में ईश्वर की ’भक्ति उपासना’ के स्वरूप को तथा अथर्ववेद में विभिन्न प्रकार के ‘विज्ञान’ को मुख्य रूप से बताया गया है । ऋग्वेद के मंत्रो की संख्या १०५५२ , यजुर्वेद की १९७५ , सामवेद की १८७५ तथा अथर्ववेद की ५९७७ है , चारों वेदों में कुल २०३७९ मंत्र है ।
इन वेदों का एक-एक उपवेद भी है ।
ऋग्वेद के उपवेद का नाम ‘ आयुर्वेद ’है , जिसमें स्वास्थ्य , स्वस्थ रहने के उपाय , रोग , रोगों के कारण ,औषधियों तथा चिकित्सा का मुख्य रूप से वर्णन किया गया है ।
यजुर्वेद के उपवेद का नाम ‘ धनुर्वेद ‘है , जिसमे सेना , हथियार , युद्ध काल के विषय का वर्णन है ।
सामवेद के उपवेद का नाम ‘ गन्धर्ववेद ‘है , जिसमें गायन ,वादन , नर्तन आदि विषयों का वर्णन किया गया है ।
अथर्ववेद के उपवेद का नाम ‘ अर्थवेद ‘है जिसमे व्यापार , अर्थव्यवस्था आदि विषयों का वर्णन है ।
ऋषियों ने वेदों के भाष्य व्याख्या रूप में सर्वप्रथम जिन ग्रन्थों की रचना की उन ग्रंथो को ‘ ब्राह्मण ग्रंथ ‘ कहते है , जो ऋग्वेद का ऐतरेय , यजुर्वेद का शतपथ , सामवेद का ताण्ड्यतथा अथर्ववेद का गोपथ नाम से प्रसिद्ध है । जिन ग्रंथो में ऋषियों ने वेदों में वर्णित ब्रह्मविद्या से संबंधित आध्यात्मिक तत्वों यथा ब्रह्म , जीव , मन , संस्कार , जप , स्वाध्याय , तपस्या , ध्यान , समाधि आदि विषयों का आलंकारिक कथाओं के साथ सरल रूप से वर्णन किया है । उनका नाम ‘ उपनिषद ‘ है । इन उपनिषदों में ईशोपनिषद् आदि १० उपनिषदें प्रमुख है ।
ऋषियों ने जिन ग्रंथो में वेदों के दार्शनिक तत्वों की विस्तार से एवं शंका समाधानपूर्वक विवेचना की है , उनका नाम ‘उपांग’ या दर्शनशास्त्रहै ।
ये संख्या में ६ है , जिनके नाम मीमांसा,वेदान्त,न्याय, वैशेषिक, सांख्य और योग है ।
जैमिनि ऋषिकृत मीमांसा-दर्शन में धर्म , कर्म यज्ञादि का वर्णन है ,
व्यास ऋषिकृत वेदान्त-दर्शन में ब्रह्म (ईश्वर) का वर्णन है ,
गौतम ऋषिकृत न्याय-दर्शन मे तर्क , प्रमाण , व्यवहार व मुक्ति का वर्णन है ,
कणाद ऋषिकृत वैशेषिक-दर्शन मे ज्ञान-विज्ञान का वर्णन है ,
कपिल ऋषिकृत सांख्य-दर्शन मे प्रकृति , पुरुष (=ईश्वर व जीव ) का वर्णन है ,
पतंजलि ऋषिकृत योग-दर्शन में योग-साधना , ध्यान , समाधि आदि का वर्णन है ।
वेद मंत्रो के गंभीर व सूक्ष्म अर्थो को स्पष्टता से समझने के लिए ऋषियों ने ६ अंगों की रचना की , जिन्हें ‘वेदांग’ कहा जाता है ।
ये हैं शिक्षा , कल्प , व्याकरण , निरुक्त ,छन्द तथा ज्योतिष ।
शिक्षा ग्रंथ में संस्कृत भाषा के अक्षरों का वर्णन , उनकी संख्या , प्रकार ,उच्चारण-स्थान –प्रयत्न आदि के उल्लेख सहित किया है ।
कल्प ग्रंथ में व्यवहार,सुनीति,धर्माचार आदि बातों का वर्णन है ।
व्याकरण ग्रंथ में शब्दों की रचना , धातु , प्रत्यय तथा कोन-सा –शब्द किन –किन अर्थों मे प्रयुक्त होता है , इन बातों का उल्लेख है ,
निरुक्त ग्रंथ में वेद मंत्रो के शब्दों का अर्थ किस विधि से किया जाए , इन बातों का निर्देश किया गया है ।
छन्द ग्रंथ में श्लोकों की रचना तथा गान कला का वर्णन किया है ।
ज्योतिष ग्रंथ में गणित आदि विद्याओं तथा भूगोल-खगोल की स्थिति-गति का वर्णन है ।
इनके अतिरिक्त वैदिक साहित्य के अंतर्गत ऋषियों ने ‘ स्मृतिग्रंथ‘ ‘आरण्यक ग्रंथ’ ‘सूत्रग्रंथ’ आदि भी बनाये थे । ऋषियों ने इन ग्रंथो की रचना मानव मात्र को कर्तव्य-अकर्तव्य का बोध कराने के लिए की थी । इन में पारिवारिक , सामाजिक ,धार्मिक तथा राजनैतिक नियमों का विधान है । समय-समय पर इनमें मिलावट होती रही है , वर्तमान में उपलब्ध ‘मनुस्मृति’ में भी अनेक मिलावट है , जिसे वैदिक विद्वानों ने ढूँढकर पृथक भी किया है ।
वैदिक धर्म से संबंधित , आरण्यक , प्रातिशाख्य , सूत्र ग्रंथ , पुराण , महाभारत आदि अनेक ग्रंथ भी उपलब्ध हैं , किन्तु वे मिलावट आदि अनेक प्रकार के दोषों से युक्त होने के कारण पूर्व प्रामाणिक नहीं है ।
आभार:- आचार्य ज्ञानेश्वरार्य , दार्शनिक निबंध

जेहाद से निपटने का मन्त्र



जेहाद से निपटने का मन्त्र

मुंशी प्रेमचंद

पंडित लीलाधर चौबे की जबान में जादू था। जिस वक्त वह मंच पर खड़े हो कर अपनी वाणी की सुधावृष्टि करने लगते थे; श्रोताओं की आत्माएँ तृप्त हो जाती थीं, लोगों पर अनुराग का नशा छा जाता था।

लेकिन जाति के उपासकों का ऐसा सौभाग्य कहाँ कि शांति- निवास का आनन्द उठा सकें। उनका तो जन्म ही मारे-मारे फिरने के लिए होता है। खबर आयी कि मद्रास-प्रांत में तबलीग वालों ने तूफान मचा रखा है। हिन्दुओं के गाँव के गाँव मुसलमान होते जाते हैं। मुल्लाओं ने बड़े जोश से तबलीग का काम शुरू किया है; अगर हिन्दू-सभा ने इस प्रवाह को रोकने की आयोजना न की, तो सारा प्रांत हिन्दुओं से शून्य हो जायगा , किसी शिखाधारी की सूरत तक न नजर आयेगी। हिन्दू-सभा में खलबली मच गयी। तुरन्त एक विशेष अधिवेशन हुआ और नेताओं के सामने यह समस्या उपस्थित की गयी।
बहुत सोच-विचार के बाद निश्चय हुआ कि चौबे जी पर इस कार्य का भार रखा जाए। उनसे प्रार्थना की जाए कि वह तुरंत मद्रास चले जाएें, और धर्म-विमुख बंधुओं का उद्धार करें। कहने ही की देर थी। चौबे जी तो हिंदू-जाति की सेवा के लिए अपने को अर्पण ही कर चुके थे; पर्वत-यात्रा का विचार रोक दिया, और मद्रास जाने को तैयार हो गये। हिन्दू-सभा के मंत्री ने आँखों में आँसू भर कर उनसे विनय की कि महाराज, यह बीड़ा आप ही उठा सकते हैं। आप ही को परमात्मा ने इतनी सामर्थ्य दी है। आपके सिवा ऐसा कोई दूसरा मनुष्य भारतवर्ष में नहीं है, जो इस घोर विपत्ति में काम आये। जाति की दीन-हीन दशा पर दया कीजिए। चौबे जी इस प्रार्थना को अस्वीकार न कर सके।

अछूतों की एक बस्ती के समीप, सेवक-दल का कैम्प गैस के प्रकाश से जगमगा रहा था। कई हजार आदमियों का जमाव था, जिनमें अधिकांश अछूत ही थे। उनके लिए अलग टाट बिछा दिये गये थे। ऊँचे वर्ण के हिंदू कालीनों पर बैठे हुए थे। पंडित लीलाधर का धुआँधार व्याख्यान हो रहा था , तुम उन्हीं ऋषियों की संतान हो, जो आकाश के नीचे एक नयी सृष्टि की रचना कर सकते थे ! जिनके न्याय, बुद्धि और विचार-शक्ति के सामने आज सारा संसार सिर झुका रहा है।

सहसा एक बूढ़े अछूत ने उठ कर पूछा , हम लोग भी उन्हीं ऋषियों की संतान हैं ? लीलाधर , निस्संदेह ! तुम्हारी धामनियों में भी उन्हीं ऋषियों का रक्त दौड़ रहा है और यद्यपि आज का निर्दयी, कठोर, विचारहीन और संकुचित हिंदू-समाज तुम्हें अवहेलना की दृष्टि से देख रहा है; तथापि तुम किसी हिन्दू से नीच नहीं हो, चाहे वह अपने को कितना ही ऊँचा समझता हो। बूढ़ा , तुम्हारी सभा हम लोगों की सुधि क्यों नहीं लेती ?

लीलाधर , हिंदू-सभा का जन्म अभी थोड़े ही दिन हुए हुआ है, और इस अल्पकाल में उसने जितने काम किये हैं, उस पर उसे अभिमान हो सकता है। हिंदू-जाति शताब्दियों के बाद गहरी नींद से चौंकी है, और अब वह समय निकट है, जब भारतवर्ष में कोई हिंदू किसी हिंदू को नीच न समझेगा, जब वे सब एक दूसरे को भाई समझेंगे। श्रीरामचन्द्र ने निषाद को छाती से लगाया था, शबरी के जूठे बेर खाये थे... बूढ़ा , आप जब इन्हीं महात्माओं की संतान हैं, तो फिर ऊँच-नीच में क्यों इतना भेद मानते हैं ? लीलाधर , इसलिए कि हम पतित हो गये हैं , अज्ञान में पड़कर उन महात्माओं को भूल गये हैं। बूढ़ा , अब तो आपकी निद्रा टूटी है, हमारे साथ भोजन करोगे ?

लीलाधर , मुझे कोई आपत्ति नहीं है।

बूढ़ा , मेरे लड़के से अपनी कन्या का विवाह कीजिएगा ?

लीलाधर , जब तक तुम्हारे जन्म-संस्कार न बदल जाएँ, जब तक तुम्हारे आहार-व्यवहार में परिवर्तन न हो जाए, हम तुमसे विवाह का सम्बन्ध नहीं कर सकते, मांस खाना छोड़ो, मदिरा पीना छोड़ो, शिक्षा ग्रहण करो, तभी तुम उच्च-वर्ण के हिंदुओं में मिल सकते हो।

बूढ़ा , हम कितने ही ऐसे कुलीन ब्राह्मणों को जानते हैं, जो रात-दिन नशे में डूबे रहते हैं, मांस के बिना कौर नहीं उठाते; और कितने ही ऐसे हैं, जो एक अक्षर भी नहीं पढ़े हैं; पर आपको उनके साथ भोजन करते देखता हूँ। उनसे विवाह-स्म्बन्ध करने में आपको कदाचित् इनकार न होगा। जब आप खुद अज्ञान में पड़े हुए हैं, तो हमारा उद्धार कैसे कर सकते हैं ? आपका हृदय अभी तक अभिमान से भरा हुआ है। जाइए, अभी कुछ दिन और अपनी आत्मा का सुधार कीजिए। हमारा उद्धार आपके किये न होगा। हिंदू-समाज में रह कर हमारे माथे से नीचता का कलंक न मिटेगा। हम कितने ही विद्वान्, कितने ही आचारवान् हो जाएँ, आप हमें यों ही नीच समझते रहेंगे। हिंदुओं की आत्मा मर गयी है, और उसका स्थान अहंकार ने ले लिया है ! हम अब देवता की शरण जा रहे हैं, जिनके माननेवाले हमसे गले मिलने को आज ही तैयार हैं। वे यह नहीं कहते कि तुम अपने संस्कार बदल कर आओ। हम अच्छे हैं या बुरे, वे इसी दशा में हमें अपने पास बुला रहे हैं। आप अगर ऊँचे हैं, तो ऊँचे बने रहिए। हमें उड़ना न पड़ेगा। लीलाधर , एक ऋषि-संतान के मुँह से ऐसी बातें सुन कर मुझे आश्चर्य हो रहा है। वर्ण-भेद तो ऋषियों ही का किया हुआ है। उसे तुम कैसे मिटा सकते हो ?

बूढ़ा , ऋषियों को मत बदनाम कीजिए। यह सब पाखंड आप लोगों का रचा हुआ है। आप कहते हैं , तुम मदिरा पीते हो; लेकिन आप मदिरा पीने वालों की जूतियाँ चाटते हैं। आप हमसे मांस खाने के कारण घिनाते हैं; लेकिन आप गो-मांस खानेवालों के सामने नाक रगड़ते हैं। इसलिए न कि वे आप से बलवान् हैं ! हम भी आज राजा हो जाएँ, तो आप हमारे सामने हाथ बाँध खड़े होंगे। आपके धर्म में वही ऊँचा है, जो बलवान् है; वही नीच है, जो निर्बल है। यही आपका धर्म है ? यह कह कर बूढ़ा वहाँ से चला गया और उसके साथ ही और लोग भी उठ खड़े हुए। केवल चौबे जी और उनके दलवाले मंच पर रह गये, मानो मंचगान समाप्त हो जाने के बाद उसकी प्रतिधवनि वायु में गूँज रही हो।

👉 तबलीगवालों ने जब से चौबे जी के आने की खबर सुनी थी, इस फिक्र में थे कि किसी उपाय से इन सबको यहाँ से दूर करना चाहिए। चौबे जी का नाम दूर-दूर तक प्रसिद्ध था। जानते थे, यह यहाँ जम गया, तो हमारी सारी की-करायी मेहनत व्यर्थ हो जायगी। इसके कदम यहाँ जमने न पायें। मुल्लाओं ने उपाय सोचना शुरू किया। बहुत वाद-विवाद, हुज्जत और दलील के बाद निश्चय हुआ कि इस काफिर को कत्ल कर दिया जाए। आदमियों की क्या कमी ? उसके लिए तो जन्नत का दरवाजा खुल जायगा, हूरें उसकी बलाएँ लेंगी, फरिश्ते उसके कदमों की खाक़ का सुरमा बनायेंगे, रसूल उसके सर पर बरकत का हाथ रखेंगे, खुदाबन्द-करीम उसे सीने स लगाएंगे और कहेंगे, तू मेरा प्यारा दोस्त है। दो हट्टे - कट्टे जवानों ने तुरन्त बीड़ा उठा लिया।👈
➡रात के दस बज गये थे। हिन्दू-सभा के कैंप में सन्नाटा था। केवल चौबे जी अपनी रावटी में बैठे हिन्दू-सभा के मंत्री को पत्र लिख रहे थे , यहाँ सबसे बड़ी आवश्यकता धन की है। रुपया, रुपया, रुपया ! जितना भेज सकें, भेजिए। डेपुटेशन भेज कर वसूल कीजिए, मोटे महाजनों की जेब टटोलिए, भिक्षा माँगिए। बिना धन के इन अभागों का उद्धार न होगा। जब तक कोई पाठशाला न खुले, कोई चिकित्सालय न स्थापित हो, कोई वाचनालय न हो, इन्हें कैसे विश्वास आयेगा कि हिन्दू-सभा उनकी हितचिंतक है। तबलीगवाले जितना खर्च कर रहे हैं, उसका आधा भी मुझे मिल जाए, तो हिंदू-धर्म की पताका फहराने लगे। केवल व्याख्यानों से काम न चलेगा। असीसों से कोई जिंदा नहीं रहता
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सहसा किसी की आहट पा कर वह चौंक पड़े। आँखें ऊपर उठायीं तो देखा, दो आदमी सामने खड़े हैं। पंडित जी ने शंकित हो कर पूछा , तुम
कौन हो ? क्या काम है ?

उत्तर मिला , हम इजराईल के फरिश्ते हैं। तुम्हारी रूह कब्ज करने आये हैं। इजराईल ने तुम्हें याद किया है।

लाठियों का वार पड़ा। पंडित जी मूर्च्छित हो कर गिर पड़े। शत्रुओं ने समीप आ कर देखा, जीवन का कोई लक्षण न था। समझ गये, काम तमाम हो गया। लूटने का विचार न था; पर जब कोई पूछनेवाला न हो, तो हाथ बढ़ाने में क्या हर्ज ? जो कुछ हाथ लगा, ले-दे कर चलते बने।👈
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प्रात:काल बूढ़ा भी उधर से निकला, तो सन्नाटा छाया हुआ था, न आदमी, न आदमजाद। छौलदारियाँ भी गायब ! चकराया, यह माजरा क्या है ? रात ही भर में अलादीन के महल की तरह सब कुछ गायब हो गया। उन महात्माओं में से एक भी नजर नहीं आता, जो प्रात:काल मोहनभोग उड़ाते और संध्या समय भंग घोटते दिखायी देते थे। जरा और समीप जा कर पंडित लीलाधर की रावटी में झाँका, तो कलेजा सन्न से हो गया ! पंडित जी जमीन पर मुर्दे की तरह पड़े हुए थे। मुँह पर मक्खियाँ भिनक रही थीं। सिर के बालों में रक्त ऐसा जम गया था, जैसे किसी चित्रकार के ब्रश में रंग। सारे कपड़े लहूलुहान हो रहे थे। समझ गया, पंडित जी के साथियों ने उन्हें मार कर अपनी राह ली। सहसा पंडित जी के मुँह से कराहने की आवाज निकली। अभी जान बाकी थी। बूढ़ा तुरन्त दौड़ा हुआ गाँव में आ गया और कई आदमियों को लाकर पंडित जी को अपने घर उठवा ले गया। मरहम-पट्टी होने लगी। बूढ़ा दिन के दिन और रात की रात पंडित जी के पास बैठा रहता। उसके घरवाले उनकी शुश्रूषा में लगे रहते। गाँव वाले भी यथाशक्ति सहायता करते। इस बेचारे का यहाँ कौन अपना बैठा हुआ है ? अपने हैं तो हम, बेगाने हैं तो हम। हमारे ही उद्धार के लिए तो बेचारा यहाँ आया था, नहीं तो यहाँ उसे क्यों आना था ? कई बार पंडित जी अपने घर पर बीमार पड़ चुके थे, पर उनके घरवालों ने इतनी तन्मयता से उनकी तीमारदारी न की थी। सारा घर, और घर ही नहीं; सारा गाँव उनका गुलाम बना हुआ था। अतिथि-सेवा उनके धर्म का एक अंग था। सभ्य-स्वार्थ ने अभी उस भाव का गला नहीं घोंटा था। साँप का मंत्र जाननेवाला देहाती अब भी माघ-पूस की अँधोरी मेघाच्छन्न रात्रि में मंत्र झाड़ने के लिए दस-पाँच कोस पैदल दौड़ता हुआ चला जाता है। उसे डबल फीस और सवारी की जरूरत नहीं होती। बूढ़ा मल-मूत्रा तक अपने हाथों उठा कर फेंकता, पंडित जी की घुड़कियाँ सुनता, सारे गाँव से दूध माँग कर उन्हें पिलाता। पर उसकी त्योरियाँ

कभी मैली न होतीं। अगर उसके कहीं चले जाने पर घरवाले लापरवाही करते तो आ कर सबको डॉटता।
👉👉👉👉👉👉👉

महीने भर के बाद पंडित जी चलने-फिरने लगे और अब उन्हें ज्ञात हुआ कि इन लोगों ने मेरे साथ कितना उपकार किया है। इन्हीं लोगों का काम था कि मुझे मौत के मुँह से निकाला, नहीं तो मरने में क्या कसर रह गयी थी ? उन्हें अनुभव हुआ कि मैं जिन लोगों को नीच समझता था, और जिनके उद्धार का बीड़ा उठा कर आया था वे मुझसे कहीं ऊँचे हैं। मैं इस परिस्थिति में कदाचित् रोगी को किसी अस्पताल में भेज कर ही अपनी कर्त्तव्य -निष्ठा पर गर्व करता; समझता मैंने दधीचि और हरिश्चन्द्र का मुख उज्ज्वल कर दिया। उनके रोएँ-रोएँ से इन देव-तुल्य प्राणियों के प्रति आशीर्वाद निकलने लगा। तीन महीने गुजर गये। न तो हिन्दू-सभा ने पंडित जी की खबर ली और न घरवालों ने। सभा के मुख-पत्र में उनकी मृत्यु पर आँसू बहाये गये, उनके कामों की प्रशंसा की गयी, और उनका स्मारक बनाने के लिए चन्दा खोल दिया गया। घरवाले भी रो-पीट कर बैठ रहे। उधर पंडित जी दूध और घी खा कर चौक-चौबंद हो गये। चेहरे पर खून की सुर्खी दौड़ गयी, देह भर आयी। देहात के जलवायु ने वह काम कर दिखाया जो कभी मलाई और मक्खन से न हुआ था। पहले की तरह तैयार तो वह न हुए; पर फुर्ती और चुस्ती दुगुनी हो गयी। मोटाई का आलस्य अब नाम को भी न था। उनमें एक नये जीवन का संचार हो गया।
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जाड़ा शुरू हो गया था। पंडित जी घर लौटने की तैयारियाँ कर रहे थे। इतने में प्लेग का आक्रमण हुआ, और गाँव के तीन आदमी बीमार हो गये। बूढ़ा चौधरी भी उन्हीं में था। घरवाले इन रोगियों को छोड़कर भाग खड़े हुए। वहाँ का दस्तूर था कि जिन बीमारियों को वे लोग देवी का कोप समझते थे, उनके रोगियों को छोड़ कर चले जाते थे। उन्हें बचाना देवताओं वैर मोल लेना था, और देवताओं से वैर कर के कहाँ जाते ? जिस प्राणी को देवता ने चुन लिया, उसे भला वे उसके हाथों से छीनने का साहस कैसे करते ? पंडित जी को भी लोगों ने साथ ले जाना चाहा; किंतु पंडित जी न गये। उन्होंने गाँव में रह कर रोगियों की रक्षा करने का निश्चय किया। जिस प्राणी ने उन्हें मौत के पंजे से छुड़ाया था; उसे इस दशा में छोड़कर वह कैसे जाते ? उपकार ने उनकी आत्मा को जगा दिया था। बूढ़े चौधरी ने तीसरे दिन होश आने पर जब उन्हें अपने पास खड़े देखा, तो बोला , महाराज, तुम यहाँ क्यों आ गये ? मेरे लिए देवताओं का हुक्म आ गया है। अब मैं किसी तरह नहीं रुक सकता। तुम क्यों अपनी जान जोखिम में डालते हो ? मुझ पर दया करो, चले जाओ। लेकिन पंडित जी पर कोई असर न हुआ। वह बारी-बारी से तीनों रोगियों के पास जाते और कभी उनकी गिल्टियाँ सेंकते, कभी उन्हें पुराणों की कथाएँ सुनाते। घरों में नाज, बरतन आदि सब ज्यों के त्यों रखे हुए थे। पंडित जी पथ्य बना कर रोगियों को खिलाते। रात को जब रोगी सो जाते और सारा गाँव भाँय-भाँय करने लगता तो पंडित जी को भयंकर जंतु दिखायी देते। उनके कलेजे में धड़कन होने लगती; लेकिन वहाँ से टलने का नाम न लेते। उन्होंने निश्चय कर लिया था कि या तो इन लोगों को बचा ही लूँगा या इन पर अपने को बलिदान ही कर दूँगा। जब तीन दिन सेंक-बाँध करने पर भी रोगियों की हालत न सँभली, तो पंडित जी को बड़ी चिंता हुई। शहर वहाँ से बीस मील पर था। रेल का कहीं पता नहीं, रास्ता बीहड़ और सवारी कोई नहीं। इधर यह भय कि अकेले रोगियों की न जाने क्या दशा हो। बेचारे बड़े संकट में पड़े। अंत को चौथे दिन, पहर रात रहे, वह अकेले शहर को चल दिये और दस बजते-बजते वहाँ जा पहुँचे। अस्पताल से दवा लेने में बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ा। गँवारों से अस्पतालवाले दवाओं का मनमाना दाम वसूल करते थे। पंडित जी को मुफ्त क्यों देने लगे ? डाक्टर ने मुंशी से कहा , दवा तैयार नहीं है। पंडित जी ने गिड़गिड़ा कर कहा , सरकार, बड़ी दूर से आया हूँ। कई आदमी बीमार पड़े हैं। दवा न मिलेगी, तो सब मर जाएँगे।
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मुंशी ने बिगड़ कर कहा , क्यों सिर खाये जाते हो ? कह तो दिया, दवा तैयार नहीं है, न तो इतनी जल्दी हो ही सकती है। पंडित जी अत्यंत दीनभाव से बोले , सरकार, ब्राह्मण हूँ; आपके बाल-बच्चों को भगवान चिरंजीवी करें, दया कीजिए। आपका अकबाल चमकता रहे।

रिश्वती कर्मचारी में दया कहाँ ? वे तो रुपये के गुलाम हैं। ज्यों-ज्यों पंडित जी उसकी खुशामद करते थे, वह और भी झल्लाता था। अपने जीवन में पंडित जी ने कभी इतनी दीनता न प्रकट की थी। उनके पास इस वक्त एक धेला भी न था; अगर वह जानते कि दवा मिलने में इतनी दिक्कत होगी, तो गाँववालों से ही कुछ माँग-जाँच कर लाये होते। बेचारे हतबुद्धि-से खड़े सोच रहे थे कि अब क्या करना चाहिए ? सहसा डाक्टर साहब स्वयं बँगले से निकल आये। पंडित जी लपक कर उनके पैरों पर गिर पड़े और करुण स्वर में बोले , दीनबंधु, मेरे घर के तीन आदमी ताऊन में पड़े हुए हैं। बड़ा गरीब हूँ, सरकार, कोई दवा मिले। डाक्टर साहब के पास ऐसे गरीब लोग नित्य आया करते थे। उनके चरण पर किसी का गिर पड़ना, उनके सामने पड़े हुएर् आत्तानाद करना, उनके लिए कुछ नयी बातें न थीं। अगर इस तरह वह दया करने लगते तो दवा ही भर को होते; यह ठाट-बाट कहाँ से निभता ? मगर दिल के चाहे कितने ही बुरे हों, बातें मीठी-मीठी करते थे। पैर हटा कर बोले , रोगी कहाँ है ?

पंडित जी – सरकार, वे तो घर पर हैं। इतनी दूर कैसे लाता ?

डाक्टर –रोगी घर, और तुम दवा लेने आया हो ? कितने मजे की बात
है ! रोगी को देखे बिना कैसे दवा दे सकता है ?

पंडित जी को अपनी भूल मालूम हुई। वास्तव में बिना रोगी को देखे रोग की पहचान कैसे हो सकती है; लेकिन तीन-तीन रोगियों को इतनी दूर लाना आसान न था। अगर गाँववाले उनकी सहायता करते तो डोलियों का प्रबंध हो सकता था; पर वहाँ तो सब कुछ अपने ही बूते पर करना था, गाँववालों से इसमें सहायता मिलने की कोई आशा न थी। सहायता की कौन कहे, वे तो उनके शत्रु हो रहे थे। उन्हें भय होता था कि यह दुष्ट देवताओं से वैर बढ़ा कर हम लोगों पर न-जाने क्या विपत्ति लायेगा। अगर कोई दूसरा आदमी होता, तो वह उसे कब का मार चुके होते। पंडित जी से उन्हें प्रेम हो गया था, इसलिए छोड़ दिया था। यह जवाब सुन कर पंडित जी को कुछ बोलने का साहस तो न था; पर कलेजा मजबूत करके बोले , सरकार, अब कुछ नहीं हो सकता ?

डाक्टर –अस्पताल से दवा नहीं मिल सकती। हम अपने पास से, दाम
लेकर दवा दे सकते हैं।

पंडित जी –यह दवा कितने की होगी, सरकार।

डाक्टर साहब ने दवा का दाम 10 रु. बतलाया, और यह भी कहा कि इस दवा से जितना लाभ होगा, उतना अस्पताल की दवा से नहीं हो सकता। बोले , वहाँ पुरानी दवाई रखा रहता है। गरीब लोग आता है; दवाई ले जाता है; जिसको जीना होता है, जीता है; जिसे मरना होता है, मरता है; हमसे कुछ मतलब नहीं। हम तुमको जो दवा देगा, वह सच्चा दवा होगा। दस रुपये ! , इस समय पंडित जी को दस रुपये दस लाख जान पड़े।

👉भिक्षा के सिवा और कोई उपाय न था। वह बाजार में जाकर एक दूकान के सामने खड़े हो गये; पर कुछ माँगने की हिम्मत न पड़ी !

दूकानदार ने पूछा , क्या लोगे ?

पंडित जी बोले , चावल का क्या भाव है ?

मगर दूसरी दूकान पर पहुँच कर वह ज्यादा सावधन हो गये। सेठ जी गद्दी पर बैठे हुए थे। पंडित जी आ कर उनके सामने खड़े हो गये और गीता का एक श्लोक पढ़ सुनाया। उनका शुद्ध उच्चारण और मधुर वाणी सुन कर सेठ जी चकित हो गये, पूछा , कहाँ स्थान है ?

पंडित जी –काशी से आ रहा हूँ।

यह कह कर पंडित जी ने सेठ जी को धर्म के दसों लक्षण बतलाये और श्लोक की ऐसी अच्छी व्याख्या की कि वह मुग्ध हो गये। बोले , महाराज, आज चल कर मेरे स्थान को पवित्र कीजिए। कोई स्वार्थी आदमी होता, तो इस प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार कर लेता; लेकिन पंडित जी को लौटने की पड़ी थी। बोले , नहीं सेठ जी, मुझे अवकाश नहीं है।

सेठ–महाराज, आपको हमारी इतनी खातिरी करनी पड़ेगी।

पंडित जी जब किसी तरह ठहरने पर राजी न हुए, तो सेठ जी ने उदास होकर कहा , फिर हम आपकी क्या सेवा करें ? कुछ आज्ञा दीजिए। आपकी वाणी से तो तृप्ति नहीं हुई। फिर कभी इधर आना हो, तो अवश्य दर्शन दीजिएगा।

पंडित जी –आपकी इतनी श्रृद्धा है तो अवश्य आऊँगा।

यह कह कर पंडित जी फिर उठ खड़े हुए। संकोच ने फिर उनकी जबान बंद कर दी। यह आदर-सत्कार इसीलिए तो है कि मैं अपना स्वार्थ-भाव छिपाये हुए हूँ। कोई इच्छा प्रकट की और इनकी आँखें बदलीं। सूखा जवाब चाहे न मिले; पर श्रृद्धा न रहेगी। वह नीचे उतर गये और सड़क पर एक क्षण के लिए खड़े हो कर सोचने लगे , अब कहाँ जाऊँ ? उधर जाड़े का दिन किसी विलासी के धन की भाँति भागा चला जाता था। वह अपने ही ऊपर झुँझला रहे थे , जब किसी से माँगूँगा नहीं, तो कोई क्यों देने लगा ? कोई क्या मेरे मन का हाल जानता है ? वे दिन गये, जब धनी लोग ब्राह्मणों की पूजा किया करते थे। यह आशा छोड़ दो कि कोई महाशय आ कर तुम्हारे हाथ में रुपये रख देंगे। वह धीरे-धीरे आगे बढ़े। सहसा सेठ जी ने पीछे से पुकारा , पंडित जी, जरा ठहरिए।
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पंडित जी ठहर गये। फिर घर चलने के लिए आग्रह करने आता होगा। यह तो न हुआ कि एक रुपये का नोट ला कर देता, मुझे घर ले जाकर न जाने क्या करेगा ? मगर जब सेठ जी ने सचमुच एक गिनी निकाल कर उनके पैरों पर रख दी; तो उनकी आँखों में एहसान के आँसू छलक आये। हैं ! अब भी सच्चे धर्मात्मा जीव संसार में हैं, नहीं तो यह पृथ्वी रसातल को न चली जाती ? अगर इस वक्त उन्हें सेठ जी के कल्याण के लिए अपनी देह का सेर-आधा सेर रक्त भी देना पड़ता, तो भी शौक से दे देते। गद्गद कंठ से बोले , इसका तो कुछ काम न था, सेठ जी ! मैं भिक्षुक नहीं हूँ, आपका सेवक हूँ।
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सेठ जी श्रृद्धा-विनयपूर्ण शब्दों में बोले , भगवान्, इसे स्वीकार कीजिए। यह दान नहीं, भेंट है। मैं भी आदमी पहचानता हूँ। बहुतेरे साधु-संत, योगी-यती देश और धर्म के सेवक आते रहते हैं; पर न जाने क्यों किसी के प्रति मेरे मन में श्रृद्धा नहीं उत्पन्न होती ? उनसे किसी तरह पिंड छुड़ाने की पड़ जाती है। आपका संकोच देख कर मैं समझ गया कि आपका यह पेशा नहीं है। आप विद्वान् हैं, धर्मात्मा हैं; पर किसी संकट में पड़े हुए हैं। इस तुच्छ भेंट को स्वीकार कीजिए और मुझे आशीर्वाद दीजिए।

पंडित जी दवाएँ लेकर घर चले, तो हर्ष, उल्लास और विजय से उनका हृदय उछला पड़ता था। हनुमान जी भी संजीवन-बूटी ला कर इतने प्रसन्न न हुए होंगे। ऐसा सच्चा आनंद उन्हें कभी प्राप्त न हुआ था। उनके हृदय में इतने पवित्र भावों का संचार कभी न हुआ था।

दिन बहुत थोड़ा रह गया था। सूर्यदेव अविरल गति से पश्चिम की ओर दौड़ते चले जाते थे। क्या उन्हें भी किसी रोगी को दवा देनी थी ? वह बड़े वेग से दौड़ते हुए पर्वत की ओट में छिप गये। पंडित जी और भी फुर्ती से पाँव बढ़ाने लगे, मानो उन्होंने सूर्यदेव को पकड़ लेने की ठानी है। देखते-देखते अँधेरा छा गया। आकाश में दो-एक तारे दिखायी देने लगे। अभी दस मील की मंजिल बाकी थी। जिस तरह काली घटा को सिर पर मँड़राते देख कर गृहिणी दौड़-दौड़ कर सुखावन समेटने लगती है, उसी भाँति लीलाधर ने भी दौड़ना शुरू किया। उन्हें अकेले पड़ जाने का भय न था, भय था अँधोरे में राह भूल जाने का। दायें-बायें बस्तियाँ छूटती जाती थीं।

पंडित जी को ये गाँव इस समय बहुत ही सुहावने मालूम होते थे। कितने आनंद से लोग अलाव के सामने बैठे ताप रहे हैं ? सहसा उन्हें एक कुत्ता दिखायी दिया। न-जाने किधर से आ कर वह उनके सामने पगडंडी पर चलने लगा। पंडित जी चौंक पड़े; पर एक क्षण में उन्होंने कुत्ते को पहचान लिया। वह बूढ़े चौधरी का कुत्ता मोती था। वह गाँव छोड़ कर आज इधर इतनी दूर कैसे आ निकला ? क्या वह जानता है ? पंडित जी दवा ले कर आ रहे होंगे, कहीं रास्ता भूल जाएँ ? कौन जानता है ? पंडित जी ने एक बार मोती कह कर पुकारा, तो कुत्ते ने दुम हिलायी; पर रुका नहीं। वह इससे अधिक परिचय दे कर समय नष्ट न करना चाहता था। पंडित जी को ज्ञात हुआ कि ईश्वर मेरे साथ है, वही मेरी रक्षा कर रहे हैं। अब उन्हें कुशल से घर पहुँचने का विश्वास हो गया। दस बजते-बजते पंडित जी घर पहुँच गये।

रोग घातक न था; पर यश पंडित जी को बदा था। एक सप्ताह के बाद तीनों रोगी चंगे हो गये। पंडित जी की कीर्ति दूर-दूर तक फैल गयी। उन्होंने यम-देवता से घोर संग्राम करके इन आदमियों को बचा लिया था। उन्होंने देवताओं पर भी विजय पा ली थी , असम्भव को सम्भव कर दिखाया था। वह साक्षात् भगवान् थे। उनके दर्शनों के लिए लोग दूर-दूर से आने लगे; किंतु पंडित जी को अपनी कीर्ति से इतना आनन्द न होता था, जितना रोगियों को चलते-फिरते देख कर।

ईश्वर के गुण



*🌷ईश्वर के गुण🌷*

*🌻(1) अजन्मा:-*ईश्वर को वेद में अजन्मा कहा गया है।यथा ऋग्वेद में कहा है कि-

*अजो न क्षां दाधारं पृथिवीं तस्तम्भ द्यां मन्त्रेभिः सत्यैः ।*

अर्थात् 'वह अजन्मा परमेश्वर अपने अबाधित विचारों से समस्त पृथिवी आदि को धारण करता है।'

इसी प्रकार यजुर्वेद में कहा है कि ईश्वर कभी भी नस-नाड़ियों के बन्धन में नहीं आता अर्थात् अजन्मा है।

ईश्वर को अजन्मा मानने में सबसे अधिक प्रबल युक्ति यह है कि जन्म के साथ अनेक ऐसी बातें जुड़ी हुई हैं जो ईश्वर के गुण,कर्म,स्वभाव के विपरित है।जैसे जो जन्मता है वह मृत्यु को भी अवश्य प्राप्त होता है तथा जन्म के साथ ही शरीर आदि में होने वाले दुःखों को सहना पड़ता है जिससे ईश्वर को आनन्दस्वरुप नहीं माना जा सकेगा और जो इस प्रकार से जन्म-मरण के चक्र में पड़ने वाला होगा उसे न तो सर्वव्यापक ही कहा जा सकता है और न सर्वशक्तिमान।

और वेदों में वर्णित ईश्वर के स्वरुप में उसके एक गुण का दूसरे गुण से ऐसा मेल है कि एक गुण से दूसरा गुण स्वतः ध्वनित होने लगता है यथा-सच्चिदानन्द होने से वह निराकार है क्योंकि आकार का तात्पर्य है सावयव होना और सावयव कभी भी सर्वशक्तिमान नहीं हो सकता क्योंकि अवयवों का संयोग बिना दूसरे के किए नहीं हो सकता।अतः ईश्वर निराकार है और निराकार होने से वह सर्वशक्तिमान है।सर्वशक्तिमान होने से वह न्यायकारी है और न्यायकारी होने से दयालु तथा अजन्मा है।क्योंकि जो जन्म-मरण वाला हो वह सर्वशक्तिमान नहीं हो सकता न आनन्द स्वरुप ही होता।

*🌻(2) ईश्वर अनन्त है:-*

अजन्मा होने से ईश्वर अनन्त है क्योंकि जन्म मृत्यु की अपेक्षा रखता है,मृत्यु अर्थात् अन्त और जन्म एक दूसरे की पूर्वापर स्थितियाँ हैं अतः ईश्वर अनन्त अर्थात् अन्त से रहित है।वेद में ईश्वर को अनन्त बताते हुए कहा है-

*अनन्त विततं पुरुत्रानन्तम् अनन्तवच्चा समन्ते।*
अर्थात् 'अनन्त ईश्वर सर्वत्र फैला हुआ है।'

*🌻(3) ईश्वर निर्विकार है:-*

अजन्मादि गुणों की पुष्टि के लिए वेद में ईश्वर को निर्विकार कहा है क्योंकि विकारादि जन्म की अपेक्षा रखते हैं और ईश्वर को 'अज' अर्थात् अजन्मा कहा है।अतः वह निर्विकार अर्थात् शुद्धस्वरुप है।वेद की इसी मान्यता के आधार पर महर्षि पातञ्जलि ने योग दर्शन में लिखा है-

*'क्लेशकर्म विपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविषेश ईश्वरः'*

अर्थात् जो अविद्यादि क्लेश,कुशल-अकुशल,इष्ट-अनिष्ट और मिश्रफल दायक कर्मों की वासना से रहित है वह सब जीवों से विषेश ईश्वर कहाता है।

*🌻(4) ईश्वर अनादि है:-*

ईश्वर का कोई आदि नहीं है इसलिए वह अनादि है क्योंकि आदि के साथ अन्त भी लगा होता है अर्थात् जिसका जन्म होता है उसकी मृत्यु भी अवश्य होती है और जिसकी उत्पत्ति होती है उसका विनाश भी अवश्य होता है।इस विषय में यह विचार करना भी आवश्यक है कि आदि और अन्त क्या है?वास्तव में किसी तत्व के प्रकट होने को उत्पन्न होना कहा जाता है अर्थात् उसका अप्रकट हो जाना अन्त कहलाता है अर्थात् जब परमाणुओं के विशेष संयोग से कोई विशिष्ट वस्तु प्रकट होती है तब उस वस्तु की उत्पत्ति मानी जाती है और परमाणुओं के विखण्डित हो जाने को ही उस वस्तु का नष्ट होना कहा जाता है।
सामवेद में ईश्वर के अनादि स्वरुप को निरुपित करते हुए कहा है-
*"जजुषा सनादसि"* अर्थात् ईश्वर सनातन(अनादि) है।

*🌻(5) ईश्वर अनुपम है:-*

वेद के अनेक मन्त्रों में ईश्वर को अनुपम कहा है अर्थात् उसके समान शक्ति सम्पन्न अन्य कोई नहीं इसलिए वह अनुपम है। जैसा कि सामवेद में कहा है कि-
*न कि इन्द्र त्वदुत्तरं न ज्यायो अस्ति वृत्रहन् ।न क्येवं यथा त्वम् ।।*

अर्थात् ईश्वर के समान न ही तो कोई श्रेष्ठ है और न ही उससे ज्येष्ठ है।अथर्ववेद में कहा है *'तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे'* अर्थात् संसार में कुछ भी ऐसा नहीं है जिससे ईश्वर की उपमा दी जा सके इसलिए वह अनुपम है।

*🌻(6) सर्वाधार:-*

वेद की चारों मन्त्र संहिताओं में ईश्वर को समस्त चराचर जगत एवं जीवों का आधार कहा गया है अर्थात् समस्त पृथ्वी आदि लोक-लोकान्तर उसी के आधार पर टिके हैं इसलिए वह सर्वाधार है।परमात्मा की शक्ति का वर्णन करता हुआ उपनिषद कहता है-"सूर्य,चन्द्रमा,तारे,बिजली और अग्नि ये सब ईश्वर में प्रकाश नहीं कर सकते किन्तु इन सबको प्रकाशित करने वाला एक वही ईश्वर है।"

ऋग्वेद में कहा है-

*स दाधार पृथ्वीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम।*अर्थात् ईश्वर पृथ्वी और द्युलोक दोनों का आधार है,वही सबका आधार है।

*प्रश्न:-*जब ईश्वर सबका आधार है तब ईश्वर का आधार क्या है?

*उत्तर:-*ईश्वर सबका आधार होने के साथ-साथ स्वयं अपना भी आधार है क्योंकि आधार उसको कहा जाता है जो सर्वशक्तिमान है इसलिए वह सबका आधार है और उसका अन्य कोई आधार नहीं हो सकता क्योंकि किसी का आधार उससे अधिक शक्तिशाली ही होता है,लोक में भी हम देखते हैं कि प्रत्येक निर्बल अपने से सबल के आश्रय में ही रहता है और कोई भी अपने से निर्बल के आश्रय में नहीं रहता इसी प्रकार क्योंकि ईश्वर से अधिक शक्ति सम्पन्न अन्य जीवादि कोई नहीं इसलिए उसका कोई आधार नहीं।

उदाहरणार्थ-एक राज्य में सब राजा के आश्रित होते हैं किन्तु राजा किसी के आश्रित नहीं होता इसी प्रकार ईश्वर भी सर्वाधार है।

आईये वेद विदित ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना एवं उपासना सब मिलकर करे।

- सुभाषिनी आर्य