Friday, May 4, 2018

आर्यसमाज और सर सैय्यद अहमद खान




आर्यसमाज और सर सैय्यद अहमद खान

डॉ विवेक आर्य

AMU अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय जिन्नाह की तस्वीर को लेकर चर्चा में है। इस अवसर पर इसके संस्थापक सर सैय्यद अहमद खान का नाम आना स्वाभाविक है। सर सैय्यद ने 1857 के काल में अंग्रेजों का भरपूर सहयोग किया। जिसके बदले उन्हें अंग्रेजों ने सर आँखों पर उठा लिया। सर सैय्यद मुसलमानों को अंग्रेजी पढ़ने एक अंग्रेजों के प्रति वफ़ादारी दिखाने के पक्षधर थे। इसके लिए उन्होंने एक पुस्तक का लेखन भी किया था जिसका शीर्षक था 'The Loyal Mohammadans of India '

आर्यसमाज के शीर्घ लोगों से सर सैय्यद अहमद खान के सम्बन्ध रहे। सर्वोपरि स्वामी दयानन्द, स्वामी श्रद्धानन्द और लाला लाजपत राय आदि। स्वामी दयानन्द और सर सैय्यद अहमद खान की प्रथम भेंट अलीगढ में जनवरी 1874 में हुई थी। उस समय वे वहां के न्यायाधीश थे। स्वामी जी के विचारों से वे प्रभावित हुए और दोनों के बीच आत्मीयता स्थापित हुई। दूसरी भेंट उसी वर्ष बनारस में हुई। उस समय वे बनारस में जज के रूप में नियुक्त थे। उस समय उन्होंने स्वामी जी का एक व्याख्यान अपने बंगले पर करवाया था। उनके माध्यम से स्वामी जी की बनारस के न्यायाधीश शेक्सपियर से भी भेंट हुई। 1877 में स्वामी दयानन्द ने दिल्ली में धर्म सम्मेलन का आयोजन किया था जिसमें सर सैय्यद अहमद खान ने भाग लिया था। स्वामी जी के निधन पर सर सैय्यद ने अपने शोक सन्देश में अलीगढ इंस्टिट्यूट गजट 18 संख्या 79 में लिखा था, "मैं स्वामी दयानन्द सरस्वती से भली-भांति परिचित था। तथा मेरा उनके प्रति आदर भाव भी था। इसका कारण इतना ही है कि वे नितांत उच्चाशय तथा विद्वान् पुरुष थे कि जिनके प्रति प्रत्येक मतालम्बी को अपना सम्मान प्रकट करना चाहिए। वे इतने महान पुरुष थे कि जिनके तुल्य भारत में किसी अन्य का मिलना मुश्किल है। अत: उनकी मृत्यु का शोक मनाना प्रत्येक व्यक्ति के लिए आवश्यक है। ऐसा अद्वितीय पुरुष हमारे बीच से उठ गया, यह नितांत शोकजनक है। " प्रसंग में उन्होंने लिखा था- "स्वामी दयानन्द संस्कृत के गंभीर विद्वान् तथा वेदों के सतर्क अध्येता थे। एक उच्च विद्वान होने के साथ साथ वे उच्च चरित्र तथा आध्यात्मिक वृति के पुरुष भी थे। उनके अनुयायी उन्हें ईश्वर के तुल्य सम्मान देते थे तथा निश्चय ही वे उस सम्मान के पात्र भी थे। उन्हीने हिन्दू धर्म में अनेक सुधार किये। वे मूर्तिपूजा के कट्टर विरोधी थे तथा इस विषय को लेकर उनके पंडितों से अनेक शास्त्रार्थ भी हुए थे। जिनमें उन्होंने यह निर्विवाद रूप से सिद्ध किया था कि मूर्तिपूजा के लिये वेदों में स्वीकृति नहीं है। वे निराकार से भिन्न किसी अन्य ईश्वर की उपासना को अनुचित मानते थे। उन्होंने यह भी सिद्ध करने का प्रयास किया था कि वेदों में जड़ तत्वों की पूजा का विधान नहीं है। मेरे विचार के अनुसार स्वामी जी प्रकृति को अनादि शाश्वत मानते थे तथा उसे माया कहकर भी सम्बोधित करते थे। यदि वे प्रकृति की अनादिता में विश्वास नहीं रखते तो संभवत: ईश्वर के स्वरुप को लेकर उनके तथा मुसलमानों के विचारों में कोई अंतर नहीं रह जाता। "

सर सैय्यद के अंतिम कथन का भाव इतना मात्र ही है कि ईश्वर के सम्बन्ध में इस्लाम की मान्यता तथा स्वामी दयानन्द की मान्यता में अधिक अंतर नहीं है। दोनों ही ईश्वर को निराकार तथा सर्वशक्तिमान मानते है। अंतर यदि कुछ है तो यदि कि इस्लाम में जड़ प्रकृति (माद्दा) को भी ईश्वर से ही उत्पन्न माना गया है जबकि स्वामी जी की धारणा के अनुसार ईश्वर तथा जीव की ही भांति प्रकृति भी अनादि, अनुत्पन्न तथा शाश्वत है।

(सन्दर्भ- महर्षि दयानन्द के भक्त, प्रशंसक और सत्संगी - प्रो भवानीलाल भारतीय)

स्वामी श्रद्धानन्द (मुंशी राम) के जीवन में भी सर सैय्यद से सम्बन्ध मिलता हैं। मगर यह सम्बन्ध अन्य रूप में है। स्वामी जी अपनी जीवनी कल्याण मार्ग का पथिक में इस सम्बन्ध में पर्याप्त प्रकाश डालते है। उन दिनों संयुक्त प्रान्त में सर सैय्यद की तूती बोलती थी। स्वामी जी के पिताजी उस समय बलिया में पुलिस में कार्यरत थे।एक मुसलमान वकील के यहाँ एक लड़की मर गयी। मुखबिर ने कोतवाली में रपट दी कि लड़की मार डाली गयी। नायब कोतवाल ने लाश शव परिक्षण के लिए रुकवा दी। वकील सर सैय्यद के हामी थे। सर सैय्यद की सहायता से वकील ने कचहरी में तहकीकात बंद करा दी और उनके पिताजी, नायब कोतवाल और मुखबिर पर फौजदारी नालिश दायर कर दी। स्वामी जी ने अंग्रेजी में पत्र आदि लिखे। पहले बनारस में मुकदमा चला फिर इलाहाबाद हाई कोर्ट में गया। इलाहबाद हाई कोर्ट ने तीनों के कदम को सही करार दिया। तीनों निर्दोष सिद्ध हुए। इस घटना का मुंशी राम के जीवन पर व्यापक प्रभाव पड़ा। उनके मन में यह भावना स्थिर हो गई कि सर सैय्यद निष्पक्ष नहीं अपितु मुसलमानों के हिमायती है। सर सैय्यद की मुस्लिम परस्ती को सिद्ध करने के लिए स्वामी जी ने कभी अपने पत्र सद्धर्म प्रचारक में भी लेख लिखा था।

लाला लाजपत राय के सर सैय्यद से सम्बन्ध जानने योग्य है। लाला जी के पिताजी सर सैय्यद के बड़े प्रशंसक थे। सर सैय्यद जहां अंग्रेजों के अमसर्थक थे वही उन्होंने भारतीय मुसलमानों को कांग्रेस से जुड़ने से रोकने का भरपूर प्रयास किया। लाला जी उस समय कांग्रेस के मंच से देशहित की बात करना चाहते थे। सर सैय्यद के विरोध में उन्होंने चार पत्र उर्दू में लिखे थे जो कोहिनूर पत्रिका में छपे थे। 1888 में कांग्रेस के इलाहाबाद सत्र से पहले कांग्रेस के संस्थापक ए.ओ. ह्यूम ने इन्हें अंग्रेजी में अनुवादित कर छपवाया था। उस दौर में ये पत्र अत्यंत लोकप्रिय हुए। इससे न केवल लाला जी ने देशव्यापी स्तर पर प्रशंसा प्राप्त की .अपितु उस काल में सर सैय्यद को गलत भी सिद्ध किया। ये पत्र आप इंटरनेट पर इस लिंक पर पढ़ सकते है।

http://www.columbia.edu/itc/mealac/pritchett/00islamlinks/txt_lajpatrai_1888/txt_lajpatrai_1888.html

पंडित गंगा उपाध्याय आर्यसमाज के दार्शनिक विद्वान् थे एवं इस्लाम के मर्मज्ञ थे। आपने सितम्बर 1943 के सार्वदेशिक पत्रिका के अंक में सिंध में सत्यार्थ प्रकाश रक्षा आंदोलन में सत्यार्थ प्रकाश और इस्लाम शीर्षक से लेख लिखा था। इस लेख में सर सैय्यद की इस्लामिक मान्यताओं में स्वामी दयानन्द के चिंतन का प्रभाव विषय भी आया है। गंगा प्रसाद जी लिखते है, "स्वामी दयानन्द सैय्यद साहिब को बताया होगा कि हिन्दू धर्म की वर्तमान कुरीतिया पुराणों के कारण है। वेद में उनका उल्लेख नहीं है। इसी का अनुसरण सर सैय्यद ने किया। उन्होंने कहना आरम्भ किया कि हम शुद्ध क़ुरान को मानते है। हदीसों को नहीं। हदीसों में इस्लाम के सिद्धांत के विरुद्ध भी बहुत सामग्री है। सर सैय्यद के लेखों वह आज के इस्लामिक साहित्य का यदि सौ वर्ष पहले के इस्लामी पुस्तकों से मिलान किया जाये तो पता चलेगा कि सत्यार्थ प्रकाश की छाप उन पर लगी हुई है। "

सर सैय्यद शैतान के बारे में लिखते है-

"अब ख्याल करो कि क़ुरान में शैतान का लफ्ज़ या नाम आया है। मगर इसकी हकीकत या माहियत(स्वरुप) कुछ बखान नहीं हुई। दिन रात हमको शैतान बहकता है और गुनाहों में फंसाता है। मगर वजूद खारिजी महसूस नहीं होता। बल्कि हम बिल यकीन पाते है कि खुद हम ही में एक शक्ति है जो हमें सीधे रास्ते पर फेरती है। हमको बेइन्ताह अनेक प्रलोभनों से बहकाती हैं। शैतान समझ कर उसकी दाढ़ी पकड़ लेते है और जोर के तमाचा मारते है। मगरजब आंख खुलती है तो अपनी ही सफ़ेद दाढ़ी अपने हाथ में और अपना ही गाल लाल देखते है। आयतों को मिलाओ और गौर करो कि यह सब अलंकार है। इनसे मानीहकीकी मुराद नहीं है। "

जिन्होंने ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका में अहिल्या की कथा पढ़ी है वो कह सकते हैं कि सर सैय्यद पर ऋषि का कितना प्रभाव था। सर सैय्यद अगर मुस्लिम कौम की राजनीतिक परिस्थिति सुधारने में न लगे रहते तो अवश्य हमसे बहुत आगे बढ़ गए होते। जैसे पुराणों में निष्कलंक अवतार का उल्लेख है। उसी प्रकार से इस्लाम में मेहंदी अखिरूज जमा का भी है। इसके विषय में सर सैय्यद लिखते है-

"उन गलत किस्सों में से जो मुसलमानों का ही मशहूर है एक किस्सा इमाम मेहंदी अखिरूज जमा के पैदा होने का है। इस किस्से की बहुत से हदीसें लिखित है। मगर सब जूठी और बनावटी है। "

सर सैय्यद के धार्मिक चिंतन पर स्वामी दयानन्द के क्रांतिकारी चिंतन का परिणाम स्पष्ट दीखता है। आर्यसमाज और उनसे शीर्घ नेताओं के साथ उनके खट्टे-मीठे सम्बन्ध रहे। पाठकों के ज्ञान वर्धन हेतु यह लेख प्रकाशित किया गया है।

(इस लेख को रिसर्च सेंटर फॉर वैदिक स्टडीज के अंतर्गत डॉ देवेश आर्य द्वारा अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय के एक समारोह में दिनांक 7 मई,2018 को पढ़ा जायेगा। )

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